Monday, April 30, 2018

मकर राशि में केतु और मंगल की होगी 02 मई से युति, जानें कैसा होगा आपकी राशि पर असर

शशांक शेखर बाजपेई। ग्रहों के सेनापति मंगल 02 मई को धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में गोचर करने जा रहे हैं, जहां वह 06 नवंबर तक रहेंगे। मकर राशि में इन्हें उच्च प्रभाव देने वाला माना गया है। इस राशि में केतु पहले से मौजूद हैं। वैसे तो छाया ग्रह केतु जिस भी ग्रह के साथ होते हैं, उसी का स्वभाव ग्रहण कर लेते हैं। मगर, इन्हें मंगल के समान माना गया है। ऐसे में मकर राशि में मंगल के साथ मौजूद केतु भी मंगल के जैसा ही प्रभाव देंगे। 'शनि वत राहु- कुज वत केतु'।

मेष और वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल ग्रह की शांति के लिए मंगलवार का व्रत और हनुमान चालीसा का पाठ करना लाभकारी साबित होगा। मंगल की महादशा 7 वर्ष तक रहती है। इस दौरान कुछ सावधानियां रखी जाएं, तो जिन लोगों की कुंडली में मंगल उच्च के हैं या लाभ स्थान में बैठे हैं, उन्हें प्रमोशन, तरक्की, आर्थिक लाभ के मौके मिलेंगे। मान सम्मान बढ़ेगा। जिन जातकों की कुंडली में मंगल की स्थिति ठीक नहीं है, वे विशेष सतर्कता रखें।

यहां एक बात और ध्यान रखने की है कि यह युति शनि के घर मकर में हो रही है। शनि का आधिपत्य होने के कारण वह जातक को सीमाओं में बांधना चाहते हैं। नियम- कायदों का पालन करने के लिए बाध्य करते हैं, वहीं मंगल स्वतंत्र विचार, उग्रता, नियमों को न मानने वाला ग्रह है। जानते हैं राशियों पर इस गोचर के प्रभाव...

मेष
मंगल का गोचर आपकी राशि से दसवें स्थान पर होगा। अत: आपको शुभ समाचार मिलेंगे। नौकरी, व्यापार, व्यवसाय में विस्तार होगा। कोई नया काम शुरू करना चाह रहे हैं तो उसके लिए भी समय शुभ है।

वृषभ
मंगल का गोचर आपकी कुंडली में नौवें भाव में रहेगा। धर्म-कर्म की ओर मन आकृष्ट होगा। लंबी यात्राओं के योग बन रहे हैं। जिन लोगों के काम का संबंध विदेश से है, उन्हें इस दौरान ज्यादा लाभ हो सकता है।

मिथुन
मंगल का गोचर आठवें भाव में होगा, जो आपके लिए बहुत शुभ नहीं है। अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें।

कर्क
मंगल का गोचर आपकी कुंडली में सातवें भाव में रहेगा। मंगल की यह स्थिति मिश्रित परिणाम देगी। काम धंधे और संतान के लिए काफी अनुकूल परिणाम मिलेंगे। पत्नी के साथ संबंधों में तनाव हो सकता है।

सिंह
मंगल का गोचर आपकी कुंडली में छठवें भाव में रहेगा। इस अवधि में दूर की यात्रा में परेशानी हो सकती है, लिहाजा सतर्क रहें। खर्च बढ़ेंगे। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए समय अनुकूल है।

कन्या
मंगल का गोचर पांचवें भाव में होगा। कम दूरी की यात्राएं हो सकती हैं। छोटे भाइयों से मदद मिल सकती है।

तुला
मंगल का गोचर चौथे भाव में रहेगा। यह ग्रह परिवर्तन आपके लिए शुभ है। आर्थिक स्थिति बेहतर होगी। उग्रता में नियंत्रण रखें।

वृश्चिक
मंगल का गोचर तीसरे भाव में शुभ रहेगा। छोटे भाइयों से मदद मिलेगी। मान-सम्मान बढ़ने के भी योग हैं। कार्यस्थल पर बेहतर कार्य करेंगे।

धनु
मंगल का गोचर दूसरे भाव में रहेगा। कुछ खर्चे अचानक हो सकते हैं। वाणी पर नियंत्रण रखें। परिवार के सदस्यों से बनाकर चलें।

मकर
मंगल का गोचर आपकी ही राशि में हो रहा है। स्वास्थ्य पर ध्यान दें और क्रोध पर नियंत्रण रखें। वाहन चलाने में थोड़ी सावधानी बरतें। भूमि या भवन खरीदने के योग बनेंगे।

कुंभ
मंगल का गोचर 12वें भाव में रहेगा। इस दौरान सावधान रहें, फिजूल खर्ची से बचें। यात्रा के योग बन सकते हैं। यदि आपका काम विदेश से संबंधित है, तो लाभ होगा।

मीन
मंगल का गोचर 11वें भाव में रहेगा। आर्थिक स्थिति बेहतर होगी, भाग्य साथ देगा। यात्रा के योग बनेंगे और आय के योग बनेंगे। 

Sunday, April 29, 2018

शनि 18 से हो गए हैं वक्री, साढ़े साती वालों को मिलेगी राहत

शशांक शेखर बाजपेई। न्यायाधीश माने जाने वाले शनि बुधवार 18 अप्रैल 2018 को धनु राशि में वक्री हो चुके हैं। वह गुरुवार, 6 सितंबर 2018 की शाम को फिर से मार्गी हो जाएंगे। जब भी कोई ग्रह धरती के करीब आ जाता है यानी वक्री हो जाता है, तो उसके फल देने की क्षमता बढ़ जाती है।

किसी भी ग्रह के वक्री होने से वह ग्रह उल्टी दिशा में नहीं चलने लगता है। दरअसल, उसकी गति इतनी धीमी हो जाती है कि धरती के सापेक्ष वह पीछे जाता हुआ दिखता है, जबकि असल में ऐसा होता नहीं है। ग्रह तो हमेशा ही अपने मार्ग पर चलते रहते हैं। हालांकि, पृथ्वी के सापेक्ष गति धीमी होने के कारण वे वक्री नजर आते हैं।

वक्री होने का असर

कोई भी ग्रह बुरा नहीं होता है और वह सभी को बुरे फल नहीं देता है। मगर, हर व्यक्ति की कुंडली में ग्रह की स्थिति अलग-अलग होती है। लिहाजा, उसकी के अनुसार ग्रह अच्छे या बुरे फल देते हैं। शनि को न्याय का देवता है, इसलिए पूर्व में किए गए कर्मों का फल देता है।

इसीलिए कुछ लोग शनि की दशा, महादशा, साढ़े साती में बर्बाद हो जाते हैं, तो वहीं कुछ लोग इस दौर में शीर्ष पर पहुंच जाते हैं। वक्री होने की दशा में ग्रहों के फल देने की क्षमता बढ़ जाती है। शनि सामान्य परिस्थितियों में जो फल धीरे-धीरे देता है, वक्री होने पर तेजी से देने लगता है।

इन पांच राशियों पर असर

वर्तमान समय में शनि की साढ़े साती वृश्चिक, धनु और मकर राशि पर चल रही है। वहीं, वृषभ और कन्या पर ढैय्या चल रही है। इन 5 राशियों के जातकों को विशेष रूप से सावधान रहने की जरूरत है। प्रतिकूल स्थितियों के चलते पारिवारिक जीवन में कलह हो सकती है।

काले कपड़े नहीं पहनें, वाहन सावधानी से चलाएं, धन के लेन-देन, बड़ा निवेश करने से पहले अच्छी तरह से सोच विचार कर ही फैसला करें। अगर आपके कर्म पूर्व में अच्छे रहे हैं और आपने किसी का बुरा नहीं किया है, तो शनि से डरने की जरूरत नहीं है।

कुंडली में शनि ग्रह यदि पीड़ित है, तो वह मानसिक कष्ट जरूर दे सकता है। इससे बचने के लिए शनि चालीसा और शनि स्त्रोत का पाठ करें। ऊं शनिश्चराय नम: मंत्र का जाप करें। हनुमान चालीसा, हनुमान आराधना करने से भी कष्टों से मुक्ति पा सकते हैं।

VIDEO : शनि का वक्री होना, जानें कैसे होता है कोई ग्रह वक्री

Wednesday, April 25, 2018

'ज्योतिष लय ब्रह्मांड की बहती सरित समान, उद्गम पर अध्यात्म है संगम पर विज्ञान'

शशांक शेखर बाजपेई। ज्योतिष विद्या भारत की बहुत सी महान उपलब्धियों में से एक है। हमारे ऋषियों और मुनियों ने वर्षों की अथाह मेहनत के बाद इस इस विज्ञान को लिपिबद्ध किया। ज्योतिष की शुरुआत समस्याओं के निरकरण के लिए नहीं हुई थी। यह तो महज मानव मन की जिज्ञासा थी, जो सबसे पहले सूर्य, चांद, पृथ्वी और तारों को देखकर सहज ही सबसे पहले इंसान के दिमाग में आई।

जब इसके बारे में और जानने की इच्छा हुई तो ऋषियों ने सूर्य के दिन में और चंद्रमा के रात में निकलने का कारण जानना चाहा। इस दौरान उन्हें पृथ्वी के परिभ्रमण और परिक्रमण का पता चला, जिसकी वजह से दिन और रात होते थे। मौसम में परिवर्तन भी इसी कारण से होता था।

यही ज्ञान धीरे-धीरे बढ़ता गया और ज्योतिष विधा का जन्म हुआ। शुरुआत में इंसान के पास न तो रहने की समस्या थी और न ही खाने की। ऐसे में ज्योतिष का प्रयोग मौसम की जानकारी करने के लिए होता था। मगर, आज जबकि समय तेजी से चल रहा है और लोगों के पास हजारों समस्याएं हैं, ऐसे में उनका कारण और निराकरण सिर्फ इसी विधा से सही से लगाया जा सकता है क्योंकि यह विज्ञान पर आधारित है। कुंडली पर आधारित फलित ज्योतिष का संबंध वेदों से नहीं है।

ज्योतिष विज्ञान की श्रेणी में आता है। यह उतना ही पुराना है जितने वेद, इसलिए इसे वेदांग भी कहते हैं। जो तारे-सितारों की चमक या ज्योति दिखाई दे रही है उसका धरती के मौसम और जीवों के शरीर तथा मन पर होने वाले असर का अध्ययन करने की विद्या को ही ज्योतिष विद्या कहा जाता है।

वैदिक ज्ञान के बल पर भारत में एक से बढ़कर एक खगोलशास्त्री, ज्योतिष व भविष्यवक्ता हुए हैं। इनमें गर्ग, आर्यभट्ट, भृगु, बृहस्पति, कश्यप, पाराशर वराहमिहिर, पित्रायुस, बैद्धनाथ आदि प्रमुख हैं। वराहमिहिर का ज्ञान काफी उच्चकोटि का था और इस ज्ञान को उन्होंने यवनों को भी दिया था। भारत से यह ज्ञान ग्रीक गया। भारत के साथ ही ग्रीक, चीन, बेबीलोन, परशिया (ईरान) आदि देशों के विद्धानों ने भी ज्योतिष शास्त्र का विस्तार अपने यहां की आबो-हवा को जानकर किया। आज से करीब 2600 वर्ष पूर्व चेल्डिया के पंडितों व पुजारियों ने इस विषय पर गहन शोध किया और इसकी बारीकियों को उजागर किया।

प्रारंभ में यह ज्ञान राजा, पंडित, आचार्य, ऋषि, दार्शनिक और विज्ञान की समझा रखने वालों तक ही सीमित था। ये लोग इस ज्ञान का उपयोग मौसम को जानने, वास्तु रचना करने तथा सितारों की गति से होने वाले परिवर्तनों को जानने के लिए करते थे। इस ज्ञान के बल पर वे राज्य को प्राकृतिक घटनाओं से बचाते थे और ठीक समय पर ही कोई कार्य करते थे।

धीरे-धीरे यह विद्या जन सामान्य तक पहुंची तो राजा और प्रजा सहित सभी ने इस विद्या में मनमाने विश्वास और धारणाएं जोड़ी। अंध विश्वास के कारण धीरे-धीरे इसमें विकृतियां आने लगीं, लोग इसका गलत प्रयोग करने लगे। राजा भी इस विद्या के माध्यम से लोगों को डराकर अपने राज्य में विद्रोह को दबाना चाहता था और पंडित ने भी अपना चोला बदल लिया था।

इस सब कारण के चलते विद्धान ज्योतिषाचार्य व ज्योतिषग्रंथ समाप्त हो गए। शोध कार्य मृतप्राय होकर बंद हो गया। अज्ञानी लोगों ने ज्योतिष का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। इसे व्यापार का रूप देकर धन कमाने के लालच में झाूठी भविष्यवाणी करके शोषक वर्ग शोषण के धंधे में लग गया।

जो भविष्यवाणी सच नहीं होती उसके भी मनमाने कारण निर्मित कर लिए जाते और जो सच हो जाती उसका बढ़ाचढ़ाकर प्रचार-प्रसार किया जाता है। ऐसे में जरूरत है इस विद्या के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सही ज्ञान का विस्तार करने की। हालांकि, अब इस विषय पर एक बार फिर से लोगों की रुचि जागी है और कई लोगों ने शोध कार्य शुरू किए हैं। आशा है कि एक बार फिर यह विज्ञान के रूप में स्थापित होगा और लोगों के मार्गदर्शन का जो रास्ता ऋषियों ने दिखाया था, उसे फिर से समझा जा सकेगा।

शुभम् भूयात।