Saturday, November 14, 2015

कैमरन भी मानने को हुए मजबूर, 'अच्‍छे दिन आने वाले हैं'

शशांक शेखर बाजपेई। 
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है कि अच्छे दिन आने वाले हैं। अच्छे दिन जरूर आएंगे। वह दिन दूर नहीं जब ब्रिटेन में भारतीय मूल का प्रधानमंत्री होगा।

कैमरन की यह टिप्‍पणी महज मोदी या भारत को खुश करने के लिए नहीं की है। इसमें बड़ी दूर के हित निहित हैं। वह दूरदर्शिता इसमें साफ परिलिक्षित हो रही है, जो मोदी भारत के युवाओं में देख रहे हैं।

याद रहे कैमरन उसी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैं, जिसकी दासता की जंजीरों में भारत करीब 200 साल तक जकड़ा रहा। ब्रिटिश शासन में अपने ही देश में अंग्रेजों के इलाकों में 'इंडियन्‍स और डॉग्‍स' नॉट अलाउड थे। आज आजादी के 67 साल बाद भारत उसी ब्रिटेन के साथ आंख मिलाकर बात कर रहा है। दया या मेहरबानी नहीं बराबरी की बात कर रहा है।

क्‍या यह अच्‍छे दिनों की दस्‍तक नहीं है। क्‍या दाल के भाव और प्‍याज की कीमतें ही अच्‍छी सरकार की दशा और दिशा तय करेंगी। हिंदुस्‍तानियों के सम्‍मान की कोई कीमत नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी कई बार कह चुके हैं और बार-बार दोहरा रहे हैं विकास की यात्रा में अब यह देश रुक नहीं सकता। यह देश जवानी से लबालब है।

राजस्थान के अलवर जिले के इमरान खान का उदाहरण देकर मोदी ने दुनिया को बता दिया कि ऐसे युवाओं से भारत सशक्‍त है, जो शिक्षा में सहायता के लिए 50 ऐप विकसित कर देश को समर्पित कर चुका है। वह भी मुफ्त में।

ऐसे युवा भारत को बदलने की शक्‍ित रखते हैं और दुनिया को अपनी सेवाएं देने के लिए तैयार हो रहें हैं। मोदी सरकार का चलाया गया स्किल इंडिया प्रोग्राम, मेक इन इंडिया प्रोग्राम उन्‍हीं युवाओं को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है, जो आने वाले सालों में देश और दुनिया में भारत का सिर गर्व से ऊंचा करेंगे।

मोदी कह चुके हैं कि कोई कारण नहीं है कि हम गरीब बने रहें। मगर, दो सौ सालों की दासता ने हम हिंदुस्‍तानियों को गरीबी को बार-बार पुचकारने वाला बना दिया था। या अभी भी हम गरीबी में किए गए संघर्ष को ही आदर्श मानकर चल रहे हैं। मगर, अब इसकी कोई जरूरत नहीं है। मोदी यह बात दुनिया को समझ में आ रही है वरना क्‍योंकर अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्‍ट्रेलिया, सऊदी अरब, चीन, जर्मनी आदि अब भारत की ओर देख रहे हैं।

मोदी के नेतृत्‍व में देश में सफाई और चौबीस घंटे बिजली पाने का सपना लोगों ने देखना शुरू किया। नतीजे आने में अभी समय भले ही लगे, लेकिन नि:संदेह इस दिशा में काम तो शुरू हो ही गया है। इसकी बानगी है सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा और अक्षय ऊर्जा से 150 गीगावॉट ऊर्जा पैदा करने का कार्य शुरू किया है। पहले भारत में बिजली मेगावॉट में आती थी। पहली बार हिंदुस्तान गीगावॉट पर सोच रहा है।

असहिष्णुता के मुद्दे पर मोदी की वह टिप्‍पणी काबिले तारीफ है भारत विविधताओं से भरा देश है और विविधता हमारी आन, बान, शान है जो हमारी ताकत और गौरव है। मोदी ने शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के महत्व को भी रेखांकित किया।

भारत में विविधता का उल्लेख करते हुए मोदी ने ब्रिटेन सहित दुनिया को बताया कि हमारे यहां सौ भाषाएं, 1500 बोलियों और हजारों खानपान की पद्धतियां और सैकड़ों वेश-भूषाएं हैं। इतनी सारी विविधताएं हैं, लेकिन यह विविधता हमारी विशेषता भी है। 

Friday, November 13, 2015

दिल्ली में खुलेगी 'मैडम तुसाद म्‍यूजियम' की शाखा

Journalist Shashank Shekhar Bajpai 
लंदन। दुनियाभर में चर्चित मोम संग्रहालय 'मैडम तुसाद' की नई शाखा अब दिल्ली में खुलेगी। 'भारत-ब्रिटेन सांस्कृतिक वर्ष- 2017' के तहत भारत में तुसाद संग्रहालय की शाखा खोली जाएगी।

यह घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली ब्रिटेन यात्रा के दौरान की गई है। लंदन स्थित इस चर्चित मोम संग्रहालय में मशहूर कलाकारों की प्रतिमाएं शामिल हैं, जिनमें बॉलीवुड सितारे अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित से लेकर कैटरीना कैफ तक शामिल हैं।

डेविड कैमरन ने घोषणा की है कि 2017 के सांस्कृतिक आदान-प्रदान के तहत भारत में प्रदर्शित करने के लिए ब्रिटिश संग्रहालय के दुर्लभ खजाने में से कुछ चीजें, शेक्सपीयर की फर्स्ट फोलियो और मैग्ना कार्टा की एक प्रति भेजी जाएगी। ब्रिटेन में भारत महोत्सव का आयोजन भी किया जाएगा।

ब्रिटिश पीएम कैमरन ने कहा कि भारत और ब्रिटेन के बीच की अनूठी भागीदारी आर्थिक समझौतों से परे शेक्सपीयर और बॉलीवुड तक जा पहुंची है। हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक आदान-प्रदानकर्ताओं में से हैं। और अब वक्‍त आ गया है कि साथ मिलकर इसका जश्न मनाया जाए।

इसी कड़ी में ब्रिटिश पुस्तकालय अपने दक्षिण एशियाई अभिलेखों के दो लाख पृष्ठों को डिजिटलाइज कर रहा है ताकि 1714 से 1914 तक की भारतीय पुस्तकों दुनियाभर में पढ़ने के लिए उपलब्‍ध हो सकें।

नरेंद्र मोदी ने अपने ब्रिटिश समकक्ष डेविड कैमरन से क्‍यों मांगी रॉयल्‍टी

शशांक शेखर बाजपेई। 

ब्रिटेन में अपनी यात्रा के दौरान सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिटिश्‍ा प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से रॉयल्‍टी मांग ली।

मोदी ने कहा कि मैं ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को याद दिलाना चाहता हूं कि आप ने ब्रिटिश संसदीय चुनाव के दौरान मेरा चुनावी नारा - अबकी बार-मोदी सरकार, कॉपी किया था।

इसके लिए मेरी रॉयल्‍टी आप पर बाकी है। हल्‍के फुल्‍के मजाक के रूप में प्रधानमंत्री मोदी ने जब ऐसा कहा, तो वहां मौजूद लोग ठहाके लगाने लगे। गौरतलब है कि चुनाव के दौरान ब्रि‍टेन में कैमरन ने मार्च 2015 में कहा था कि - फिर एक बार कैमरन सरकार का नारा दिया था।

तब मोदी के ब्रिटिश समकक्ष कैमरन ने कैमरे पर स्‍वीकार किया था कि वह भारत जाते रहते हैं और हिंदी के अलावा कई चीजें वह भारत से सीखते रहते हैं। इसी कड़ी में उन्‍होंने चुनाव के दौरान मोदी का चुनावी नारा अबकी बार मोदी सरकार सुना था। इसे ब्रिटिश रंग में रंगते हुए कैमरन ने बदलाव करके फिर एकबार कैमरन सरकार कर दिया था। 

Wednesday, November 11, 2015

मानव तस्‍करों की मीठी बांतों में फंसी कार्ला का 43 हजार बार हुआ रेप

मैक्सिको सिटी। अमेरिका और मैक्‍िसको में मानव तस्‍करों ने हजारों लड़कियों की जिंदगी नर्क बना दी है। इसका खुलासा किया है हाल ही में बचाई गई मैक्सिको सिटी की रहने वाली कार्ला जैसिंटो ने।

कार्ला ने कहा कि उसे बचपन में ही मां ने छोड़ दिया था। पांच साल की उम्र में एक रिश्तेदार ने यौन शोषण किया। कार्ला ने कहा कि जब मैं 12 साल की थी, तब एक तस्कर मुझे प्यार के सब्‍जबाग दिखाकर अपने साथ ले गया। चार साल तक हर रोज 30 बार उसके साथ दुष्‍कर्म किया जाता था। करीब 43 हजार 200 बार मेरा रेप किया गया।

मानव तस्‍करी इतना आकर्षक व्‍यापार हो गया है कि इसमें सेंट्रल मेक्‍िसको की अटलांटा और न्‍यूयॉर्क जैसे शहरों के बीच कोई सीमा नहीं है। अमेरिका और मैक्‍िसको, दोनों जगह के अधिकारी वर्षों से सेंट्रल मैक्‍िसको के एक कस्‍बे को मानव तस्‍करी के बड़े स्रोत के रूप में चिह्नित करते रहे हैं।

यही वो इलाका है, जहां पीड़‍ितों को जबरन वेश्‍यावृत्‍ित के धंधे में लगाने से पहले ले जाया जाता है। इस कस्‍बे का नाम टिनांनसिंगो है। हालांकि, यहां की आबादी करीब 13 हजार के आस-पास है, लेकिन वेश्‍यावृत्‍ित के लिए इस जगह ने कुख्‍याति हासिल की है। वेश्‍यावृत्‍ित वहां की मुख्‍य इंडस्‍ट्री बन गई है।

छोटे कस्‍बों और ग्रामीण इलाकों में युवा लड़कियों को पता ही नहीं होता है कि उस जगह से आने वाले पुरुष संदिग्‍ध हैं। लड़कियों को लगता है कि उन पुरुषों के साथ उनका भविष्‍य उज्‍जवल होगा और वे मानव तस्‍करों के झांसे में आ जाती हैं।

लड़कियों को लगता है कि पुरुष उनसे प्‍यार करते हैं और हर बार वेश्‍यावृत्‍ित में लड़कियों को धकेलने की यही कहानी दोहराई जाती है। 

Tuesday, November 10, 2015

आईडेंटिटी क्राइसिस : खुद को डॉगी समझता है यह बछड़ा

कैलिफोर्निया। आईडेंटिटी क्राइसिस यानी अपनी पहचान को लेकर भ्रम किसी को भी हो सकता है। अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक गाय के बछड़े गोलिथ को ही ले लीजिए।

दो महीने पहले डेयरी फार्म से बचाया गया था, जो उसे काटने की योजना बना रहा था। डेनविले में शेयली हब के परिवार के साथ रह रहा यह बछड़ा खुद को डॉगी समझता है।

उसे जब इस परिवार ने पहली बार लिया था, तो वह इतना कमजोर और छोटा था कि उसे आसानी से गोद में लिया जा सकता था। मगर, आठ हफ्तों तक उसका अच्‍छी तरह ध्‍यान रखने के बाद अब वह स्‍वस्‍थ हो गया है।

डॉगीज के बीच हुई परवरिश 

उसकी देखभाल करने वाली शेयली बताती हैं कि मुझे पक्‍का यकीन है कि गोलिथ खुद को एक डॉगी समझाता है। उसकी प‍रवरिश हमारे तीन डॉगी के बीच हुई है और वह उन्‍हीं के साथ रहता है। गोलिथ उन डॉगीज का पीछा करता है और पूरे समय उनके साथ खेलता है।

डॉगीज के खाने-पीने की करता है नकल 

वह देखता है कि डॉगी कैसे खाना खा रहे हैं और कैसे पानी पी रहे हैं। इसके बाद वह उनकी नकल करता है। यहां तक कि वह डॉगी के लिए लगाए गए बिस्‍तर पर ही बैठता है। वह डॉगी लियो को अपनी मां समझता है और उसके साथ काफी खुश दिखता है।

फैमिली काउच पर बैठे गोलिथ की तस्‍वीर शेयली ने टि्वटर पर पोस्‍ट की। इस तस्‍वीर को गुरुवार दोपहर तक 32 हजार से अधिक बार रीट्वीट किया गया और 54 हजार से अधिक लाइक इस तस्‍वीर को मिले थे।

अपने पेशे के अनुसार, तय करें दिवाली पूजन का मुहूर्त

शशांक शेखर बाजपेई। 
देवगुरु बृहस्पति के अनुसार, कार्तिक मास की अमावस्या को शाम को सूर्यास्त हो जाने के बाद ही दीवाली का ‘पर्वकाल’ प्रारंभ होता है। लक्ष्‍मी योग के इस मुहूर्त में भगवती लक्ष्मी का पूजन करना गृहस्थ जनों के लिए शुभ माना जाता है।

आगरा के पंडित उद्देश्‍य गुप्‍ता ने बताया कि इससे घर का आर्थिक संकट दूर होता है तथा परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। इससे घर का आर्थिक संकट दूर होता है तथा परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है।

व्‍यापारियों के लिए ये मुहूर्त दीवाली की रात को तृतीय प्रहर में कुबेर योग आता है। धन के स्‍वामी कुबेर के इस मुहूर्त में पूजा करना उद्योगपतियों और व्यापारियों की इच्‍छाओं को पूरा करता है। इसमें फैक्ट्री-कारखाना या दुकान की गद्दी पर दीपावली-पूजन प्रचुर लाभदायक सिद्ध होता है।

सरकारी अधिकारियों और नेताओं के लिए है इंद्रयोग। भगवान गणपति, महालक्ष्मी और कुबेर जी के साथ ही दीवाली की रात देवताओं के राजा इंद्र का भी आह्वान किया जाता है। अमावस्या की रात द्वितीय प्रहर में इंद्रयोग आता है।

सरकारी अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं को इस योग में पूजन करना चाहिए। ‘इंद्र योग’ सत्ता, पदोन्नति के साथ ही वेतन-वृद्धि के इच्छुक भक्तों का कार्यक्षेत्र फलीभूत करता है। इस प्रकार देवगुरु बृहस्पति द्वारा बताए गए लक्ष्मी योग, इंद्र योग और कुबेर योग अपने नाम के अनुरूप फल प्रदान करते हैं।

Monday, November 9, 2015

जानिए दिवाली पर लक्ष्मीजी के साथ क्‍यों करते हैं शालिग्राम की पूजा

शशांक शेखर बाजपेई। 
दीपावली पर मां लक्ष्मी का पूजन अकेले नहीं किया जाना चाहिए। उनके साथ भगवान विष्णु का भी पूजन करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्‍मीजी के साथ शालिग्राम रखकर उनका पूजन करके उन्हें धन स्थान पर स्थापित करने से घर में कभी कोई परेशानी न
हीं होती है।

शालिग्राम पूजन इसलिए 

कहा जाता है कि एक समय पराक्रमी असुर जलंधर का विवाह वृंदा से हुआ, जो भगवान विष्णु की भक्त थी। उसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था। उसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। अपनी शक्‍ित के अभिमान में जलंधर देवताओं, अप्‍सराओं को परेशान करने लगा।

दु:खी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे। तब भगवान विष्णु जलांधर का रूप धारण कर छल से वृंदा का पतिव्रत धर्म नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वह युद्ध में मारा गया।

वृंदा ने दिया था शाप

जब वृंदा को इस छल का पता चला, तो उसने विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं के अनुरोध करने पर वृंदा ने शाप वापस ले लिया। मगर, भगवान विष्णु भी वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे। इसलिए उन्होंने पत्‍थर में अपना एक रूप प्रकट किया, जिसे शालिग्राम कहा गया।

अगले जन्‍म में तुलसी बनीं वृंदा 

भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि अगले जन्म में तुम तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे सिर पर होगा। तुम्हारे बिना मैं भोजन ग्रहण नहीं करूंगा।

यही कारण है कि भगवान विष्णु के भोग में प्रसाद में तुलसी को जरूर रखा जाता है। इस घटनाक्रम के पटाक्षेप होने के बाद जलंधर के साथ वृंदा सती हो गई। उनकी राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया।

तो नहीं होती कोई परेशानी 

मान्‍यता है कि भगवान विष्णु और तुलसी का जिस जगह पर होते हैं, वहां कोई दुख और परेशानी नहीं आती। नारायण स्वरूप यही शालिग्राम शिलाएं इन पर बनने वाले चक्र के आधार पर विष्णु के अलग-अलग रूप व अवतारों के नाम वाली होती हैं।

नेपाल में मिलते हैं शालिग्राम 

शालिग्राम नेपाल के मुक्तिनाथ के पास काली गण्डकी नदी के तट पर पाए जाते हैं। शालिग्राम काले रंग के पत्थर रूप में ही मिलते हैं, लेकिन सफेद और नीले शालिग्राम को भी पूजा जाता है। शालिग्राम पर चक्र भी होते हैं, जिन्हें सुदर्शन चक्र कहा जाता है।

ऐसे करनी चाहिए पूजा 

दिवाली के दिन घर में शालिग्राम की स्थापना करें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करते हुए पंचामृत से स्नान करवाएं उसके बाद भगवान का पंचोपचार पूजन करें। इसमें गंध, पुष्प, धूप, दीप और तुलसी के साथ नैवेद्य को शामिल करें। शालिग्राम की पूजा में तुलसी का महत्‍व अहम है क्‍योंकि बिना तुलसी के शालिग्राम की पूजा करने पर दोष लगता है।

उज्‍जैन की पंडित रश्‍िम शर्मा से बातचीत के आधार पर

शाह के कारण नीतीश के साथ जुड़े थे प्रशांत किशोर


शशांक शेखर बाजपेई। 

नीतीश कुमार की जीत के पीछे कई कारणों में से एक है मोदी के पूर्व सहयोगी प्रशांत किशोर का उनके साथ होना। बताया जा रहा है कि अमित शाह की वजह से ही किशोर ने मोदी का साथ छोड़कर नीतीश का साथ दिया। वह मई से ही नीतीश के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने में जुट गए थे।

बिहार चुनाव में मोदी और नीतीश-लालू के लड़ाई के बड़े चेहरे थे, लेकिन पर्दे के पीछे की रणनीति भाजपा के लिए अमित शाह और नीतीश के लिए प्रशांत किशोर बना रहे थे। नतीजों के बाद यह स्‍पष्‍ट हो गया है कि प्रशांत की रणनीति ने अमित शाह की चालों को पूरी तरह नाकाम कर गठबंधन की जीता का मार्ग प्रशस्‍त किया।

साल 2011 में संयुक्त राष्ट्र जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ की नौकरी छोड़ने के बाद वह नरेंद्र मोदी के साथ जुड़ गए थे। उन्‍होंने ही मोदी की छवि विकास पुरुष की बनाई, 'चाय पर चर्चा' और '3डी होलोग्राम जैसे प्रोग्राम' की बदौलत मोदी के नेतृत्‍व में लोकसभा चुनाव में भाजपा को जबरदस्‍त जीत दिलाई थी।

शाह ने नकारी प्रशांत की भूमिका 

प्रशांत की टीम में शामिल एमबीए और आईआईटी ग्रेजुएट सहित कई पेशेवर सदस्‍यों ने सोशल मीडिया के जरिये बड़ी संख्या में लोगों को मोदी से जोड़ने में कड़ी मेहनत की थी। मगर, भाजपा के अध्‍यक्ष अमित शाह सहित कुछ नेताओं का मानना था कि भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं की मेहनत के कारण ही मोदी को जीत मिली और किशोर की टीम की भूमिका मामूली थी।

भाजपा से आहात हो नीतीश से जुड़े 

लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की चुनावी रणनीति में किशोर अपना प्रभाव गंवा चुके थे। बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर में शाह से मिले थे और उनसे पूछा था कि उन लोगों का जून के बाद क्या होगा? शाह ने तब किशोर को सरकार की पॉलिसी मेकिंग में कोई भूमिका दिए जाने का आश्वासन नहीं दिया था।

इसके बाद प्रशांत किशोर ने अपने भविष्‍य को देखते हुए कुछ कांग्रेसी नेताओं से संपर्क किया। हालांकि, बात नहीं बनी और उसके बाद अक्टूबर-नवंबर 2014 में वह जेडीयू सांसद पवन वर्मा के जरिये नीतीश कुमार से मिले। किशोर ने दो शर्तों पर नीतीश के साथ काम करने पर रजामंदी दी।

बताया जा रहा है कि पहली शर्त थी कि नीतीश तक उनकी सीधी पहुंच हो और दूसरी जीतन राम मांझी को बिहार के मुख्यमंत्री पद से हटाया जाए। इसके कुछ ही समय बाद नीतीश मांझी को मुख्यमंत्री पद से हटाकर खुद सीएम बने। 

Sunday, November 8, 2015

बिहार विधानसभा चुनाव में जीत-हार के 5 कारण

शशांक शेखर बाजपेई। 
बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत और एनडीए की हार हो गई। इसके साथ ही एक बार फिर तय हो गया कि नीतीश कुमार ही बिहार की सत्ता संभालेंगे। एक नजर महागठबंधन की जीत और एनडीए की हार के पांच कारणों पर -

  1. नीतीश कुमार की छवि राज्य में विकास पुरुष के रुप में बनी हुई थी। बीते एक दशक में बिहार में विकास के काम कागज के बजाय जमीन पर दिखे। इनमे चाहे सड़कें बनाने का काम हो या बिजली के स्तर में सुधार हो।
  2. एनडीए के दलों में तालमेल न होना महागठबंधन के पक्ष में गया।
  3. लालू यादव के साथ ने महागठबंधन को मजबूत किया। जदयू, राजद व कांग्रेस में आपसी समन्वय बेहतरीन रहा।
  4. पिछड़ों-दलितों का ध्रुवीकरण एक बड़ा कारण। मांझी और पासवान अपने वोटों को एक साथ नहीं रख पाए।
  5. नीतीश कुमार की चुनावी रणनीति जो विकास केंद्रित रही। चुनावी रैलियों के दौरान नीतीश कुमार ने बिहार के विकास को बड़ा मुद्दा बनाया। उन्होंने बाहर और बिहारी का बात करते हुए कहा कि राज्य का विकास बिहारी करेगा न कि बाहरी। इस जुमले ने जनता के दिल को छू लिया।


वहीं, एनडीए की हार के कारण के रूप में अक्रामक रणनीति से लेकर कार्यकर्ताओं में एकजुटता की कमी, बे-सिर पैर के बयान जैसे कई कारण अहम रहे। 


  1. माना जा रहा है कि पीएम मोदी के डीएनए बयान को महागठबंधन के नेताओं ने अपने पक्ष में भुना लिया। नीतीश और लालू यादव ने मोदी और अमित शाह को बाहरी करार दिया। महागठबंधन जनता को ये समझाने में कामयाब रहा कि बिहार भाजपा के पास स्थानीय नेताओं की कमी है और पैराशूट चेहरों की मदद से बिहार की सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं।
  2. चुनाव से ऐन पहले हिन्दुस्तान अवाम मोर्च, लोजपा, आरएलएसपी और भाजपा के बीच सीट बंटवारों पर विवाद खड़ा हुआ। अमित शाह से लेकर भाजपा के दूसरे बड़े नेताओं को सफाई तक देनी पड़ गई। राम विलास पासवान पर भाई-भतीजावाद का आरोप लगा। बताया जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इन दलों से इस लिए भी नाराज थे चुनावों के दौरान ये नेता जमीन पर सही ढंग से काम नहीं कर रहे थे। 
  3. टिकट बंटवारे के मुद्दे पर भाजपा सांसद आरके सिंह और शत्रुघ्न सिन्हा खुलकर नाराजगी जता चुके थे। आरके सिंह ने मतदान में हिस्सा भी नहीं लिया था। भाजपा के स्टार प्रचारक शत्रुघ्न सिन्हा चुनावी प्रचार से दूर रहे, और गाहे-बेगाहे वो अपने ही नेतृत्व पर निशाना साधते रहे। राज्य स्तरीय नेताओं में पूरे चुनाव प्रचार में जोश कहीं दिखा। 
  4. चुनाव से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण पर दिया बयान भाजपा के लिए नासूर बन गया। महागठबंधन के नेता जनता को ये समझाने में कामयाब रहे कि भाजपा आरक्षण को खत्म करने के एजेंडे पर काम कर रही है। इसके बाद पीएम मोदी को सफाई देनी पड़ी कि उनके जीते जी आरक्षण को कोई खत्म नहीं कर सकता। 
  5. 'बिहार में एनडीए गठबंधन की हार पर पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे' अमित शाह के इस बयान का नीतीश- लालू गठबंधन ने अल्पसंख्यकों को अपने पक्ष में करने में कामयाबी हासिल की।

मैकेनिकल इंजीनियर से राजनीति तक ऐसा रहा नीतीश कुमार सफर

शशांक शेखर बाजपेई। 

पटना इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेने वाले नीतीश कुमार का जन्म साल 1951 में बिहार के एक दलित परिवार में हुआ था। उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। नीतीश ने राजनीति के गुण जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर और जॉर्ज फर्नाडीज से सीखे थे।

आज बिहार की राजनीति में चाणक्य नाम से मशहूर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर की शुरूआत साल 1977 में हुई थी। तब उन्‍होंने जनता पार्टी के टिकट पर पहला विधानसभा चुनाव लड़ा। साल 1985 को नीतीश बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए।

एनडीए से तोड़ा नाता 

नीतीश कुमार अब तक तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इस बार के चुनाव में उनका गठबंधन जीत की तरफ आगे बढ़ रहा है। मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने एनडीए से पुराना नाता तोड़ लिया था।

पारिवारिक जीवन 

नीतीश का उपनाम मुन्ना है। नीतीश ने 22 फरवरी 1973 को पेशे से इंजीनियर मंजू कुमारी सिन्हा से शादी की थी। नीतीश कुमार का एक पुत्र है जो बीआईटी से ग्रेजुएट है।

ऐसा रहा राजनीतिक सफर 

वर्ष 1987 को नीतीश कुमार बिहार के युवा लोकदल के अध्यक्ष बने और इसके दो साल बाद 1989 में उन्‍हें जनता दल (बिहार) का महासचिव बना दिया गया। अब तक नीतीश ने अच्छी खासी राजनीतिक पहचान बना ली थी। यह वर्ष उनके राजनीतिक जीवन में बड़ा बदलाव लाया।

वर्ष 1989 में नीतीश को 9वीं लोकसभा के लिए चुना गया, जो लोकसभा में उनका पहला कार्यकाल था। इसके बाद साल 1990 में नीतीश अप्रैल से नवंबर तक कृषि एवं सहकारी विभाग के केंद्रीय राज्य मंत्री रहे। साल 1991 में दसवीं लोकसभा का चुनाव हुए नीतीश एक बार फिर से संसद में पहुंचे। इसी साल नीतिश कुमार जनता दल के महासचिव बने और संसद में जनता दल के उपनेता भी बने।

वर्ष 1993 को नीतीश को कृषि समित का अध्‍यक्ष बनाया गया। साल 1996 में वह 11वीं लोकसभा के लिए चुने गए। नीतीश साल 1996–98 तक रक्षा समिति के सदस्य भी रहे। साल 1998 में वह फिर 12वीं लोकसभा के लिए चुने गए। 1998-99 तक रेलवे मंत्री भी रहे। साल 1999 में नीतीश कुमार 13वीं लोकसभा के लिए चुने गए और केंद्रीय कृषि मंत्री बने।

दो बार बने मुख्‍यमंत्री 

साल 2000 नीतीश के राजनीतिक करियर का सबसे अहम मोड़ था। इस साल नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। उनका बेहद अल्‍पकालिक कार्यकाल 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक चला। साल 2000 में नीतीश एक बार फिर से केंद्रीय कृषि मंत्री रहे। साल 2001 में नीतीश को रेलवे का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।

साल 2001 से 2004 तक वह केंद्रीय रेलमंत्री रहे, जिस दौरान 2002 के गोधरा कांड के बाद गुजरात सांप्रदायिकता की आग में जल गया था। साल 2004 में नीतीश 14वीं लोकसभा के लिए चुने गए। साल 2005 में नीतीश कुमार पहली बार सही मायने में मुख्‍यमंत्री बने। यह कार्यकाल 24 नवंबर 2005 से 24 नवंबर 2010 तक चला। 26 नवंबर 2010 को नीतीश कुमार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।

Saturday, July 25, 2015

मानसून सत्र में काम नहीं हुआ, तो बर्बाद होंगे 260 करोड़


शशांक शेखर बाजपेई।
नई दिल्‍ली। संसद में मानसून सत्र शुरू हुए चार दिन पूरे हो चुके हैं। मगर, अभी तक एक भी काम नहीं हो पाया है। यदि विपक्ष इसी तरह अपनी मांगों को लेकर अड़ा रहा, और संसद की कार्रवाई नहीं हो पाई, तो करदाताओं के 260 करोड़ रुपए की बर्बादी होगी। लोकसभा की कार्रवाई के संचालन में 162 करोड़ और राज्‍य सभा की कार्रवाई में 98 करोड़ रुपए का खर्च हो रहा है।

मानसून सत्र का पहला हफ्ता तो बेकार ही चला गया। संसद ने अपने तय समय में से 91 फीसद समय काम ही नहीं किया। लोकसभा में एक घंटे की कार्रवाई पर 1.5 करोड़ रुपए और राज्‍यसभा में एक घंटे की कार्रवाई पर 1.1 करोड़ रुपए का खर्च आता है।

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मानसून सत्र की शुरूआत में नरेंद्र मोदी ने उम्‍मीद जताई थी कि पिछले सत्र में जो काम अधूरे रह गए थे, वे इस सत्र में पूरे हो जाएंगे। इस सत्र के एजेंडे में 11 लंबित बिलों को पारित कराना और नौ नए बिलों को पेश करना था। इसके अलावा एक बिल को विचार के लिए लाना था। लोकसभा में भूमि अधिग्रहण बिल, एससी और एसटी (अत्‍याचार निवारण) संसोधन विधेयक 20
14 पेश किया जाना था।

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वहीं, राज्‍य सभा में विसिलब्‍लोअर प्रोटेक्‍शन (संशोधन) बिल 2015,, मेंटल हेल्‍थ केयर बिल 2013, भ्रष्‍टाचार रोकथाम (संसोधन) बिल 2013, बाल श्रम संसोधन बिल 2012, रियल एस्‍टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) बिल 2013, जुवेनाइल जस्टिस अमेंडमेंट बिल 2015, संविधान के 122वें संशोधन बिल 2014 पर काम होना है। इसके अलावा रेलवे को अधिक अनुदान देने की मांग पर चर्चा और मतदान भी होना है। 

संसद के सत्र के बीच सांसद ने कराया स्‍तनपान, तस्‍वीर हुई वायरल

ब्‍यूनेस आयर्स। विक्‍टोरिया डोंडा पीरेज ने अपनी आठ महीने की बेटी को संसद के सत्र के बीच स्‍तनपान कराना शुरू कर दिया। मामला इस महीने की शुरुआत का है। वह उस वक्‍त अर्जेन्‍टीना नेशनल कांग्रेस की बैठक में हिस्‍सा ले रही थीं। उनकी यह तस्‍वीर इंटरनेट पर वायरल हो गई है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता और पेशे से वकील पीरेज दिसंबर 2007 में अर्जेन्‍टीना नेशनल कांग्रेस की सबसे युवा सदस्‍य बनीं थीं। तब से ग्‍लैमरस 37 वर्षीय पीरेज का निक नाम 'डिपूसेक्‍स' या सेक्‍सी एमपी पड़ गया। हालांकि, बेटी को स्‍तनपान कराने के उनके फैसले को लेकर ऑनलाइन कम्‍युनिटी दो हिस्‍सों में बंट गई है।

कुछ लोगों का मानना है कि पीरेज के इस कदम के बाद वह फेमिनिस्‍ट आईकन बन गई हैं। वहीं, अन्‍य लोगों का मानना है कि सार्वजनिक रूप से ऐसा करना ठीक नहीं है। जुआना नाम की एक महिला ने ट्विटर पर लिखा कि मैं पीरेज के इस कदम की प्रशंसा करती हूं क्‍योंकि कई माएं अपने बच्‍चों को नर्सरी में छोड़ देती हैं, जबकि छोटे बच्‍चों के लिए स्‍तनपान से अच्‍छा कोई दूसरा भोजन नहीं है। जब आपका बच्‍चा रोता है, तो आप बस यही चाहते हैं कि वह चुप हो जाए।

वहीं, एक अन्‍य यूजर ने लिखा कि स्‍तनपान कराने के दौरान उन्‍हें स्‍पेशल ब्रा से अपने स्‍तनों को ढंक लेना चाहिए था। अपने स्‍तनों को दिखाकर आस-पास के लोगों को दिखाना ठीक नहीं था। वहीं इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि क्‍या सांसद पूर्णकालिक मां की भूमिका के महत्‍व को पूरा करने का उदाहरण पेश करना चाहती थीं। ये तस्‍वीरें पेरू21 न्‍यूजपेपर में प्रकाशित हुईं थीं। 

यौन शोषण करने वाले आरके पचौरी को पीडि़ता का खुला पत्र

महिला वर्कर से यौन शोषण के आरोप में घिरे आरके पचौरी को टेरी चीफ के पद से हटा दिया गया है। यह खुला पत्र उस लड़की ने लिखा है,‍ जिसका पचौरी ने यौन उत्‍पीड़न किया था। पढि़ए उस मजबूर लड़की ने क्‍या लिखा.....

हममें से कई लोगों के लिए एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्‍टीट्यूट में एक ब्रेक पाना किसी सपने के सच होने जैसा है। मैं उस काम को करने जा रही थी, जो मेरे दिल के काफी करीब है और उस व्‍यक्‍ित के साथ करने जा रही थी, जिसकी इस विषय में वैश्विक पहचान है। यह बड़े गर्व की बात थी कि वह व्यक्ति भारतीय था और दूसरे लोग जो विदेश में बसने चले जाते हैं उनके विपरीत उसने रहने के लिए दिल्ली को चुना था। मैं उससे मिलने को व्‍याकुल थी।

मगर, जल्‍द ही मेरे जुनून और गर्व में दरारें पड़ना शुरू हो गईं, जो आने वाले महीनों में इतनी गहरी हो गईं कि मैं खुद को टूटा हुआ और असहाय महसूस करने लगी। हम सभी अपनी जिंदगी में तनाव महसूस करते हैं, लेकिन यह अप्रत्‍याशित था। मेरे जैसे किसी के लिए, जिसने काफी दुनिया घूमी है और सभी तरह के इंसानों से मिली हो। मैं अपने बुरे सपने में भी नहीं सोच सकती कि जिससे मिलने के लिए मैं इतनी उत्‍सुक थी, वह इस तरह का निकलेगा।

मैं मानसिक रूप से थकी हुई घर लौटती थी और खालीपन महसूस करती थी, जैसे किसी ने मेरे आंतरिक अंगों को काटकर बाहर फेंक दिया गया है। दुर्भाग्‍य से कानूनों के तहत उस पर सिर्फ यौन उत्पीड़न का मुकदमा चलाया जा सकता है। मानसिक यातना के लिए नहीं।

मैं आगे बढ़ी और 13 फरवरी 2015 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। मगर, प्रेस में मामला आने के पांच दिनों बाद एफआईआर दर्ज हो सकी। मैं खुशकिस्‍मत समझती हूं कि मेरा परिवार मेरे साथ खड़ा है। मेरे पापा के शब्‍द थे - अपराध में चुप बैठना अपराध के एक हिस्‍से की शुरुआत है।

मैंने संस्‍थान के वार्षिक कार्यक्रम का इंतजार किया और उत्‍पीड़न का यह मामला टेरी की इंटरनल कम्‍प्‍लेंट्स कमेटी (आईसीसी) में 9 फरवरी को दर्ज कराया। मुझे सुरक्षित महसूस करना था। मगर, हकीकत जुदा थी। एचआर प्रमुख ने पूछा मैं चुप क्‍यों नहीं रहती। मुझे बताया गया कि यदि ऐसी शिकायत सार्वजनिक हो गई, तो मेरी प्रतिष्‍ठा पर सवाल उठेंगे।

उत्‍पीड़न एक खुला रहस्‍य था और संगठन में काम करने वाले अन्‍य लोग भी इसके गवाह थे। मगर, कोई भी नहीं बोला। आईसीसी के सामने कुछ चुनिंदा लोगों ने ही मेरे बयान का समर्थन किया। टेरी की ओर से कोई भी मुझे सांत्‍वना देने नहीं आया। मुझे निजी वकील करना पड़ा, जबकि यह संगठन की जिम्‍मेदारी थी कि वह मुझे वकील मुहैया कराता।

सत्‍ता, रसूख और पैसे का खेल जल्‍द ही खुल गया। कोर्ट के कई आवेदनों और वरिष्‍ठ वकीलों के साथ दिन के 24 घंटे का समय कम लगने लगा था। इसमें वकीलों के साथ मुलाकात, कागजी कार्यवाही, आगे की जिंदगी की प्‍लानिंग, बीमारी से उबरना यह सब मेरे दिनों में साथ-साथ चल रहे थे।

अमीर और प्रसिद्ध लोगों पर अलग नियम लागू होते हैं। मेरे पास पीआर फर्म करने के लिए पैसे नहीं थे, जबकि दूसरी तरफ से तीन पीआर फर्म बदली गईं। तटस्‍थ होने का नया अर्थ पता चला। संगठन के लिए इसका अर्थ था डायरेक्‍टर जनरल का पक्ष लेना। इसका अर्थ था आईसीसी को भयभीत करना।

कुछ कर्मचारी आईसीसी की रिपोर्ट पूरी करने से पहले उसके सदस्‍यों के घर देर रात जाते थे। गवर्निंग काउंसिल के लिए इसका अर्थ था संज्ञान में नहीं लेना, अकेले प्रतिक्रिया देते रहना (3 अप्रैल 2015 को लिखे मेरे दुखी पत्र के बारे में)। इसका अर्थ था मेरे चरित्र पर टिप्‍पणी करना।

इसका अर्थ था पुलिस जांच में सहयोग नहीं करना। इसका अर्थ था मुझे मेरा वेतन नहीं देना। इसका अर्थ था दोषी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना। इसका अर्थ था उनका फूलों और मालाओं से स्‍वागत करना। आखिरकार, डायरेक्‍टर जनरल को हटाने का बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया गया।

सच में? आश्‍चर्य की बात यह है कि टेरी की ओर से जारी की गई प्रेस रिलीज वही थी, जो डायरेक्‍टर जनरल की पीआर फर्म ने इससे पहले जारी की थी। फर्म टेरी की ओर से काम कर रही थी या डीजी की ओर से? इसने मुझे चौंका दिया कि डीजी के रिप्‍लेसमेंट का मेरी शिकायत से कोई लेना देना था? उस कार्रवाई का क्‍या हुआ, जो मेरी शिकायत पर की जानी थी? सजा कहां हुई? मुझे तोड़ने के प्रयासों के बीच लड़ाई जारी है। यह मेरी दृढ़ता को नहीं तोड़ सकती। 

Saturday, July 18, 2015

नेल्‍सन मंडेला : अफ्रीका का 'महात्‍मा'

शशांक शेखर बाजपेई।  
नवम्बर 2009 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने रंगभेद विरोधी संघर्ष में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्‍ट्रपति नेल्‍सन मंडेला के योगदान को देखते हुए उनके सम्मान में उनके जन्मदिन (18 जुलाई) को 'मंडेला दिवस' घोषित किया। 

वो ऐसी शख्सियत थे, जिनका जन्मदिन अंर्तराष्ट्रीय दिवस के रूप में उनके जीवन काल में ही मनाया जाने लगा था। नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति थे। मंडेला 10 मई 1994 को दक्षिण अफ्रीका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बने। 

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा था कि, मंडेला संयुक्त राष्ट्र के उच्च आर्दशों के प्रतीक हैं। दक्षिण अफ्रीका में सदियों से चल रहे रंगभेद का विरोध करने वाले अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और इसके सशस्त्र गुट उमखोंतो वे सिजवे के वह अध्यक्ष रहे। रंगभेद विरोधी संघर्ष के कारण उन्होंने 27 साल के लिए रॉबेन द्वीप के कारागार में डाल दिया गया, जहां उन्‍हें कोयला खनिक का काम करना पड़ा।

वर्ष 1990 में श्वेत सरकार से हुए एक समझौते के बाद उन्होंने नए दक्षिण अफ्रीका का निर्माण किया। इसी वर्ष यानी 1990 में भारत ने उन्हें भारत के सर्वोच्च पुरस्कार 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। मंडेला, भारत रत्न पाने वाले पहले विदेशी हैं। वर्ष 1993 में नेल्सन मंडेला और डी क्लार्क दोनों को संयुक्त रूप से शान्ति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया।वे दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ पूरी दुनिया में रंगभेद का विरोध करने के प्रतीक बन गए।

उन यातनाओं ने बनाया क्रांतिकारी

विद्यार्थी जीवन में उन्हें रोज याद दिलाया जाता कि उनका रंग काला है और सिर्फ इसी वजह से वह यह काम नहीं कर सकते। उन्हें इस बात का एहसास करवाया जाता कि अगर वे सीना तान कर सड़क पर चलेंगे, तो इस अपराध के लिए उन्हें जेल जाना पड़ सकता है। ऐसे अन्याय ने उनके अन्दर असंन्तोष भर दिया और एक क्रान्तिकारी तैयार हो रहा था।

अफ्रीका के गांधी पर गांधीजी का प्रभाव

पूरी दुनिया महात्‍मा गांधी के विचार काल और सीमाओं से परे हैं। उनसे प्रभावित लोगों में नेल्सन भी थे। वैचारिक रूप से वह स्वयं को गांधी के करीब पाते थे, और यह प्रभाव उनके द्वारा चलाए गए आन्दोलनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था।

नेल्सन मंडेला ने गांधीवादी विचारों से प्रेरणा लेकर रंगभेद के खिलाफ अपने संघर्ष की शुरुआत की और दक्षिण अफ्रीका के दूसरे गांधी बन गए। मंडेला ने अन्याय के विरुद्ध क्रोध को रचनात्मक रूप दिया। अहिंसा का सशक्त रास्ता ढूंढा और उससे अफ्रीका की आजादी के आंदोलन के साथ साथ व्यक्‍ितगत तौर पर भी लोगों में अहिंसक धारा की बात मन में जुड़ी।

मैं काली और गोरी हुकूमत के खिलाफ हूं

सन् 1984 में मडेला ने रिवियोना ट्रायल के समय साढे़ चार घंटे की स्पीच दी। उन्‍होंने भाषण के आखिर में कहा - मैं काली हुकूमत के खिलाफ लड़ा हूं और मैं गोरी हुकूमत के खिलाफ लड़ा हूं। मैंने हमेशा एक ऐसे लोकतांत्रिक देश के आदर्श को पोषित किया है जहां मुक्‍त समाज हो, जिसमें सभी लोग सौहार्द और समान हक के साथ रहते हों। यह एक ऐसा आदर्श है, मैं जिसके लिए जीना और जिसे हासिल करना चाहूंगा। पर अगर जरूरत पड़ी तो मैं इसके लिए मरने के लिए भी तैयार रहूंगा।

सम्मान में झुकी दुनिया

लंबी बीमारी के बाद मंडेला का 5 दिसंबर 2013 में निधन हो गया था। दुनिया में उनके सम्‍मान का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा सहित दुनिया के करीब 100 नेताओं ने मंडेला को श्रद्धांजलि देते हुए 'इतिहास का पुरोधा' करार दिया। 

प्रणब मुखर्जी, बराक ओबामा, संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून और अफ्रीकी संघ आयोग की अध्यक्ष कोसाजाना डलामिनी जुमा सहित 53 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष व शासनाध्यक्ष 95 हजार सीटों की क्षमता वाले एफएनबी स्टेडियम में आयोजित दो घंटे की शोकसभा में शामिल हुए थे।

नेल्सन मंडेला के कथन 
  • बड़े गर्व की बात कभी न गिरने में नहीं, बल्कि हर बार गिर कर उठने में है।
  • हर व्यक्ति के लिए रोटी, कपड़ा और मकान के साथ काम भी होना चाहिए।
  • छोटा काम करना या छोटी सोच वालों के साथ रहने से कोई फायदा नहीं है। आप जिस तरह का जीवन व्यतीत कर सकते हैं, उससे कम स्तर की जिंदगी जीना गलत है।
  • पीछे रहकर नेतृत्व करना और टीम को आगे करना सबसे अच्छा तरीका है। खासतौर पर तब जब जीत की खुशियां मनाई जाएं। तभी आगे आएं, जब खतरा दिखे या टीम गलत राह में जाती हुई दिखे। इससे दूसरों की नजरों में आपकी इज्‍जत बढ़ जाएगी।
  • मेरे देश में लोग पहले जेल जाते हैं और फिर राष्ट्रपति बन जाते हैं।
  • यदि आप किसी व्यक्ति से उस भाषा में बात करें जो वो समझता है, तो बात उसके सर में जाती है। यदि आप उससे उसकी भाषा में बात करते हैं, तो बात उसके दिल तक जाती है।
  • शिक्षा सबसे मत्वपूर्ण हथियार है क्योंकि इसी से ही दुनिया बदली जा सकती है।
  • मैं जातिवाद से घृणा करता हूं, मुझे यह बर्बरता लगती है। फिर चाहे वह अश्‍वेत व्यक्‍ित से आ रही हो या श्‍वेत व्यक्‍ित से।
  • शत्रु के साथ आपको शांति अगर चाहिए, तो आपको अपने शत्रु के साथ काम करना होगा। फिर वह आपका साथी बन जाएगा।
  • एक अच्छा दिमाग और एक अच्छा दिल हमेशा से विजयी जोड़ी रहे हैं।
  • एक बड़े पहाड़ पर चढ़ने के बाद यही पता चलता है कि अभी ऐसे कई पहाड़ चढ़ने के लिए बाकी हैं।
  • दूसरों के काम और जिंदगी में तभी दखल दीजिए जब वे लोग शांति पसंद करते हों।
  • लोगों को काम के लिए प्रोत्साहित करना और अहसास कराना की ये उन्हीं का सुझाव था, ये सबसे समझदारी की बात है।
  • जब पानी उबलने लगे तो आंच धीमी करने से कोई फायदा नहीं होगा। यानी जब समस्या बढ़ जाए तो उसे शांत करने से अच्छे नतीजे नहीं मिलेंगे।
  • आजाद होने के लिए पूरी दुनिया में कोई भी आसान रास्ता नहीं है।
  • जीवन में कभी न गिरना उसकी सुंदरता नहीं है, लेकिन गिरकर उठना और अपने सपनों को हासिल करना जिंदगी की खूबसूरती है।
  • जब तक काम कर न लिया जाए, तब तक वह काम असंभव लगता है।

Thursday, July 2, 2015

आठ तरह के नोटिस जारी करता है इंटरपोल

शशांक शेखर बाजपेई। 
shashank shekhar 

आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी को ब्रिटेन से वापस लाने की कवायद भी शुरू हो गई है। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। ललित मोदी को प्रत्यर्पित कर भारत लाने में छह महीने से अधिक का समय लग सकता है। यह कहना है प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का।

इस बारे में ईडी सूत्रों का कहना है कि अभी ललित मोदी के खिलाफ अदालतों में मामले चल रहे हैं। सुनवाई पूरी हुए बिना उनके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी नहीं किया जा सकता। ललित मोदी के खिलाफ फेमा के 16 मामले दर्ज हैं। जानते हैं क्‍या है इंटरपोल और कितने तरह के नोटिस वह जारी करता है। 

क्‍या है इंटरपोल

इंटरपोल नोटिस सूचना के आदान-प्रदान की पद्धति है। दुनियाभर की कई देशों की पुलिस इस संगठन से जुड़ी है। इसके तहत कोई सदस्‍य देश अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर सहयोग या सचेत करने का आवेदन करता है। नेशनल सेंट्रल ब्‍यूरो के आग्रह पर इंटरपोल का जनरल सेक्रेट्रिएट नोटिस जारी करता है। इसके बाद आधिकृत संस्‍थाएं इस सूचना को संगठन की आधिकारिक भाषाओं अरबी, अंग्रेजी, फ्रेंच और स्‍पेनिश में प्रकाशित करता है।


इंटरपोल आठ प्रकार के नोटिस जारी करता है, जो अपने रंगों से पहचाने जाते हैं। ये रंग हैं लाल, नीला, हल्‍का नीला, हरा, पीला, काला, नारंगी और बैंगनी। लाल नोटिस आमतौर पर किसी अपराधी की गिरफ्तारी और उसके प्रत्‍यपर्ण के लिए होता है। नीला नोटिस किसी व्यक्ति के बारे में अतिरिक्त सूचना देने या पाने के लिए जारी किया जाता है।

हरा नोटिस ऐसे व्यक्तियों के बारे में चेतावनी जो अपराध कर चुके हैं, और जिनके बारे में आशंका है कि वे दूसरे देश में जाकर भी अपराध कर सकते हैं। पीला नोटिस गुमशुदा (आमतौर पर नाबालिगों) के बारे में सूचनाएं देने के लिए प्रकाशित किया जाता है। काला नोटिस किसी लाश की शिनाख्त न होने पर जारी होता है। इसी तरह नारंगी बमों, पार्सल बमों आदि की सूचना देने के लिए जारी होता है।


इसके अलावा इंटरपोल-संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद नोटिस उन व्‍यक्‍ितयों और संस्थों को लेकर जारी होता है, जिन पर सुरक्षा परिषद पाबंदियां लगाती हैं। बैंगनी रंग का नोटिस अपराध के तरीके, वस्‍तुएं, डिवाइस और अपराधियों द्वारा बचने के लिए उपयोग किए गए तरीकों के इस्‍तेमाल के लिए जारी किया जाता है।

Wednesday, July 1, 2015

15 साल में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में दूसरा डिफॉल्टर देश बना ग्रीस

शशांक शेखर बाजपेई। 
ग्रीस अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का डिफॉल्टर बनने वाला दुनिया का पहला विकसित देश बन गया है। पिछले 15 वर्षों में यह दूसरा मौका है जब आईएमएफ से किसी देश को डिफॉल्‍टर घोषित किया गया है। इससे पहले 2001 में जिम्बाब्वे ने समय पर कर्ज नहीं चुकाया था। जीवनस्तर के लिहाज से चूक करने वाला यूनान सबसे अमीर देश होगा।

वह तय समयसीमा के अंदर आईएमएफ को कर्जे का 1.7 अरब डॉलर नहीं लौटा पाया है। आईएमएफ के फंड प्रवक्ता गेरी राइस ने कहा कि मैं इस बात की पुष्टि करता करता हूं कि संगठन को समय सीमा के अंदर ग्रीस से पैसे वापस नहीं मिले। उन्होंने कहा कि हमने अपने एग्जीक्यूटिव बोर्ड को सूचना दे दी है कि ग्रीस पर बहुत बकाया हो गया है और उसे अब आईएमएफ से फंड तभी मिल सकता है, जब वह पिछले बकाए का भुगतान कर दे।
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इससे पहले ग्रीस ने साफ कह दिया था कि वह कर्ज का भुगतान नहीं कर पाएगा। इस बीच चिंता की बात यह है कि ग्रीस का यूरोपीय संघ, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और आईएमएफ जैसे कर्जदाताओं से अंतरराष्ट्रीय बेलआउट प्रोग्राम की अवधि भी समाप्त हो चुकी है। ग्रीस संकट से यूरो क्षेत्र टूट सकता है और इस बात की भी आशंका है कि अन्य समस्याग्रस्त देशों पर इसका प्रभाव पड़ेगा।

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ग्रीस संकट : कर्ज लेकर घी पीया, अब दीवालिया हो गया 'अमीर' देश

शशांक शेखर बाजपेई। 

ग्रीस संकट क्‍या है और वह कैसे इस स्थिति में पहुंच गया कि उसकी अर्थव्‍यवस्‍था ही दीवालिया होने की कगार पर पहुंच गई। यह जानने के लिए थोड़ा पीछे चलना होगा। वर्ष 2004-09 के दौरान सत्ता संभालने वाली दक्षिणपंथी रुझान वाली मध्यमार्गी सरकार ने जर्मनी सहित कई देशों की बैंकों से बहुत कर्ज लिया। ग्रीस सरकार अपनी कमाई से अधिक राशि कर्ज के भुगतान पर खर्च कर रही है। मगर, इस मामले पर कोई चर्चा नहीं हो रही है।

माना जा रहा था कि यूरो संकट टलने के बाद से एथेंस को जो कर्ज मुहैया कराया जा रहा है, वह उसकी अर्थव्यवस्‍था को मजबूती दे रहा है। लेकिन इस कर्ज का बड़ा हिस्‍सा ग्रीस दूसरे कर्जों और उनके ब्याज को चुकाने पर ही खर्च करता रहा।

पिछले दो वर्षों से यही हो रहा है। यानी एक कर्ज को चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेना और दूसरे को चुकाने के लिए तीसरा। ग्रीस सरकार अपने लोगों पर जितना खर्च करती है, उससे कहीं ज्यादा राजस्व इकट्ठा करती है, ताकि कर्जदाताओं को शांत रखा जा सके।

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फिलहाल इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ग्रीस को संकट से उबारने के बजाय सरकार, कर्जदाता देशों के बैंकों को मुनाफा पहुंचाने पर ज्यादा फोकस है। इस पूरी प्रक्रिया में ग्रीस की सरकार बिचौलिये की भूमिका में है। वह विदेशों से पैसा कर्ज लेती है और देश में दूसरे कर्जदारों को बांटती है और देश के कर्जदारों से अधिक ब्‍याज वसूलकर कर्ज की अदायगी करती है।

इस पूरे प्रकरण में होने वाले नुकसान को कर्ज लेने वाले और देने वाले, दोनों पक्ष आपस में बांट लें। निजी कर्जदाताओं का ज्यादातर कर्ज चुका दिया गया है और अब ग्रीस इस स्थिति में नहीं है कि वह अधिक भुगतान कर सके। 30 जून को उसे अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष का करीब 1.8 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया। 

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ग्रीस की समस्‍या वहां के कमजोर बैंक हैं। वे यूरोपीय केंद्रीय बैंक से कर्ज ले रहे हैं। अगर इस कर्ज को रोका गया, तो ग्रीस का पूरा बैंकिंग तंत्र बिखर जाएगा। ग्रीस के लिए जरूरी है कि केंद्रीय बैंक की साख बनी रहे। हालांकि, यह आखिरकार जर्मनी और दूसरे कर्जदाता देशों के नजरिये पर भी निर्भर है।

यूरोजोन से निकलने का असर

बैंक ऑफ ग्रीस ने यूरोजोन से निकलने को बड़े दुर्भाग्‍य के रूप में पेश किया है। वहां ऐसी स्थिति होने पर अधिक मंदी, बेरोजगारी में इजाफा और आमदनी में गिरावट होगी। ग्रीस में तख्तापलट का इतिहास रहा है और ऐसी स्थिति में वहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। इसके साथ ही आम ग्रीस निवासियों की बचत का अवमूल्यन हो जाएगा और अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की संभावना नगण्‍य हो जाएगी।

यूरोजोन को छोड़ने के बाद ग्रीस को मजबूरन रूस की सहायता लेनी पड़ सकती है। सिप्रास ने पहले ही यूक्रेन के मसले पर रूस पर प्रतिबंध का विरोध कर यूरोपीय एकता को चुनौती दी थी। ग्रीस के यूरोजोन से बाहर होने पर रूस के इस सिद्धांत को बल मिलेगा कि यूरोपीय संघ अपने अवसान की ओर है और जल्द ही बिखर जाएगा।

वैश्विक संबंधों में बदलाव

इटली के साथ ग्रीस को भी मध्यपूर्व और उत्तर अफ्रीका से आने वाले आप्रवासियों का भार सहना पड़ रहा है। ग्रीस के रक्षा मंत्री पैनोस कैमेनोस ने धमकी दी थी कि अगर ग्रीस को दिवालिया होने दिया गया तो वो पूरे यूरोप को आप्रवासियों से ‘पाट’ देगा। उधर, मॉस्‍को की ओर ग्रीस के झुकाव का सीधा अर्थ अमेरिका और गठबंधन देशों से दूरी होना है। ऐसे में वैश्‍िवक संबंधों में बदलाव हो सकते हैं।

Friday, June 5, 2015

जानना चाहेंगे क्‍या है मैगी में ऐसा जिसके कारण वह हो गई बैन

दो मिनट में पकने वाली मैगी को लेकर पिछले कुछ दिनों से देश लगातार उबल रहा है। मध्‍य प्रदेश, उत्‍तराखंड, केरल, दिल्‍ली, गुजरात सहित कई राज्‍यों में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसकार कारण मैगी में तय मात्रा से अधिक पाया गया लेड और मोनो सोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) है। एमएसजी को आम बोलचाल की भाषा में अजीनोमोटो भी कहते हैं। जानते हैं अजीनोमोटो और इसके शरीर पर पड़ने वाले दुष्‍प्रभावों के बारे में।

ऐसा है अजीनोमोटो

यह चमकीला सफेद रंग का सोडियम साल्ट है। खाद्य पदार्थो का स्वाद बढ़ाने वाला यह मसाला वास्तव में एक धीमा जहर है। जो हमारी स्वाद ग्रंथियों को दबा देता है, जिससे हमें खराब खाने के स्वाद का पता नहीं चलता। अजीनोमोटो का उपयोग करके खाद्य पदार्थ की घटिया गुणवत्ता को दबाया भी जाता है। एक किलो खाद्य सामग्री में 50 मिलीग्राम अजीनोमोटो डाला जा सकता है। चिकित्सकों के अनुसार अजीनोमोटो का अत्यधिक और लगातार सेवन करने से कैंसर समेत कई गंभीर बीमारी हो सकती हैं।

अजीनोमोटो के दुष्प्रभाव

सिरदर्द : अधिकतर चाइनीज डिश में इस्‍तेमाल होने वाले अजीनोमोटो की यदि खाने में मात्रा अधिक हो, तो इसके कारण सिर में दर्द हो सकता है। इसे चाइनीज रेस्‍टोरेंट सिंड्रोम भी कहा जाता है।

मोटापा : चूहों पर किए गए शोध से पता चला है कि एमएसजी खाने और मोटापे के बीच संबंध है। एक्‍सरसाइज से मोटापे को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। शरीर में वसा जमा करने की क्षमता को एमएसजी प्रभावित करता है।

जब किसी खाने में एमएसजी को मिला दिया जाता है, तो उसके स्‍वाद के कारण उसे लोग सामान्‍य से अधिक खाते हैं। संभवत: ऐसा इसलिए होता है क्‍योंकि एमएसजी लेप्टिन हार्मोन को प्रभावित करता है, जो भूख के संकेत भेजता है।

कैंसर : अधिक मात्रा में एमएसजी खाने वाले लोगों को पेट के कैंसर होने की पहली बार जानकारी भारत में मिली। अध्‍ययन में पाया गया कि कैंसर से लड़ने वाले कुछ एंटी-ऑक्‍सीडेंट्स को एमएसजी प्रभावित करता है। यह काफी चौंकाने वाला है क्‍योंकि कैंसर रोगियों के खाने में इसकी मौजूदगी से उनके उपचार और बीमारी में सुधार की गुंजाइश कम हो जाती है।

हालांकि, इस मामले को लेकर विवाद है। जहां अंतरराष्‍ट्रीय एंटी कैंसर ऑर्गेनाइजेशन ने एमएसजी के उपभोग को हरी झंडी दे दी है। वहीं, भारतीय होटलों में पेट के कैंसर से संबंधित होने के कारण इसका सीमित इस्‍तेमाल किया जाता है।

अस्‍थमा : जिन लोगों में अस्‍थमा होने की आशंका अधिक है, उनके लिए एमएसजी का प्रयोग घातक हो सकता है। यह अस्‍थमा के अटैक को बढ़ा सकता है। हालांकि, हो सकता है कि अस्‍थमा का अटैक एमएसजी लेने के बाद तत्‍काल नहीं आए। इसे खाने के छह घंटे या अधिक समय बाद अस्‍थमा का अटैक आ सकता है। इसलिए कुछ लोग अस्‍थमा और एमएसजी के बीच संबंध होने की बात नकारते हैं।

प्रजनन क्षमता : चूहों पर किए गए शोध के अनुसार, एमएसजी से पुरुषों और महिलाओं दोनों की प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है। वर्ष 1970 में किए गए शोध के अनुसार, अधिक मात्रा में एमएसजी खाने वाली महिलाओं में गर्भधारण नहीं होने के मामले सामने आए थे।

सीसा के दुष्‍प्रभाव 
मैगी में सीसा भी पाया गया है। भारी तत्‍व में गिना जाने वाला लेड यानी सीसा भी सेहत के लिहाज से हानिकारक है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के अनुसार, इसके कारण छह लाख बच्‍चों में मानसिक विकलांगता आती है। अनुमान है कि इसके कारण
सालाना एक लाख 43 हजार लोगों की मौत हो जाती है।

दिमाग, हड्डी, किडनी, लीवर पर इसका बुरा असर पड़ता है। गर्भवती महिलाओं में गर्भपात, मरा बच्‍चा पैदा होना, समय से पहले बच्‍चे का जन्‍म होना, बच्‍चे का वजन कम होना जैसी समस्‍याएं इससे जुड़ी हैं। इसके अलावा बच्‍चों में मानसिक विकलांगता, आईक्‍यू कम होना, पढ़ाई में दिक्‍कत होना, कम ध्‍यान देना, व्‍यवहार में परेशानी आदि आती हैं।

The harmful effects of monosodium glutamate and lead

Thursday, May 28, 2015

ज्‍योतिषियों की राय में दो जून के आस-पास प्राकृतिक आपदा की आशंका

शशांक शेखर बाजपेई।

कैलिफोर्निया में स्थानीय समयानुसार कल शाम चार बजे 9.8 तीव्रता का भूकंप आने वाला है? डच रिसर्चर फ्रैंक होगेरबीट्स की इस भविष्यवाणी की दुनियाभर में हलचल है। उनका कहना है कि भारतीय समयानुसार शुक्रवार सुबह करीब 4.30 बजे पृथ्वी और चंद्रमा की स्थिति बदलेगी। फ्रैंक ने इस संबंध में एक वीडियो भी जारी किया है, जिसे करोड़ों लोग देख चुके हैं।
हालांकि, ज्‍योतिषियों के अनुसार चंद्रमा की स्थिति के कारण कल की तारीख में ऐसा होने की आशंका नहीं है। उज्‍जैन की पंडित रश्मि शर्मा ने बताया क‍ि मंगल और शनि एक दूसरे को देख रहे हैं। दो-तीन जून को चंद्रमा भी नीच का होकर शनि के साथ आ जाएगा। ऐसे में प्राकृतिक आपदा के योग बनेंगे। ऐसे ही योग 25 अप्रैल को भी बने थे, तब नेपाल में भूकंप आया था।
पं. रश्मि शर्मा ने बताया कि दो-तीन जून के आस-पास भूकंप, सुनामी जैसी कोई प्राकृतिक आपदा आने की आशंका अधिक प्रबल रहेगी। इसमें भी जिन देशों के नाम 'न' या 'आर' से शुरू होते हैं (जैसे नेपाल या रशिया), वहां इस तरह की आपदा आने की आशंका अधिक है।
वहीं, दिल्‍ली के पंडित जयगोविंद शास्‍त्री के अनुसार, डच शोधकर्ता का दावा गलत है। उन्‍होंने बताया कि चंद्रमा वर्तमान में अपने नक्षत्र हस्‍त पर है। इसलिए कल वह कोई नकरात्‍मक असर नहीं दिखाएगा। पं. जयगोविंद ने बताया कि सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध और राहू ये पांच ग्रह पृथ्‍वी तत्‍व की राशि पर हैं। इसलिए चंद्रमा का प्रभाव कमजोर रहेगा।
पंडितजी के अनुसार, चंद्रमा की स्थिति में दो जून के आस-पास बदलाव होने से भारत के उत्‍तर और दुनिया के उत्‍तरी भाग में प्राकृतिक उथल-पुथल के योग जरूर बन रहे हैं। बहरहाल, तारीख को लेकर भले ही मतभेद हों, लेकिन ज्‍योतिषी भी आने वाले समय में जल्‍द ही प्राकृतिक आपदा की आशंका जाहिर कर रहे हैं।

Tuesday, May 26, 2015

विकास को रफ्तार देने और अपनी क्षवि सुधारने का मौका चूके सांसद


शशांक शेखर बाजपेई 

केंद्र सरकार का एक साल पूरा हो गया है। उसके एक साल के क्रियाकलापों का रिपोर्ट कार्ड बीते कई दिनों से अलग-अलग अखबारों में अपने अपने तरीके से पेश हो रहा है। प्रधानमंत्री ने खुद एक साल पूरा होने पर सरकार के कामों का लेखा-जोखा लोगों के सामने रखा। इस बीच सरकार की 'सांसद आदर्श ग्राम योजना' के बारे में कोई खास चर्चा नहीं हुई।

हैरान करने वाली बात है कि उत्‍तर प्रदेश में करीब 65 फीसद सांसदों ने अपने गोद लिए गांव में एक साल में कोई विकास कार्य शुरू ही नहीं किया। यह देश के विकास को रफ्तार देने के साथ ही नेताओं की अपनी निजी क्षवि को सुधारने का बेहतरीन अवसर हो सकता था।

मगर, एक साल बीत जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर बदलाव की शुरुआत तक नहीं हुई। अब इसे जनप्रतिनिधियों की लापरवाही कहें या उनकी कामचोरी की लत, लेकिन बड़ी संख्‍या में सांसदों ने अपने गोद लिए गांवों को एक बार जाकर देखा तक नहीं है। न ही उन्‍होंने वहां अपने किसी प्रतिनिधि को गांव भेजने की जहमत उठाई है।

सांसद आदर्श ग्राम योजना की घोषणा 

लोकनायक जयप्रकाश के जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्टूबर, 2014 को सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत करने की घोषणा की थी। मकसद था कि सांसद एक-एक गांव को गोद लें और सांसद निधि से मिलने वाले पैसों को गांवों के विकास में लगाएं। गांवों का विकास होगा, तो काम की तलाश में शहरों की ओर होने वाला पलायन रुकेगा। वहां के जीवन स्‍तर में सुधार आएगा साथ ही शहर में बढ़ते जनसंख्‍या के दबाब को कम करने में भी मदद मिलती।

मोदी के गांव में दिखा असर 

योजना शुरू होने के बाद मोदी ने इस योजना के तहत अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के जयापुर गांव को गोद लिया था। यहां बदलाव की शुरुआत होती दिखने लगी है। वाराणसी-इलाहाबाद हाइवे के पास होते हुए भी इस गांव का नाम भी कम ही लोग जानते थे। योजना की शुरुआत के बाद यहां डाकघर, बैंक और कई मकानों का निर्माण हो चुका है। विकास की रफ्तार धीमी भले ही हो, लेकिन कम से कम जमीनी स्‍तर पर काम होता हुआ दिखने तो लगा है।

देश में आज भी अर्थव्‍यवस्‍था में सबसे अधिक योगदान कृषि कार्य से या यूं कहें कि ग्रामीण भारत से ही आता है। गांधीजी कहा करते थे, गांवों की ओर चलो। गांव सशक्‍त होंगे, तो देश मजबूत होगा। मगर, अभी तक गांव की ओर कोई सांसद जाने को तैयार नहीं है।

इन दिग्‍गजों को नहीं सुध 

समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपने संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ के तमोली गांव, बसपा प्रमुख मायावती ने लखनऊ के माल गांव, कांग्रेस अध्यक्ष और रायबरेली की सांसद सोनिया गांधी ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी राणा बेनी माधव बख्श सिंह के पैतृक गांव उड़वा, राहुल गांधी ने अमेठी के डीह गांव को गोद लिया था। मगर, इनमें से किसी दिग्‍गज ने इन गांवों में जाना तो दूर अपने प्रतिनिधि को भी वहां भेजना मुनासिब नहीं समझा।

शिवराज से उम्‍मीद

इस बीच मध्‍य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 13 मई 2015 को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की समीक्षा बैठक में हर गांव को अगले पांच साल में स्मार्ट विलेज बनाने के निर्देश दिए। उन्‍होंने कहा कि स्मार्ट विलेज का सुनियोजित ढंग से विकास होगा। इसके लिए अगले एक माह में एकीकृत ग्राम विकास योजना बनाई जाएगी। मगर, देखना यह होगा कि शिवराज सिंह के यह निर्देश भी खालिस कागजों तक ही न सिमट के रह जाएं। 

Tuesday, April 14, 2015

जानिए क्‍या है नेट न्‍यूट्रैलिटी और आपके लिए क्‍यों है जरूरी

शशांक शेखर बाजपेई

नेट न्‍यूट्रैलिटी या नेट तटस्‍था शब्‍द आजकल काफी चलन में है। दरअसल, इसका अर्थ है मोबाइल पर बगैर भेदभाव के इंटरनेट आधारित सेवा देना। टेलीकॉम कंपनियां इसके खिलाफ हैं, लेकिन इसके हट जाने से आम आदमी को नुकसान होगा। यह शब्द पहली बार कोलंबिया विश्वविद्यालय के मीडिया विधि के प्राध्यापक टिम वू द्वारा 2003 में उपयोग किया गया था।
दरअसल, अभी जब कोई उपभोक्‍ता किसी भी ऑपरेटर से डाटा पैक लेते हैं, तो वह उससे नेट सर्फिंग, वॉट्सऐप, वाइबर, स्काइप, वॉइस या वीडियो कॉल कर सकता है। अभी इस पर एक ही दर से शुल्क लगता है, जो इस पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति ने कितना डाटा उपयोग किया है। यही नेट न्यूट्रैलिटी कहलाती है।
सीधी भाषा में ऐसे समझें
इसे सीधी भाषा में इस तरह से समझ सकते हैं कि आप बिजली के इस्‍तेमाल के लिए बिल देते हैं। मगर, कंपनियां यह नहीं कहती है कि टीवी चलाने पर बिजली की दर अलग होगी और फ्रिज या कंप्‍यूटर चलाने पर अलग। वॉशिंग मशीन के लिए बिजली का उपयोग करने पर वह उसकी दर अलग होगी और एसी इस्‍तेमाल करने पर अलग। मगर, नेट तटस्‍थता खत्‍म होने के बाद इंटरनेट डाटा की हर सुविधा के लिए अलग-अलग भुगतान करना पड़ेगा।
कंपनियों को फायदा, लोगों को नुकसान
इससे टेलीकॉम कंपनियों को फायदा होगा, लेकिन आम जनता के लिए इंटरनेट काफी महंगा हो जाएगा। कंपनियों का तर्क है कि नई तकनीक ने उनके कारोबार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। जैसे वॉट्सऐप आने के बाद से लोगों ने एसएमएस करना कम कर दिया है या खत्‍म ही कर दिया है। इससे उनके कारोबार और राजस्व को नुकसान हो रहा है। इस कमी को पूरा करने के लिए वे नेट तटस्‍थता को खत्‍म करना चाहती हैं।
पक्ष और विपक्ष में ये हैं तर्क
इंटरनेट की तटस्थता को सरकारी कानून की जरूरत होगी। एक मजबूत तर्क ये दिया जा रहा है कि सरकार को मुक्त बाजार के कामकाज में हस्‍तक्षेप नहीं करना चाहिए। प्रतिस्पर्धा के दौर में जो सबसे कम कीमत पर सबसे अच्छी सेवाएं देगा, उसे जीतना चाहिए।
हालांकि, इसके विपक्ष में कहा जा रहा है कि कंपनियां एकाधिकार बनाए रखने के लिए कम प्रतिस्‍पर्धा वाले बाजार में गठजोड़ कर सकती हैं। ऑपरेटर्स का दूसरा तर्क ये है कि उन्होंने अपना नेटवर्क खड़ा करने में करोड़ों रुपए खर्च किए हैं। वहीं ऐप सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियां मुफ्त में वॉइस कॉल और मैसेज भेजने का फीचर देकर उन्हीं के नेटवर्क्स का फायदा उठा रही हैं।
अब आगे क्‍या होगा
ट्राई ने स्काइप, वाइबर, व्हॉट्सऐप, स्नैपचैट, फेसबुक मैसेंजर जैसी सेवाओं के नियमन से जुड़े 20 सवालों पर भी जनता से फीडबैक मांगा है। जनता से पूछा गया है कि क्या इस तरह की कॉलिंग सर्विस देने वाली कंपनियों को टेलीकॉम ऑपरेटर के नेटवर्क के इस्तेमाल के लिए अतिरिक्‍त कीमत चुकानी चाहिए? यह कीमत यूजर द्वारा उपयोग किए गए डाटा शुल्क के अतिरिक्‍त होगी।
दुनिया में क्‍या है स्थिति
अमेरिका, चिली, नीदरलैंड और ब्राजील जैसे देश पहले ही नेट न्यूट्रैलिटी अपना चुके हैं। अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा खुद इसके पक्ष में खुलकर बोल चुके हैं। वहीं, ट्राई का कहना है कि नेट न्यूट्रैलिटी पर भारत में कोई कानून नहीं है, इसलिए फिलहाल कंपनियों पर वह कार्रवाई नहीं कर सकती।

Thursday, March 5, 2015

आप, तुम, तू और अब तू-तू, मैं-मैं

शशांक शेखर बाजपेई 

आप बहुत दिनों तक आप नहीं रहता है। प्‍यार में कुछ दिनों में तुम, तुम से तू हो ही जाता है और फिर होती है तू-तू, मैं-मैं। कमोबेश यही हाल आम आदमी पार्टी यानी 'आप' का भी हो रहा है। पार्टी के बनने के समय सब 'आम आदमी' बनने के लिए गलाकाट प्रतिस्‍पर्धा कर रहे थे। सबसे ज्‍याद 'आम' कौन? अब आम से खास बनने की होड़ मची है। यही पार्टी में कलह का कारण है, चाहे कोई माने या नहीं माने।     

कल तक के 'आम आदमी' प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव ने खास बन चुके आम आदमी अरविंद केजरीवाल पर उंगली उठाई। कहा गया कि वह मुख्‍यमंत्री बनने के बाद दो पदों पर नहीं रह सकते। ऐसे में उन पर पार्टी के राष्‍ट्रीय संयोजक के पद को छोड़ देना चाहिए। हालांकि, यह मांग उठनी इसलिए भी लाजिमी थी क्‍योंकि दो 'आम आदमी' (प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव) को काफी मेहनत के बावजूद कोई राजनीतिक लाभ नहीं हुआ था और वे खास नहीं बन पाए थे। ऐसे में कम से कम राष्‍ट्रीय संयोजक के पद पर तो काबिज होने की महत्‍वाकांक्षा होनी ही थी।

देखा जाए तो यह मांग गलत भी नहीं थी, क्‍योंकि केजरीवाल दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री रहते हुए इस पद के साथ न्‍याय नहीं कर सकते थे। मगर, वह यह पद यथा संभव छोड़ना भी नहीं चाहते थे क्‍योंकि मुख्‍यमंत्री पद आज है कल नहीं। हालां‍कि, इस बीच यह घोषणा उन्‍होंने जरूर की थी कि उन्‍होंने राष्‍ट्रीय संयोजक के पद से इस्‍तीफा दे दिया है। इस्‍तीफा 26 फरवरी को दिया गया था, लेकिन यह जानकारी काफी बवाल होने के बाद मीडिया में दो-तीन दिन बाद सामने आई।

आप में केजरीवाल के चाटुकारों की फौज को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता है कि उन्‍होंने सच में ही 26 फरवरी को इस्‍तीफा दिया हो। हो सकता है कि बवाल के बाद उन्‍होंने इस्‍तीफे पर 26 फरवरी की बैक डेट डाल दी हो, ताकि पार्टी में मची घमासान के बढ़ने पर उन्‍हें त्‍याग की मूर्ति के रुप में पेश किया जा सके।

बहरहाल 'आप' की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को निकाल दिया गया है। फिर भी पार्टी में चल रही कलह की आग अभी पूरी तरह बुझी नहीं हुई है। अब राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और महाराष्ट्र से पार्टी के बड़े नेता मयंक गांधी ने बागी रुख अख्तियार करते हुए सीधे-सीधे केजरीवाल पर उंगली उठाई है।

बुधवार को करीब साढ़े 5 घंटे लंबी चली बैठक के बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 21 में से 19 सदस्यों के बीच वोटिंग हुई थी। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को हटाने के प्रस्ताव के विरोध में 8 और पक्ष में 11 वोट पड़े, जबकि दोनों नेता स्‍वेच्‍छा से पद छोड़ने को तैयार थे और उन्‍हें पार्टी में कोई दूसरी जिम्‍मेदारी दी जा सकती थी। पार्टी की अनुशासन समिति के प्रमुख प्रोफेसर आनंद कुमार ने कहा कि इस मुद्दे पर आगे कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। अगर किसी को कोई शिकायत है, तो वह पार्टी के लोकपाल के पास जा सकता है।

उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने साफ-साफ कह दिया था योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण पीएसी में रहते हैं तो मैं काम नहीं कर पाऊंगा। मयंक गांधी ने ब्लॉग लिखकर यह भी कहा कि वह जानते हैं कि इस खुलासे से उन्हें भी इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। मयंक के ब्लॉग पर टिप्पणी करते हुए योगेंद्र यादव ने कहा कि अंतत: सत्य सामने आ ही जाता है।

मयंक ने अपने ब्लॉग में लिखा है, 'प्यारे कार्यकर्ताओ, मैं इस बाते के लिए माफी चाहता हूं कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जो कुछ भी हुआ उसके बारे में बाहर नहीं बोलने के आदेश को तोड़ रहा हूं। वैसे, मैं पार्टी का अनुशासित सिपाही हूं। अरविंद कहते थे कि जब वे लोग 2011 में लोकपाल को लेकर जॉइंट ड्राफ्ट कमिटी में काम कर रहे थे तो कपिल सिब्बल उनसे कहा करते थे कि बाहरी दुनिया को कुछ न बताएं। इसके जवाब में अरविंद कहा करते थे कि राष्ट्र को कार्यवाही के बारे में बताना उनकी प्राथमिक ड्यूटी है क्योंकि वह नेता नहीं लोगों के प्रतिनिधि हैं।'

उन्होंने आगे लिखा है, 'राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मैं सिर्फ कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल था और ऐसे में वह आदेश मानकर मैं भी बेईमान बन जाऊंगा। पार्टी कार्यकर्ताओं से है, इसलिए उन्हें चुनिंदा लीक और इधर-उधर के बयानों के बजाय सीधी जानकारी मिलनी चाहिए। मैं मीटिंग के तथ्यों को सार्वजनिक रूप से सामने रखना चाहता हूं।

पिछली रात मुझे कहा गया था कि अगर मैंने बाहर कुछ कहा तो मेरे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी, लेकिन मेरी पहली निष्ठा सर्वोच्च सच के प्रति है। मैं प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को निकाले जाने का घटनाक्रम संक्षेप में बता रहा हूं और राष्ट्रीय कार्यकारिणी से आग्रह करता हूं कि मीटिंग का पूरा ब्योरा सामने लाया जाए।'

ऐसे में साफ है कि आप में एक धड़ा योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ भी खड़ा है, जो केजरीवाल की मनमानी और पार्टी में उनके चाटुकारों के बीच केजरीवाल के जमे प्रभुत्‍व को तोड़ना चाहता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्‍प होगा कि आप से तुम और तुम से तू के बाद शुरू हुई यह तू-तू, मैं-मैं आगे कहां तक जाती है।

संपर्क करें : ssbajpaidata@gmail.com

Monday, February 23, 2015

क्‍या आप जानते हैं ग्लाइड बम के बारे में...

भारत ‘भारी बमों’ को डिजाइन, विकसित और उन्हें 100 किमी तक दागने में सक्षम है। भारत ने हाल ही में ‘ग्लाइड बम’ का सफल परीक्षण कर यह क्षमता हासिल की है। ग्लाइड बम पारंपरिक बमों से अलग होता है। यह ऐसा बम है, जिसे वायु सेना के लड़ाकू विमान से गिराकर निर्देशित करने की प्रणाली का प्रयोग करते हुए मनचाहे लक्ष्य की ओर दागा जा सकता है।

परंपरागत बमों को जहां लक्ष्य के ठीक ऊपर जाकर गिराना होता है, वहीं ग्लाइड बम लड़ाकू विमानों से दूर से ही दागे जाने के बाद एक ग्लाइडर की तरह उड़ान भरते हुए निर्देशन प्रणाली की मदद से लक्ष्य पर अचूक निशाना साधने में सक्षम होते हैं।

भारत के ‘रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन’ द्वारा डिजाइन एवं विकसित 1000 किग्रा. वजनी ग्लाइड बम का परीक्षण सफलता हो चुका है। दिसंबर 2014 में हुए इस परीक्षण के तहत भारतीय वायु सेना के एक लड़ाकू विमान ने पश्चिम बंगाल के खड़गपुर के निकट स्थित कलाईकुंडा एयरबेस से उड़ान भरते हुए नेविगेशन प्रणाली से लैस ग्लाइड बम को ओडिशा के तटीय क्षेत्र में बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गिराया।

सस्‍ता होता है रख-रखाव 

नैविगेशन प्रणाली द्वारा निर्देशित इस बम ने 100 किमी. दूरी तक उड़ान भरने के पश्चात निर्धारित लक्ष्य को ध्वस्त कर दिया। ग्लाइड बम की इस उड़ान पर ओडिशा के बालासोर में स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज में तैनात रडारों एवं इलेक्‍ट्रो ऑप्टिक सिस्‍टम के द्वारा नजर रखी गई।

ग्लाइड बमों में मिसाइलों की तरह कोई मोटर नहीं लगी होती इसलिए इनका संचालन एवं रख-रखाव अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है। भारत में विकसित इस ग्लाइड बम की रेंज 100 किमी है। यानी इसे वायु में किसी लड़ाकू विमान द्वारा 100 किमी दूर सतह पर स्थित लक्ष्य पर दागा जा सकता है।

चूंकि पाकिस्तान और चीन की सतह से हवा में मार करने वाली अधिकतर मिसाइलों की रेंज 100 किमी. से कम है, इसलिए भारतीय लड़ाकू विमान बम गिराने के पश्चात शत्रु की मिसाइलों की रेंज में आने के पूर्व सुरक्षित वहां से निकल सकता है। 

Saturday, February 21, 2015

सत्‍ता के लिए अब पैगंबर भी हो गए महादेव

शशांक शेखर  बाजपेई

सत्‍ता का नशा क्‍या-क्‍या न करा दे। क्‍या-क्‍या न कहला दे। देवों के देव महादेव अब मुस्लिमों के पैगम्‍बर बन गए हैं। सृष्‍िट के संहारक महादेव, जो सृष्टि के सृजन से पहले भी और संहार के बाद भी रहेंगे। अब सबसे नए धर्म के पहले पैगम्‍बर बताए जा रहे हैं। जमीयत उलेमा के मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने बुधवार को अयोध्या में विवादित बयान देते हुए कहा था कि भगवान शंकर मुस्लिमों के पहले पैगंबर हैं।

योग गुरु बाबा रामदेव ने भी माना है कि मुसलमानों के पहले पैगंबर भगवान शंकर थे। रामदेव के मुताबिक मुफ्ती का हिंदू देवताओं में अपना पैगंबर देखना गलत नहीं है। मुफ्ती ने भाईचारे की मिसाल पेश की है। उन्‍होंने कहा कि वेद सबसे पुराने ग्रंथ हैं और कुरान सबसे नया। यानी देवों के देव महादेव सबसे नए धर्म के पैगंबर बनकर धरती पर आए।

इतिहासकार पीएन ओक ने एक किताब में लिखा है कि मक्का और उस इलाके में इस्लाम के आने से पहले से मूर्ति पूजा होती थी। हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि काबा में भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग है। यदि ज्‍योतिर्लिंग पहले से ही बना है। यानी शिव पूजा इस्‍लाम धर्म की शुरुआत के पहले से से रही है, तो शिव पहले पैगंबर कैसे हो गए।

अलबत्‍ता मौलाना मुफ्ती की उस बात से जरूर इत्‍तेफाक रखता हूं कि मुसलमान भी सनातन धर्मी हैं और हिंदुओं के देवता शंकर और पार्वती हमारे भी मां-बाप हैं। आरएसएस के हिंदू राष्ट्र वाली बात पर उनके उस मत का भी समर्थन किया जा सकता है कि जिस तरह से चीन में रहने वाला चीनी, अमेरिका में रहने वाला अमेरिकी है, उसी तरह से हिंदुस्तान में रहने वाला हर शख्स हिंदू है। यह तो हमारा मुल्की नाम है।