Saturday, November 14, 2015

कैमरन भी मानने को हुए मजबूर, 'अच्‍छे दिन आने वाले हैं'

शशांक शेखर बाजपेई। 
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है कि अच्छे दिन आने वाले हैं। अच्छे दिन जरूर आएंगे। वह दिन दूर नहीं जब ब्रिटेन में भारतीय मूल का प्रधानमंत्री होगा।

कैमरन की यह टिप्‍पणी महज मोदी या भारत को खुश करने के लिए नहीं की है। इसमें बड़ी दूर के हित निहित हैं। वह दूरदर्शिता इसमें साफ परिलिक्षित हो रही है, जो मोदी भारत के युवाओं में देख रहे हैं।

याद रहे कैमरन उसी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैं, जिसकी दासता की जंजीरों में भारत करीब 200 साल तक जकड़ा रहा। ब्रिटिश शासन में अपने ही देश में अंग्रेजों के इलाकों में 'इंडियन्‍स और डॉग्‍स' नॉट अलाउड थे। आज आजादी के 67 साल बाद भारत उसी ब्रिटेन के साथ आंख मिलाकर बात कर रहा है। दया या मेहरबानी नहीं बराबरी की बात कर रहा है।

क्‍या यह अच्‍छे दिनों की दस्‍तक नहीं है। क्‍या दाल के भाव और प्‍याज की कीमतें ही अच्‍छी सरकार की दशा और दिशा तय करेंगी। हिंदुस्‍तानियों के सम्‍मान की कोई कीमत नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी कई बार कह चुके हैं और बार-बार दोहरा रहे हैं विकास की यात्रा में अब यह देश रुक नहीं सकता। यह देश जवानी से लबालब है।

राजस्थान के अलवर जिले के इमरान खान का उदाहरण देकर मोदी ने दुनिया को बता दिया कि ऐसे युवाओं से भारत सशक्‍त है, जो शिक्षा में सहायता के लिए 50 ऐप विकसित कर देश को समर्पित कर चुका है। वह भी मुफ्त में।

ऐसे युवा भारत को बदलने की शक्‍ित रखते हैं और दुनिया को अपनी सेवाएं देने के लिए तैयार हो रहें हैं। मोदी सरकार का चलाया गया स्किल इंडिया प्रोग्राम, मेक इन इंडिया प्रोग्राम उन्‍हीं युवाओं को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है, जो आने वाले सालों में देश और दुनिया में भारत का सिर गर्व से ऊंचा करेंगे।

मोदी कह चुके हैं कि कोई कारण नहीं है कि हम गरीब बने रहें। मगर, दो सौ सालों की दासता ने हम हिंदुस्‍तानियों को गरीबी को बार-बार पुचकारने वाला बना दिया था। या अभी भी हम गरीबी में किए गए संघर्ष को ही आदर्श मानकर चल रहे हैं। मगर, अब इसकी कोई जरूरत नहीं है। मोदी यह बात दुनिया को समझ में आ रही है वरना क्‍योंकर अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्‍ट्रेलिया, सऊदी अरब, चीन, जर्मनी आदि अब भारत की ओर देख रहे हैं।

मोदी के नेतृत्‍व में देश में सफाई और चौबीस घंटे बिजली पाने का सपना लोगों ने देखना शुरू किया। नतीजे आने में अभी समय भले ही लगे, लेकिन नि:संदेह इस दिशा में काम तो शुरू हो ही गया है। इसकी बानगी है सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा और अक्षय ऊर्जा से 150 गीगावॉट ऊर्जा पैदा करने का कार्य शुरू किया है। पहले भारत में बिजली मेगावॉट में आती थी। पहली बार हिंदुस्तान गीगावॉट पर सोच रहा है।

असहिष्णुता के मुद्दे पर मोदी की वह टिप्‍पणी काबिले तारीफ है भारत विविधताओं से भरा देश है और विविधता हमारी आन, बान, शान है जो हमारी ताकत और गौरव है। मोदी ने शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के महत्व को भी रेखांकित किया।

भारत में विविधता का उल्लेख करते हुए मोदी ने ब्रिटेन सहित दुनिया को बताया कि हमारे यहां सौ भाषाएं, 1500 बोलियों और हजारों खानपान की पद्धतियां और सैकड़ों वेश-भूषाएं हैं। इतनी सारी विविधताएं हैं, लेकिन यह विविधता हमारी विशेषता भी है। 

Friday, November 13, 2015

दिल्ली में खुलेगी 'मैडम तुसाद म्‍यूजियम' की शाखा

Journalist Shashank Shekhar Bajpai 
लंदन। दुनियाभर में चर्चित मोम संग्रहालय 'मैडम तुसाद' की नई शाखा अब दिल्ली में खुलेगी। 'भारत-ब्रिटेन सांस्कृतिक वर्ष- 2017' के तहत भारत में तुसाद संग्रहालय की शाखा खोली जाएगी।

यह घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली ब्रिटेन यात्रा के दौरान की गई है। लंदन स्थित इस चर्चित मोम संग्रहालय में मशहूर कलाकारों की प्रतिमाएं शामिल हैं, जिनमें बॉलीवुड सितारे अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित से लेकर कैटरीना कैफ तक शामिल हैं।

डेविड कैमरन ने घोषणा की है कि 2017 के सांस्कृतिक आदान-प्रदान के तहत भारत में प्रदर्शित करने के लिए ब्रिटिश संग्रहालय के दुर्लभ खजाने में से कुछ चीजें, शेक्सपीयर की फर्स्ट फोलियो और मैग्ना कार्टा की एक प्रति भेजी जाएगी। ब्रिटेन में भारत महोत्सव का आयोजन भी किया जाएगा।

ब्रिटिश पीएम कैमरन ने कहा कि भारत और ब्रिटेन के बीच की अनूठी भागीदारी आर्थिक समझौतों से परे शेक्सपीयर और बॉलीवुड तक जा पहुंची है। हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक आदान-प्रदानकर्ताओं में से हैं। और अब वक्‍त आ गया है कि साथ मिलकर इसका जश्न मनाया जाए।

इसी कड़ी में ब्रिटिश पुस्तकालय अपने दक्षिण एशियाई अभिलेखों के दो लाख पृष्ठों को डिजिटलाइज कर रहा है ताकि 1714 से 1914 तक की भारतीय पुस्तकों दुनियाभर में पढ़ने के लिए उपलब्‍ध हो सकें।

नरेंद्र मोदी ने अपने ब्रिटिश समकक्ष डेविड कैमरन से क्‍यों मांगी रॉयल्‍टी

शशांक शेखर बाजपेई। 

ब्रिटेन में अपनी यात्रा के दौरान सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिटिश्‍ा प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से रॉयल्‍टी मांग ली।

मोदी ने कहा कि मैं ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को याद दिलाना चाहता हूं कि आप ने ब्रिटिश संसदीय चुनाव के दौरान मेरा चुनावी नारा - अबकी बार-मोदी सरकार, कॉपी किया था।

इसके लिए मेरी रॉयल्‍टी आप पर बाकी है। हल्‍के फुल्‍के मजाक के रूप में प्रधानमंत्री मोदी ने जब ऐसा कहा, तो वहां मौजूद लोग ठहाके लगाने लगे। गौरतलब है कि चुनाव के दौरान ब्रि‍टेन में कैमरन ने मार्च 2015 में कहा था कि - फिर एक बार कैमरन सरकार का नारा दिया था।

तब मोदी के ब्रिटिश समकक्ष कैमरन ने कैमरे पर स्‍वीकार किया था कि वह भारत जाते रहते हैं और हिंदी के अलावा कई चीजें वह भारत से सीखते रहते हैं। इसी कड़ी में उन्‍होंने चुनाव के दौरान मोदी का चुनावी नारा अबकी बार मोदी सरकार सुना था। इसे ब्रिटिश रंग में रंगते हुए कैमरन ने बदलाव करके फिर एकबार कैमरन सरकार कर दिया था। 

Wednesday, November 11, 2015

मानव तस्‍करों की मीठी बांतों में फंसी कार्ला का 43 हजार बार हुआ रेप

मैक्सिको सिटी। अमेरिका और मैक्‍िसको में मानव तस्‍करों ने हजारों लड़कियों की जिंदगी नर्क बना दी है। इसका खुलासा किया है हाल ही में बचाई गई मैक्सिको सिटी की रहने वाली कार्ला जैसिंटो ने।

कार्ला ने कहा कि उसे बचपन में ही मां ने छोड़ दिया था। पांच साल की उम्र में एक रिश्तेदार ने यौन शोषण किया। कार्ला ने कहा कि जब मैं 12 साल की थी, तब एक तस्कर मुझे प्यार के सब्‍जबाग दिखाकर अपने साथ ले गया। चार साल तक हर रोज 30 बार उसके साथ दुष्‍कर्म किया जाता था। करीब 43 हजार 200 बार मेरा रेप किया गया।

मानव तस्‍करी इतना आकर्षक व्‍यापार हो गया है कि इसमें सेंट्रल मेक्‍िसको की अटलांटा और न्‍यूयॉर्क जैसे शहरों के बीच कोई सीमा नहीं है। अमेरिका और मैक्‍िसको, दोनों जगह के अधिकारी वर्षों से सेंट्रल मैक्‍िसको के एक कस्‍बे को मानव तस्‍करी के बड़े स्रोत के रूप में चिह्नित करते रहे हैं।

यही वो इलाका है, जहां पीड़‍ितों को जबरन वेश्‍यावृत्‍ित के धंधे में लगाने से पहले ले जाया जाता है। इस कस्‍बे का नाम टिनांनसिंगो है। हालांकि, यहां की आबादी करीब 13 हजार के आस-पास है, लेकिन वेश्‍यावृत्‍ित के लिए इस जगह ने कुख्‍याति हासिल की है। वेश्‍यावृत्‍ित वहां की मुख्‍य इंडस्‍ट्री बन गई है।

छोटे कस्‍बों और ग्रामीण इलाकों में युवा लड़कियों को पता ही नहीं होता है कि उस जगह से आने वाले पुरुष संदिग्‍ध हैं। लड़कियों को लगता है कि उन पुरुषों के साथ उनका भविष्‍य उज्‍जवल होगा और वे मानव तस्‍करों के झांसे में आ जाती हैं।

लड़कियों को लगता है कि पुरुष उनसे प्‍यार करते हैं और हर बार वेश्‍यावृत्‍ित में लड़कियों को धकेलने की यही कहानी दोहराई जाती है। 

Tuesday, November 10, 2015

आईडेंटिटी क्राइसिस : खुद को डॉगी समझता है यह बछड़ा

कैलिफोर्निया। आईडेंटिटी क्राइसिस यानी अपनी पहचान को लेकर भ्रम किसी को भी हो सकता है। अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक गाय के बछड़े गोलिथ को ही ले लीजिए।

दो महीने पहले डेयरी फार्म से बचाया गया था, जो उसे काटने की योजना बना रहा था। डेनविले में शेयली हब के परिवार के साथ रह रहा यह बछड़ा खुद को डॉगी समझता है।

उसे जब इस परिवार ने पहली बार लिया था, तो वह इतना कमजोर और छोटा था कि उसे आसानी से गोद में लिया जा सकता था। मगर, आठ हफ्तों तक उसका अच्‍छी तरह ध्‍यान रखने के बाद अब वह स्‍वस्‍थ हो गया है।

डॉगीज के बीच हुई परवरिश 

उसकी देखभाल करने वाली शेयली बताती हैं कि मुझे पक्‍का यकीन है कि गोलिथ खुद को एक डॉगी समझाता है। उसकी प‍रवरिश हमारे तीन डॉगी के बीच हुई है और वह उन्‍हीं के साथ रहता है। गोलिथ उन डॉगीज का पीछा करता है और पूरे समय उनके साथ खेलता है।

डॉगीज के खाने-पीने की करता है नकल 

वह देखता है कि डॉगी कैसे खाना खा रहे हैं और कैसे पानी पी रहे हैं। इसके बाद वह उनकी नकल करता है। यहां तक कि वह डॉगी के लिए लगाए गए बिस्‍तर पर ही बैठता है। वह डॉगी लियो को अपनी मां समझता है और उसके साथ काफी खुश दिखता है।

फैमिली काउच पर बैठे गोलिथ की तस्‍वीर शेयली ने टि्वटर पर पोस्‍ट की। इस तस्‍वीर को गुरुवार दोपहर तक 32 हजार से अधिक बार रीट्वीट किया गया और 54 हजार से अधिक लाइक इस तस्‍वीर को मिले थे।

अपने पेशे के अनुसार, तय करें दिवाली पूजन का मुहूर्त

शशांक शेखर बाजपेई। 
देवगुरु बृहस्पति के अनुसार, कार्तिक मास की अमावस्या को शाम को सूर्यास्त हो जाने के बाद ही दीवाली का ‘पर्वकाल’ प्रारंभ होता है। लक्ष्‍मी योग के इस मुहूर्त में भगवती लक्ष्मी का पूजन करना गृहस्थ जनों के लिए शुभ माना जाता है।

आगरा के पंडित उद्देश्‍य गुप्‍ता ने बताया कि इससे घर का आर्थिक संकट दूर होता है तथा परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। इससे घर का आर्थिक संकट दूर होता है तथा परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है।

व्‍यापारियों के लिए ये मुहूर्त दीवाली की रात को तृतीय प्रहर में कुबेर योग आता है। धन के स्‍वामी कुबेर के इस मुहूर्त में पूजा करना उद्योगपतियों और व्यापारियों की इच्‍छाओं को पूरा करता है। इसमें फैक्ट्री-कारखाना या दुकान की गद्दी पर दीपावली-पूजन प्रचुर लाभदायक सिद्ध होता है।

सरकारी अधिकारियों और नेताओं के लिए है इंद्रयोग। भगवान गणपति, महालक्ष्मी और कुबेर जी के साथ ही दीवाली की रात देवताओं के राजा इंद्र का भी आह्वान किया जाता है। अमावस्या की रात द्वितीय प्रहर में इंद्रयोग आता है।

सरकारी अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं को इस योग में पूजन करना चाहिए। ‘इंद्र योग’ सत्ता, पदोन्नति के साथ ही वेतन-वृद्धि के इच्छुक भक्तों का कार्यक्षेत्र फलीभूत करता है। इस प्रकार देवगुरु बृहस्पति द्वारा बताए गए लक्ष्मी योग, इंद्र योग और कुबेर योग अपने नाम के अनुरूप फल प्रदान करते हैं।

Monday, November 9, 2015

जानिए दिवाली पर लक्ष्मीजी के साथ क्‍यों करते हैं शालिग्राम की पूजा

शशांक शेखर बाजपेई। 
दीपावली पर मां लक्ष्मी का पूजन अकेले नहीं किया जाना चाहिए। उनके साथ भगवान विष्णु का भी पूजन करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्‍मीजी के साथ शालिग्राम रखकर उनका पूजन करके उन्हें धन स्थान पर स्थापित करने से घर में कभी कोई परेशानी न
हीं होती है।

शालिग्राम पूजन इसलिए 

कहा जाता है कि एक समय पराक्रमी असुर जलंधर का विवाह वृंदा से हुआ, जो भगवान विष्णु की भक्त थी। उसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था। उसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। अपनी शक्‍ित के अभिमान में जलंधर देवताओं, अप्‍सराओं को परेशान करने लगा।

दु:खी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे। तब भगवान विष्णु जलांधर का रूप धारण कर छल से वृंदा का पतिव्रत धर्म नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वह युद्ध में मारा गया।

वृंदा ने दिया था शाप

जब वृंदा को इस छल का पता चला, तो उसने विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं के अनुरोध करने पर वृंदा ने शाप वापस ले लिया। मगर, भगवान विष्णु भी वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे। इसलिए उन्होंने पत्‍थर में अपना एक रूप प्रकट किया, जिसे शालिग्राम कहा गया।

अगले जन्‍म में तुलसी बनीं वृंदा 

भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि अगले जन्म में तुम तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे सिर पर होगा। तुम्हारे बिना मैं भोजन ग्रहण नहीं करूंगा।

यही कारण है कि भगवान विष्णु के भोग में प्रसाद में तुलसी को जरूर रखा जाता है। इस घटनाक्रम के पटाक्षेप होने के बाद जलंधर के साथ वृंदा सती हो गई। उनकी राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया।

तो नहीं होती कोई परेशानी 

मान्‍यता है कि भगवान विष्णु और तुलसी का जिस जगह पर होते हैं, वहां कोई दुख और परेशानी नहीं आती। नारायण स्वरूप यही शालिग्राम शिलाएं इन पर बनने वाले चक्र के आधार पर विष्णु के अलग-अलग रूप व अवतारों के नाम वाली होती हैं।

नेपाल में मिलते हैं शालिग्राम 

शालिग्राम नेपाल के मुक्तिनाथ के पास काली गण्डकी नदी के तट पर पाए जाते हैं। शालिग्राम काले रंग के पत्थर रूप में ही मिलते हैं, लेकिन सफेद और नीले शालिग्राम को भी पूजा जाता है। शालिग्राम पर चक्र भी होते हैं, जिन्हें सुदर्शन चक्र कहा जाता है।

ऐसे करनी चाहिए पूजा 

दिवाली के दिन घर में शालिग्राम की स्थापना करें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करते हुए पंचामृत से स्नान करवाएं उसके बाद भगवान का पंचोपचार पूजन करें। इसमें गंध, पुष्प, धूप, दीप और तुलसी के साथ नैवेद्य को शामिल करें। शालिग्राम की पूजा में तुलसी का महत्‍व अहम है क्‍योंकि बिना तुलसी के शालिग्राम की पूजा करने पर दोष लगता है।

उज्‍जैन की पंडित रश्‍िम शर्मा से बातचीत के आधार पर

शाह के कारण नीतीश के साथ जुड़े थे प्रशांत किशोर


शशांक शेखर बाजपेई। 

नीतीश कुमार की जीत के पीछे कई कारणों में से एक है मोदी के पूर्व सहयोगी प्रशांत किशोर का उनके साथ होना। बताया जा रहा है कि अमित शाह की वजह से ही किशोर ने मोदी का साथ छोड़कर नीतीश का साथ दिया। वह मई से ही नीतीश के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने में जुट गए थे।

बिहार चुनाव में मोदी और नीतीश-लालू के लड़ाई के बड़े चेहरे थे, लेकिन पर्दे के पीछे की रणनीति भाजपा के लिए अमित शाह और नीतीश के लिए प्रशांत किशोर बना रहे थे। नतीजों के बाद यह स्‍पष्‍ट हो गया है कि प्रशांत की रणनीति ने अमित शाह की चालों को पूरी तरह नाकाम कर गठबंधन की जीता का मार्ग प्रशस्‍त किया।

साल 2011 में संयुक्त राष्ट्र जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ की नौकरी छोड़ने के बाद वह नरेंद्र मोदी के साथ जुड़ गए थे। उन्‍होंने ही मोदी की छवि विकास पुरुष की बनाई, 'चाय पर चर्चा' और '3डी होलोग्राम जैसे प्रोग्राम' की बदौलत मोदी के नेतृत्‍व में लोकसभा चुनाव में भाजपा को जबरदस्‍त जीत दिलाई थी।

शाह ने नकारी प्रशांत की भूमिका 

प्रशांत की टीम में शामिल एमबीए और आईआईटी ग्रेजुएट सहित कई पेशेवर सदस्‍यों ने सोशल मीडिया के जरिये बड़ी संख्या में लोगों को मोदी से जोड़ने में कड़ी मेहनत की थी। मगर, भाजपा के अध्‍यक्ष अमित शाह सहित कुछ नेताओं का मानना था कि भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं की मेहनत के कारण ही मोदी को जीत मिली और किशोर की टीम की भूमिका मामूली थी।

भाजपा से आहात हो नीतीश से जुड़े 

लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की चुनावी रणनीति में किशोर अपना प्रभाव गंवा चुके थे। बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर में शाह से मिले थे और उनसे पूछा था कि उन लोगों का जून के बाद क्या होगा? शाह ने तब किशोर को सरकार की पॉलिसी मेकिंग में कोई भूमिका दिए जाने का आश्वासन नहीं दिया था।

इसके बाद प्रशांत किशोर ने अपने भविष्‍य को देखते हुए कुछ कांग्रेसी नेताओं से संपर्क किया। हालांकि, बात नहीं बनी और उसके बाद अक्टूबर-नवंबर 2014 में वह जेडीयू सांसद पवन वर्मा के जरिये नीतीश कुमार से मिले। किशोर ने दो शर्तों पर नीतीश के साथ काम करने पर रजामंदी दी।

बताया जा रहा है कि पहली शर्त थी कि नीतीश तक उनकी सीधी पहुंच हो और दूसरी जीतन राम मांझी को बिहार के मुख्यमंत्री पद से हटाया जाए। इसके कुछ ही समय बाद नीतीश मांझी को मुख्यमंत्री पद से हटाकर खुद सीएम बने। 

Sunday, November 8, 2015

बिहार विधानसभा चुनाव में जीत-हार के 5 कारण

शशांक शेखर बाजपेई। 
बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत और एनडीए की हार हो गई। इसके साथ ही एक बार फिर तय हो गया कि नीतीश कुमार ही बिहार की सत्ता संभालेंगे। एक नजर महागठबंधन की जीत और एनडीए की हार के पांच कारणों पर -

  1. नीतीश कुमार की छवि राज्य में विकास पुरुष के रुप में बनी हुई थी। बीते एक दशक में बिहार में विकास के काम कागज के बजाय जमीन पर दिखे। इनमे चाहे सड़कें बनाने का काम हो या बिजली के स्तर में सुधार हो।
  2. एनडीए के दलों में तालमेल न होना महागठबंधन के पक्ष में गया।
  3. लालू यादव के साथ ने महागठबंधन को मजबूत किया। जदयू, राजद व कांग्रेस में आपसी समन्वय बेहतरीन रहा।
  4. पिछड़ों-दलितों का ध्रुवीकरण एक बड़ा कारण। मांझी और पासवान अपने वोटों को एक साथ नहीं रख पाए।
  5. नीतीश कुमार की चुनावी रणनीति जो विकास केंद्रित रही। चुनावी रैलियों के दौरान नीतीश कुमार ने बिहार के विकास को बड़ा मुद्दा बनाया। उन्होंने बाहर और बिहारी का बात करते हुए कहा कि राज्य का विकास बिहारी करेगा न कि बाहरी। इस जुमले ने जनता के दिल को छू लिया।


वहीं, एनडीए की हार के कारण के रूप में अक्रामक रणनीति से लेकर कार्यकर्ताओं में एकजुटता की कमी, बे-सिर पैर के बयान जैसे कई कारण अहम रहे। 


  1. माना जा रहा है कि पीएम मोदी के डीएनए बयान को महागठबंधन के नेताओं ने अपने पक्ष में भुना लिया। नीतीश और लालू यादव ने मोदी और अमित शाह को बाहरी करार दिया। महागठबंधन जनता को ये समझाने में कामयाब रहा कि बिहार भाजपा के पास स्थानीय नेताओं की कमी है और पैराशूट चेहरों की मदद से बिहार की सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं।
  2. चुनाव से ऐन पहले हिन्दुस्तान अवाम मोर्च, लोजपा, आरएलएसपी और भाजपा के बीच सीट बंटवारों पर विवाद खड़ा हुआ। अमित शाह से लेकर भाजपा के दूसरे बड़े नेताओं को सफाई तक देनी पड़ गई। राम विलास पासवान पर भाई-भतीजावाद का आरोप लगा। बताया जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इन दलों से इस लिए भी नाराज थे चुनावों के दौरान ये नेता जमीन पर सही ढंग से काम नहीं कर रहे थे। 
  3. टिकट बंटवारे के मुद्दे पर भाजपा सांसद आरके सिंह और शत्रुघ्न सिन्हा खुलकर नाराजगी जता चुके थे। आरके सिंह ने मतदान में हिस्सा भी नहीं लिया था। भाजपा के स्टार प्रचारक शत्रुघ्न सिन्हा चुनावी प्रचार से दूर रहे, और गाहे-बेगाहे वो अपने ही नेतृत्व पर निशाना साधते रहे। राज्य स्तरीय नेताओं में पूरे चुनाव प्रचार में जोश कहीं दिखा। 
  4. चुनाव से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण पर दिया बयान भाजपा के लिए नासूर बन गया। महागठबंधन के नेता जनता को ये समझाने में कामयाब रहे कि भाजपा आरक्षण को खत्म करने के एजेंडे पर काम कर रही है। इसके बाद पीएम मोदी को सफाई देनी पड़ी कि उनके जीते जी आरक्षण को कोई खत्म नहीं कर सकता। 
  5. 'बिहार में एनडीए गठबंधन की हार पर पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे' अमित शाह के इस बयान का नीतीश- लालू गठबंधन ने अल्पसंख्यकों को अपने पक्ष में करने में कामयाबी हासिल की।

मैकेनिकल इंजीनियर से राजनीति तक ऐसा रहा नीतीश कुमार सफर

शशांक शेखर बाजपेई। 

पटना इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेने वाले नीतीश कुमार का जन्म साल 1951 में बिहार के एक दलित परिवार में हुआ था। उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। नीतीश ने राजनीति के गुण जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर और जॉर्ज फर्नाडीज से सीखे थे।

आज बिहार की राजनीति में चाणक्य नाम से मशहूर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर की शुरूआत साल 1977 में हुई थी। तब उन्‍होंने जनता पार्टी के टिकट पर पहला विधानसभा चुनाव लड़ा। साल 1985 को नीतीश बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए।

एनडीए से तोड़ा नाता 

नीतीश कुमार अब तक तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इस बार के चुनाव में उनका गठबंधन जीत की तरफ आगे बढ़ रहा है। मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने एनडीए से पुराना नाता तोड़ लिया था।

पारिवारिक जीवन 

नीतीश का उपनाम मुन्ना है। नीतीश ने 22 फरवरी 1973 को पेशे से इंजीनियर मंजू कुमारी सिन्हा से शादी की थी। नीतीश कुमार का एक पुत्र है जो बीआईटी से ग्रेजुएट है।

ऐसा रहा राजनीतिक सफर 

वर्ष 1987 को नीतीश कुमार बिहार के युवा लोकदल के अध्यक्ष बने और इसके दो साल बाद 1989 में उन्‍हें जनता दल (बिहार) का महासचिव बना दिया गया। अब तक नीतीश ने अच्छी खासी राजनीतिक पहचान बना ली थी। यह वर्ष उनके राजनीतिक जीवन में बड़ा बदलाव लाया।

वर्ष 1989 में नीतीश को 9वीं लोकसभा के लिए चुना गया, जो लोकसभा में उनका पहला कार्यकाल था। इसके बाद साल 1990 में नीतीश अप्रैल से नवंबर तक कृषि एवं सहकारी विभाग के केंद्रीय राज्य मंत्री रहे। साल 1991 में दसवीं लोकसभा का चुनाव हुए नीतीश एक बार फिर से संसद में पहुंचे। इसी साल नीतिश कुमार जनता दल के महासचिव बने और संसद में जनता दल के उपनेता भी बने।

वर्ष 1993 को नीतीश को कृषि समित का अध्‍यक्ष बनाया गया। साल 1996 में वह 11वीं लोकसभा के लिए चुने गए। नीतीश साल 1996–98 तक रक्षा समिति के सदस्य भी रहे। साल 1998 में वह फिर 12वीं लोकसभा के लिए चुने गए। 1998-99 तक रेलवे मंत्री भी रहे। साल 1999 में नीतीश कुमार 13वीं लोकसभा के लिए चुने गए और केंद्रीय कृषि मंत्री बने।

दो बार बने मुख्‍यमंत्री 

साल 2000 नीतीश के राजनीतिक करियर का सबसे अहम मोड़ था। इस साल नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। उनका बेहद अल्‍पकालिक कार्यकाल 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक चला। साल 2000 में नीतीश एक बार फिर से केंद्रीय कृषि मंत्री रहे। साल 2001 में नीतीश को रेलवे का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।

साल 2001 से 2004 तक वह केंद्रीय रेलमंत्री रहे, जिस दौरान 2002 के गोधरा कांड के बाद गुजरात सांप्रदायिकता की आग में जल गया था। साल 2004 में नीतीश 14वीं लोकसभा के लिए चुने गए। साल 2005 में नीतीश कुमार पहली बार सही मायने में मुख्‍यमंत्री बने। यह कार्यकाल 24 नवंबर 2005 से 24 नवंबर 2010 तक चला। 26 नवंबर 2010 को नीतीश कुमार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।