Sunday, December 30, 2012

बताओ कहां जाओगे....


बताओ कहां जाओगे....


ठंडे पानी की बौछार से या लाठियों के वार से 
तुम हमें झुका न पाओगे, बताओ कहां जाओगो? 

न्याय मांग रहे हैं हम, और क्या चाहिए हमें। 
शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी अब खटक रहा है तुम्हें।। 
कैसे सुरक्षाकर्मी हो, कैसे रक्षक कहलाओगे। 
निहत्थे युवाओं को मारकर, बताओ कहां जाओगे? 

तुम्हारी तो शैली है मारने की, गरियाने की ही। 
पर किया ये किसके इशारे पर ये बता पाओगो? 
ठंडे पानी की बौछार से या लाठियों के वार से 
तुम हमें झुका न पाओगे, बताओ कहां जाओगो? 

ये जो दर्द है अपना उसे सबसे बताएंगे। 
तन-मन को जो मिला हर घाव सबको दिखाएंगे। 
तुम भी घर जाकर अपनी बहादुरी बहन-बेटियों को बताना।
मारी है लाठियां न्याय मांगने वालों पर, उनसे मत छिपाना।।

फिर देखना अपना चेहरा आईने में एक बार। 
क्या खुद से तुम नजरें मिला पाओगे, बताओ कहां जाओगे।।
बताओ कहां जाओगे, बताओ कहां जाओगे।।

(ठंडे पानी और लाठियां बरसाकर दिल्ली पुलिस ने युवाओं की भीड़ को तितर-बितर भले ही कर दिया हो। मगर, इससे वे युवाओं के गुस्से को तो शांत नहीं कर पाए हैं। और आज नहीं तो कल खुद से नजरे भी नहीं मिला पाएंगे क्योंकि लाठियां बरसाने वाले पुलिसकर्मियों की भी बहन बेटियां हैं। वे भी सड़कों पर निकली हैं। जो आज जिंदगी और मौत से जूझ रही दुष्कर्म की शिकार लड़की के साथ हुआ वे कल उन पुलिसकर्मियों के घर का मामला भी हो सकता है। क्या वे बताएंगे कि तब वे कहां जाएंगे.....)




Saturday, September 8, 2012

सड़ रही है चमड़ी, जारी है आंदोलन

            सड़ रही है चमड़ी, जारी है आंदोलन 
मध्य प्रदेश के खंडवा में ग्रामीणों और आदिवासियों का जल सत्याग्रह आंदोलन जारी है। पानी के अंदर रहने से लोगों की चमड़ी सफेद पडऩे लगी है। इतनी बहरी तो वो गोरी चमड़ी वाली सरकार भी नहीं थी, जिसके खिलाफ भारत एक हो गया था। खैर, बात यहां जल सत्याग्रह की हो रही है। लोग १५ दिनों से पानी के बीच बैठे हैं। पानी का स्तर उठते हुए लोगों के ठोढ़ी तक पहुंच गया है। सड़ रही देह में फोड़े निकल रहे हैं। फिर भी लोग पानी के नीचे बैठे हैं। मांग है ओंकारेश्वर बांध में पानी का स्तर न बढ़ाया जाए। अब जाकर राज्य सरकार ने अपने दो मंत्रियों कैलाश विजयवर्गीय और विजय शाह को जल सत्याग्रह कर रहे लोगों से बातचीत करने को कहा है। ध्यान दीजिए पानी में १५ दिनों से रह रहे लोगों की मुश्किल को दूर करने की बजाय मामला अभी सिर्फ बातचीत करने तक पहुंचा है।
४० हजार लोग होंगे विस्थापित 
खंडवा के घोघल गांव में करीब 51 लोग डूबे हुए राज्य सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं। सरकार ओंकारेश्वर बांध में जल स्तर 193 मीटर तक बढा़ए जाने को मंजूरी दे चुकी है। बांध का जल स्तर पहले 189 मीटर तक था। यदि जल स्तर १९३ मीटर तक बढ़ा दिया गया तो करीब ३० से अधिक गांव पूरी या आंशिंक रूप से डूब जाएंगे। इसका सीधा असर करीब चार हजार से अधिक परिवारों पर पड़ेगा, जिन्हें विस्थापित होना पड़ेगा।
२५० गांव के लोग समर्थन में 
सरकार ने संकेत दिया है कि पानी की ऊंचाई एक बार में नहीं बढ़ाई जाएगी। फिलहाल इसे डेढ़ मीटर बढ़ाए जाने से ही कई गांवों पर डूबने की कगार पर आ गए हैं। विरोध में तीन हजार लोग नदी के किनारे बैठकर धरना दे रहे हैं। आसपास के 250 गांव के लोग भी आंदोलन के समर्थन में सामने आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक पुर्नवास की पूरी व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक बांध का जलस्तर नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। इसके समर्थन में ग्रामीण कोर्ट के आदेश का हवाला दे रहे हैं। जिसमें कहा गया है कि बांध का जल स्तर १८९ मीटर से ऊपर नहीं किया जा सकता। यदि पानी का स्तर बढ़ाना है और लोगों के विस्थापन की स्थिति बनती है तो इससे छह महीने पहले स्थानीय लोगों के पुर्नवास की व्यवस्था करानी होगी। 
मेधा पाटकर कर चुकी हैं विरोध
नर्मदा नदी पर बांध बनाने के विरोध का इतिहास ८० के दशक से शुरू होता है। बिजली और सिंचाई की कमी को दूर करने के लिए नर्मदा घाटी विकास योजना की रूपरेखा बनाई गई थी। इसके तहत 1,312 किमी लंबी नर्मदा पर 30 बड़े, 135 मध्यम और 3,000 छोटे बांध बनाए जाने थे। नर्मदा पर बनने वाले बांधों में से सरदार सरोवर और इंदिरा सागर बांध सबसे बड़े बांधों में से एक हैं। इसमें से सरदार सरोवर बांध के निर्माण पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ था, जिसका नेतृत्व मेधा पाटकर ने कई बार किया। नर्मदा हाइड्रोइलेक्ट्रिक डेवलपमेंट कार्पोरेशन जब ओंकारेश्वर प्रोजेक्ट का निर्माण कर रहा था तब राज्य सरकार ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया था कि इससे उनकी आजीविका प्रभावित नहीं होगी। ५२० मेगावॉट क्षमता के इस बांध का निर्माण २००७ में पूरा हुआ। मगर, स्थानीय लोगों का कहना है कि इसकी क्षतिपूर्ति के लिए अभी तक न तो लोगों की पहचान की गई है और न ही किसी को कोई मुआवजा दिया गया है। 

shashank shekhar bajpai

Thursday, July 26, 2012

तात्कालिक कारण से नहीं फैली असम की हिंसा

हिंसा में अभी तक ४४ लोगों की मौत हो चुकी है। दो लाख से अधिक लोगों के विस्थापित हुए हैं।
बोड़ो क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) इलाके में तनाव कोई एक दिन में नहीं फैला है। बोड़ो और गैर-बोड़ो समुदायों के बीच तनाव पिछले कई महीनों से बन रहा था। बीटीसी में क्या होता है इससे आमतौर पर असम खुद को अलग ही रखता है। मगर, इसकी आंच असम में तब पहुंची जब असम से बाहर जाने वाले एकलौते कोकराझाड़ जिले में फैले दंगे के कारण विभिन्न ट्रेनों को पश्चिम बंगाल व असम के कई स्टेशनों पर रोक लिया गया। हालांकि, ताजा हिंसा फैलने का फौरी कारण 19 जुलाई को मुस्लिम छात्र संघ के दो नेताओं पर हुआ जानलेवा हमला बताया जा रहा है। तनाव की ताजी स्थिति बीटीसी में रहने वाले गैर-बोड़ो समुदायों का खुलकर बोड़ो समुदाय द्वारा की जाने वाली अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग के विरोध में आ जाने के कारण बनी है। गैर-बोड़ो समुदायों के दो संगठन मुख्य रूप से बोड़ोलैंड की मांग के खिलाफ एक्टिव हैं। इनमें से एक गैर-बोड़ो सुरक्षा मंच और दूसरा अखिल बोड़ोलैंड मुस्लिम छात्र संघ है। गैर-बोड़ो सुरक्षा मंच में भी मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के कार्यकर्ता ही सक्रिय हैं। दोनों संगठनों की सक्रियता खासतौर पर उन जगहों पर अधिक है, जहां बोड़ो आबादी कम है। इसकी तपिश अभी खत्म होने वाली नहीं है।
इन दोनों संगठनों की जो बात बोड़ो संगठनों को नागवार गुजर रही थी वह थी बीटीसी इलाके के जिन गांवों में बोड़ो समुदाय की आबादी आधी से कम है उन गांवों को बीटीसी से बाहर करने की मांग करना। अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग को विरोध तो वे लोग पहले से ही कर ही रहे थे। इस मांग के समर्थन में ये दोनों संगठन समय-समय पर प्रदर्शन और बंद का आह्वान करते रहे हैं। गैर-बोड़ो समुदायों ने 16 जुलाई को भी गुवाहाटी में राजभवन के सामने प्रदर्शन किया। तो उधर बोड़ोलैंड की मांग का समर्थन करने वाले संगठन भी पिछले कुछ महीनों से सक्रिय दिख रहे हैं। हाल ही में इन लोगों ने रेलगाडिय़ों को रोककर यह जताने का प्रयास किया था कि उन लोगों ने बोड़ोलैंड राज्य की मांग अभी तक छोड़ी नहीं है। बोड़ो समुदाय के दो चरमपंथी गुट नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोड़ोलैंड (एनडीएफबी) वार्तापंथी और इसी संगठन का वार्ता-विरोधी गुट भी अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग रहे हैं।
असम के जनजातीय इलाकों में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि गैर-जनजातीय समुदाय खुलकर जनजातीय आबादी के खिलाफ मुखर हो जाएं। इसकी शुरुआत हुई थी एक अन्य इलाके में, जहां राभा जनजाति अपने लिए स्वायत्तता की मांग कर रही है। वहां रहने वाले कई गैर-राभा समुदायों ने उनकी इस मांग के विरोध में आंदोलन छेड़ दिया। इस तरह वहां दो समुदायों के आमने-सामने आ खड़े होने की यह पहली घटना थी और इसके कारण वहां समय-समय पर हिंसा भी फैलती रही है। बीटीसी इलाके में गैर-बोड़ो समुदायों के गुस्से के फटने का एक प्रमुख कारण शायद यह है कि वहां स्वायत्तशासन लागू होने के बाद से कानून और व्यवस्था की स्थिति पहले से बदतर हुई है।
- रिपोर्ट : शशांक शेखर
shashank shekhar