Sunday, November 8, 2015

बिहार विधानसभा चुनाव में जीत-हार के 5 कारण

शशांक शेखर बाजपेई। 
बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत और एनडीए की हार हो गई। इसके साथ ही एक बार फिर तय हो गया कि नीतीश कुमार ही बिहार की सत्ता संभालेंगे। एक नजर महागठबंधन की जीत और एनडीए की हार के पांच कारणों पर -

  1. नीतीश कुमार की छवि राज्य में विकास पुरुष के रुप में बनी हुई थी। बीते एक दशक में बिहार में विकास के काम कागज के बजाय जमीन पर दिखे। इनमे चाहे सड़कें बनाने का काम हो या बिजली के स्तर में सुधार हो।
  2. एनडीए के दलों में तालमेल न होना महागठबंधन के पक्ष में गया।
  3. लालू यादव के साथ ने महागठबंधन को मजबूत किया। जदयू, राजद व कांग्रेस में आपसी समन्वय बेहतरीन रहा।
  4. पिछड़ों-दलितों का ध्रुवीकरण एक बड़ा कारण। मांझी और पासवान अपने वोटों को एक साथ नहीं रख पाए।
  5. नीतीश कुमार की चुनावी रणनीति जो विकास केंद्रित रही। चुनावी रैलियों के दौरान नीतीश कुमार ने बिहार के विकास को बड़ा मुद्दा बनाया। उन्होंने बाहर और बिहारी का बात करते हुए कहा कि राज्य का विकास बिहारी करेगा न कि बाहरी। इस जुमले ने जनता के दिल को छू लिया।


वहीं, एनडीए की हार के कारण के रूप में अक्रामक रणनीति से लेकर कार्यकर्ताओं में एकजुटता की कमी, बे-सिर पैर के बयान जैसे कई कारण अहम रहे। 


  1. माना जा रहा है कि पीएम मोदी के डीएनए बयान को महागठबंधन के नेताओं ने अपने पक्ष में भुना लिया। नीतीश और लालू यादव ने मोदी और अमित शाह को बाहरी करार दिया। महागठबंधन जनता को ये समझाने में कामयाब रहा कि बिहार भाजपा के पास स्थानीय नेताओं की कमी है और पैराशूट चेहरों की मदद से बिहार की सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं।
  2. चुनाव से ऐन पहले हिन्दुस्तान अवाम मोर्च, लोजपा, आरएलएसपी और भाजपा के बीच सीट बंटवारों पर विवाद खड़ा हुआ। अमित शाह से लेकर भाजपा के दूसरे बड़े नेताओं को सफाई तक देनी पड़ गई। राम विलास पासवान पर भाई-भतीजावाद का आरोप लगा। बताया जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इन दलों से इस लिए भी नाराज थे चुनावों के दौरान ये नेता जमीन पर सही ढंग से काम नहीं कर रहे थे। 
  3. टिकट बंटवारे के मुद्दे पर भाजपा सांसद आरके सिंह और शत्रुघ्न सिन्हा खुलकर नाराजगी जता चुके थे। आरके सिंह ने मतदान में हिस्सा भी नहीं लिया था। भाजपा के स्टार प्रचारक शत्रुघ्न सिन्हा चुनावी प्रचार से दूर रहे, और गाहे-बेगाहे वो अपने ही नेतृत्व पर निशाना साधते रहे। राज्य स्तरीय नेताओं में पूरे चुनाव प्रचार में जोश कहीं दिखा। 
  4. चुनाव से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण पर दिया बयान भाजपा के लिए नासूर बन गया। महागठबंधन के नेता जनता को ये समझाने में कामयाब रहे कि भाजपा आरक्षण को खत्म करने के एजेंडे पर काम कर रही है। इसके बाद पीएम मोदी को सफाई देनी पड़ी कि उनके जीते जी आरक्षण को कोई खत्म नहीं कर सकता। 
  5. 'बिहार में एनडीए गठबंधन की हार पर पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे' अमित शाह के इस बयान का नीतीश- लालू गठबंधन ने अल्पसंख्यकों को अपने पक्ष में करने में कामयाबी हासिल की।

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