Thursday, November 24, 2016

नोटबंदी से बेअसर रहा ये डिजिटल गांव, सच में मेरा देश बदल रहा है...

शशांक शेखर बाजपेई। मेरा देश वाकई बदल रहा है और इसकी शुरुआत एक गांव से हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर को जब 500 और 1000 रुपए के नोट बंद करने की घोषणा की थी। उसके बाद देशभर में नोट बदलवाने के लिए बैंकों के बाहर और एटीएम में लाइन लग गई थी।

मगर, गुजरात के साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर उप जिले में स्थित अकोदरा गांव में ऐसा नहीं हुआ। यहां चिप्स के पैकेट खरीदने से लेकर, सब्जी, दूध आदि के लिए नगद पैसे नहीं देने पड़ते हैं। 1500 की आबादी वाले इस गांव में 1200 लोगों के पास बैंक अकाउंट हैं।

पान की दुकान पर भी मोबाइल बैंकिंग और वाई-फाई नेटवर्क है। यही वजह है कि इसे देश के पहले डिजिटल गांव होने का गौरव मिला है। आईसीआईसीआई बैंक ने इस गांव को गोद लेकर पूरी तरह डिजिटल बना दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन-धन योजना का लाभ जैसे इस गांव ने उठाया है, वह काबिले तारीफ है।

गांव पूरी तरह से वाईफाई से लैस है, लेकिन काफी लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं। ऐसे में बैंक ने उन्हें एसएमएस के जरिए पैसा ट्रांसफर करने की सुविधा देता है। यहां के लोग सामान खरीदने के बाद फोन पर टेक्स्ट मैसेज भेजकर पैसे चुका देते हैं।

इस मैसेज में पेमेन्ट पाने वाले का अकाउंट नंबर और जितना पैसा ट्रांस्फर किया जाना है, उसकी जानकारी रहती है। यह मैसेज खरीदार अपने बैंक को भेजता है और फिर तुरंत भुगतान हो जाता है।

अहमदाबाद से 90 किमी की दूरी पर स्थित अकोदरा गांव अपने आप में एक मिसाल है। यहां स्कूल के बच्चे भी टैब से पढ़ते हैं और ज्ञान के लिए वे गुरू जी पर ही निर्भर नहीं हैं। गूगल बाबा की मदद से उन्हें देश-दुनिया की सारी खबर है। गांव के स्कूलों में ब्लैकबोर्ड की जगह स्मार्ट बोर्ड ने ले ली है। पढाई डिजिटल हो गई है और बच्चे भी पहले की तुलना में अधिक संख्या में पढ़ने के लिए स्कूल में आ रहे हैं।

डिस्कवरी चैनल ने इसकी डॉक्यूमेंट्ररी भी बनाई है। तो अब हुआ न आपको यकीन कि मेरा देश बदल रहा है... 

Wednesday, November 9, 2016

100 दिनों में क्या ट्रंप इन योजनाओं को दे पाएंगे अंजाम

'अमेरिका फर्स्ट' के वादे से लोगों के वोटों को अपनी जीत में बदलने वाले डोनाल्ड ट्रंप के लिए आने वाले दिन आसान नहीं होंगे। चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करना आसान काम नहीं होगा।
शुरुआती 100 दिनों में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना होगा। उन्होंने पिछले महीने पेनसिल्वेनिया के गेटिसबर्ग में अपने भाषण में पहले 100 दिनों का एजेंडा देश के सामने रखा था।
उन्होंने कहा था कि अमेरिका से 20 लाख अवैध प्रवासियों को देश निकालने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इस दौरान जो देश अपने नागरिकों को वापस लेने से इनकार करेंगे, उनकी वीजा मुक्त यात्रा की छूट खत्म की जाएगी।
ओबामा के हर सरकारी ऑर्डर को रद्द किया जाएगा। इसमें विवादास्पद रही ओबामा केयर पॉलिसी भी शामिल है। माना जा रहा है कि वह पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद को भी बंद कर देंगे, जो आतंकवाद के खिलाफ जंग के नाम पर दी जाती रही है। 
मुस्लिम विरोधी विवादास्पद बयान के कारण चर्चा में आए ट्रंप के सामने इस्लामिक कट्टरवाद से निपटना भी बड़ी चुनौती होगा। उनकी जीत की खबर सामने आने के बाद में अफगान तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने ट्रंप को संदेश दिया है कि अमेरिका को विकसित करने की नीति दूसरे देशों की आज़ादी छीनने वाली न हो।
मुजाहिद ने कहा कि दूसरे देशों की बर्बादी पर अपने राष्ट्रीय हित न देखे जाएं, ताकि दुनिया अमन के साथ रहे और मौजूदा जारी संकट खत्म हो। इसके साथ ही यह आशंका भी जाहिर की जा रही है कि वह रूस के साथ मिलकर चरमपंथी आतंकी संगठनों पर कड़ी कार्रवाई कर सकते हैं।
इसके साथ ही वह संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम को दी जाने वाली अमेरिकी मदद पर भी रोक लगाएंगे। इन पैसों से वह अमेरिकी बुनियादी ढांचे का विकास करेंगे। 

क्या ट्रंप और पुतिन की करीबी से बदलेंगे रूस-अमेरिकी संबंध

शशांक शेखर बाजपेई। रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं, जो वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए निःसंदेह एक बड़ी घटना है। मुस्लिम विरोधी ट्रंप की छवि दक्षिणपंथी नेता की है, जो आतंकवाद और कट्टरपंथ को मिटाने का मुद्दा लेकर चुनाव जीते हैं।

ट्रंप की जीत अमेरिकी राजनीति में कई बड़े बदलावों का संकेत दे रही है। दरअसल, पुतिन को डेमोक्रैटिक पार्टी से निजी परेशानी है कारण साल 2012 में जब वह राष्ट्रपति चुने गए थे, तो डेमोक्रैटिक पार्टी ने पूरे चुनाव को फर्जी करार दिया था।

वहीं, रूस पर यूरोपीय देशों के चुनाव में दखलअंदाजी करने का आरोप भी डेमोक्रेट्स पहले से लगाते रहे हैं। मौजूदा समय में सीरिया को लेकर भी अमेरिका-रूस के संबंधों में जबरदस्त तनाव है। वह रूस की हर कार्रवाई पर सवालिया निशान लगाता रहा है। इस बीच ट्रंप की जीत इस समीकरण को बदलेगी।

मोदी की तारीफ कई मौकों पर ट्रंप कर चुके हैं। उन्होंने अपने चुनाव अभियान में मोदी के जुमले 'अबकी बार ट्रंप सरकार' का इस्तेमाल किया था। मोदी के रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ अच्छे संबंध हैं। रूस हमेशा से भारत के साथ खड़ा रहा है। आतंक के खिलाफ लड़ाई में भी रूस ने हमेशा भारत का साथ दिया है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो तीनों विश्वशक्ति के नेताओं का आतंकवाद को लेकर एक जैसा ही नजरिया है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में चरमपंथ के खिलाफ तीनों देशों के नेता सशक्त कार्रवाई हो सकती है।





Friday, August 19, 2016

टोक्यो अोलिंपिक में मिलेंगे पदक, खर्च करने होंगे हर पदक के लिए 48 करोड़ रुपए

शांक शोखर बाजपेई। 

रियो ओलिंपिक में हरियाणा की रहने वाली साक्षी मलिक ने कुश्ती में कांस्‍य जीतकर एथलीट्स के पदक जीतने को लेकर लगी पनौती को तोड़ दिया था। उनके बाद बैटमिंटन खिला़ड़ी पीवी सिंधू ने भी सिल्वर मेडल पक्का कर लिया है। अब देखना यह है कि क्या वह भारत की झोली में स्वर्ण डाल पाएंगी।

बीते दिनों चीन की सरकारी मीडिया ने भारत का मजाक उड़ाते हुए खबर प्रकाशित की थी कि भारत ओलिंपिक में पदक जीतने में पीछे क्यों है। इस बीच ओलिंपिक गोल्‍ड मेडलिस्‍ट अभिनव बिंद्रा ने कहा है कि एक मेडल को जीतने के लिए करीब 48 करोड़ रुपए का निवेश करना होगा। 
ईज ऑफ विनिंग मेडल को दे अहमियत
इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी को ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की तर्ज पर ईज ऑफ विनिंग मेडल को अहमियत देनी होगी। यह बात उन्‍होंने साक्षी मलिक की जबरदस्‍त जीत के बाद ट्वीट करते हुए कही। बिंद्रा ने कि हर मेडल की कीमत करीब 55 लाख पाउंड होती है। इतना निवेश करने पर ही एथलीट्स से मेडल की उम्मीद करनी चाहिए। 
उन्‍होंने कहा कि जब तक हम घर पर इस सिस्‍टम को लागू नहीं करते हैं, तब तक हमें मेडल की उम्‍मीद नहीं करनी चाहिए। बिंद्रा ने कहा कि यदि 2020 में टोक्‍यो ओलिपिंक में सात मेडल जीतने के लिए भारत को 336 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। 
यह राशि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रियों द्वारा साल 2015-16 में किए गए विदेश दौरों से काफी कम है। गौरतलब है कि विदेश दौरों में करीब 567 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
उदय कोटक भी समर्थन में
कोटक महिंद्रा बैंक के एमडी उदय कोटक ने ट्वीट किया कि भारत 7.6 फीसद की वृध्दि दर से दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍था है। मगर, आर्थिक सफलता को खेलों के वैभव के रूप में भी दिखना चाहिए। 
उदय कोटक ने कहा कि खेल किसी भी देश की प्रगति का संकेत होता है। अमेरिका पदकों की सूची में हमेशा ही आगे रहता है। चीन भी अच्‍छा कर रहा है। उम्‍मीद है कि भारत भी जल्‍द ही कुछ अधिक मेडल अपने खाते में लाएगा। हालांकि, हमें अभी लंबा सफर तय करना है। 
बॉक्सर मनोज की गुजारिश, 10 मिनट दें मोदीजी, बदल जाएगा इतिहास
बॉक्सर मनोज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से उनके कीमती समय में से मुझे 10 मिनट मांगे हैं ताकि वह खेलों और खिलाडियों की समस्यायों और समाधान से उनको अवगत करा सकें। उन्‍होंने कहा कि बहुत बेसिक चीजें करके भी हम भारतीय खेलों में क्रन्तिकारी परिवर्तन ला सकते हैं। 
उन्होंने कहा कि मुझे दुःख है कि मैं ओलंपिक में देश के लिए मेडल नहीं जीत सका। मैंने अपना श्रेष्ठ देने की कोशिश की और पिछले चार सालों में विपरीत परिस्थितयों में हमने जी तोड़ मेहनत की और ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया। खासकर ऐसे समय में जब मेरे पास कोई स्पॉन्सरशिप नहीं थी, न ही सरकार की ओर से कोई सहायता थी।
जब हम देश के लिए मेडल नहीं जीत पाते तो बहुत दुःख होता है। लेकिन इस बारे में आप कुछ नहीें कर सकते और कई बार मेहनत करने के बाद भी चीजें आपके पक्ष में नहीं जाती। खेल के मैदान में कोई हारना नहीं चाहता हर कोई जीतना चाहता है, लेकिन हार-जीत खेल का हिस्सा हैं।
हम अपना सर्वश्रेष्‍ठ देते हैं
हमारा काम खेलना होता है और उसमें हम अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं। यदि हमारे देश के ओलंपिक में मेडल नहीं आते तो खिलाडियों को दोष देना गलत होगा। हमारे देश के खिलाडियों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। वे विश्व के श्रेष्ठ खिलाडियों के साथ कम्पटीशन करके ओलंपिक तक पहुंचते हैं, ये भी कम उपलब्धि नहीं है।
मगर, एक खिलाड़ी की हार के पीछे बहुत सारी परिस्थितियां होती हैं, जो हमारे खिलाडियों के प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं। किसी खिलाडी के पास जॉब नही होती, कभी स्पॉन्सरशिप नही होती, कभी प्रमोशन की समस्या, कभी परिवार को लेकर समस्याएं, यहां तक कई बार तो खिलाडी के पास ट्रेनिंग और डाइट के लिए भी पैसे नही होते।

Thursday, July 28, 2016

कला और संस्‍कृति के दो सशक्‍त हस्‍ताक्षरों का निधन

लच्छू महाराज और महाश्वेता देवी
वाराणसी/कोलकाता। बनारस घराने के जाने-माने तबला वादक पंडित लच्छू महाराज का वाराणसी के एपेक्स अस्पताल में बुधवार देर रात निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार को वाराणसी में ही किया जाएगा। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

वहीं, लेखिका महाश्वेता देवी का गुरुवार को बेलव्‍यू अस्‍पताल में निधन हो गया। दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया है। वह भी लंबे समय से बीमार चल रही थीं। पश्‍िचम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बैनर्जी ने उनके निधन पर शोक जताया है।

बांग्ला साहित्यकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी को 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपने को एक पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया।

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फक्कड़ स्वाभाव के के माने जाने वाले पं. लच्छू महाराज ने बॉलीवुड की कई फिल्मों में तबला बजाया था। इनकी शिष्य परंपरा के सैकड़ों कलाकार देश-दुनिया में मशहूर हो रहे हैं। पं. लच्छू महाराज के बचपन का नाम लक्ष्मीनारायण सिंह और उन्‍होंने पिता वासुदेव नारायण सिंह से तबला वादन सीखा था।

फिल्म अभिनेता गोविंदा उनके भांजे हैं। लच्छू महाराज ने टीना नाम की फ्रांस की महिला से विवाह किया था। उनकी पुत्री नारायणी अपनी मां के साथ स्विट्जरलैंड में रह रही हैं। वाराणसी में उनकी पत्नी और पुत्री के आने का इंतजार है। मणिकर्णिका घाट पर कल उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

लच्‍छू महाराज की उम्र 72 वर्ष थी और तबीयत खराब होने के बाद परिजनों ने उन्हें महमूरगंज स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया। मगर, चिकित्सकों की तमाम कोशिशों के बावजूद उनको बचाया नहीं जा सका।
writer mahasweta devi and Indian Tabla Player lacchu Maharaj passed way 

Thursday, July 21, 2016

उदारीकरण के बाद संभावित सुपरपावर बनने की दिशा में ऐसे बढ़ा भारत

Liberalization in India 
 शशांक शेखर बाजपेई। वर्ष 1991 में भारत को उदारीकरण के लिए अपने दरवाजे खोलने पड़े थे। दरअसल, उस वक्‍त देश के पास एक हफ्ते के निर्यात के बराबर ही विदेशी मुद्रा बची थी। भारत दिवालियेपन की कगार पर पहुंच चुका था। भारत को विदेशी मुद्रा की सख्‍त जरूरत थी।

ऐसे में विश्‍व शक्‍ितयों के दबाव में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्‍िवककरण की दिशा में कदम बढ़ाए। लाइसेंसी राज को खत्‍म किया गया और सरकार ने उद्योगों से हाथ खींचकर नियामक की भूमिका में आ गई। इस साल आर्थिक सुधारों के 25 वर्ष इस साल पूरे हो गए।

मनमोहन सिंह ने बनाया उदारीकरण का खाका 

इस काम के लिए नरसिंह राव प्रख्यात अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को अपनी कैबिनेट में वित्त मंत्री बनाकर ले आए जिस पर कई लोगों को हैरानी हुई। मगर, मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था को उबारने के साथ ही उदारीकरण की राह प्रशस्त की और भारतीय बाजार को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया।

यही वजह है कि डॉक्टर मनमोहन सिंह को भारत में आर्थिक उदारीकरण का जनक माना जाता है। इसके पहले तक भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

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उदारीकरण के पहले देश की जीडीपी दर एक फीसद थी। जुलाई 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव द्वारा लागू आर्थिक सुधारों के कारण आज भारत परचेजिंग पावर पैरिटी के मामले में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है।

सुपरपावर बनने की राह पर भारत 

Shashank Shekhar Bajpai
अब सिर्फ चीन और अमेरिका ही भारत से बड़ी अर्थव्यवस्था है। हम सभी यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं और जापान से आगे निकल चुके हैं। वर्ष 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए कोई मायने नहीं रखती थी। मगर, वर्तमान में 7.6 प्रतिशत की विकास दर को छूते हुए भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है।

यही वजह है कि आज भारत को संभावित सुपरपावर के रूप में देखा जा रहा है। भारत को एकमात्र एशियाई शक्ति के रूप में देखा जा रहा है जो 21वीं सदी में चीन को टक्कर दे सकता है। यही वजह है कि अमेरिका ने न्यूक्लियर क्लब में भारत की एंट्री की व्यवस्था की और अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर रहा है।

उदारीकरण में इन बिंदुओं को अपनाया गया

उदारीकरण के बाद भारत की नीतियों में अहम बदलाव आए। इसके तहत इन योजनाओं पर काम किया गया...
  • विदेशी प्रौद्योगिकी समझौतों
  • विदेशी निवेश
  • एमआरटीपी अधिनियम, 1969 (संशोधित)
  • औद्योगिक लाइसेंसिंग ढील
  • निजीकरण की शुरुआत
  • विदेशी व्यापार के लिए अवसर
  • मुद्रास्फीति को विनियमित करने के लिए कदम कर सुधारों
  • लाइसेंसराज को खत्‍म किया गया 
1991 में लैंडलाइन फोन के करीब 50 लाख कनेक्‍शन हुआ करते थे मगर, आज देश में 104 करोड़ से अधिक लोगों के हाथ में मोबाइल फोन हैं। 1991 में करीब 20 फीसद भारतीयों के पास टीवी सेट्स थे और दूरदर्शन का बोलबाला था। आज देश में 800 से अधिक टीवी चैनल्स हैं। रेडियो में आकाशवाणी की जगह पर 24 घंटे चलने वाले 45 एफएम रेडियो स्टेशन खुल गए हैं।

सूचना क्रांति ने बदल दी दिशा 

जब कंप्‍यूटर को देश में लाया गया, तो कई लोगों की नौकरी इसलिए चली गई क्‍योंकि कई लोगों का काम एक अकेला कंप्‍यूटर कर सकता था। मगर, बाद में यही लोगों के रोजगार का नया जरिया बना।

ई-मेल, वेबसाइट, ऐप्‍स, फेसबुक, वॉट्सऐप, ट्विटर ने सोशल मीडिया को बदल दिया। करीब 24 करोड़ सक्रिय हैं।

बैंकिंग सेक्‍टर में आया बदलाव 

बैंकिंग सेक्‍टर में भी जबरदस्‍त बदलाव आया। आज हर काम के लिए बैंक जाने की जरूरत ही नहीं रही। बैंक से पैसा निकालने के लिए लाइन में लगने की जरूरत खत्‍म हो गई।

साल 1987 में मुंबई में HSBC बैंक ने पहला एटीएम लगाया, जबकि नवंबर 2015 तक करीब दो लाख एटीएम का इस्तेमाल हो रहा है। सबसे ज्‍यादा एटीएम के मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बाजी मारी है।

अब देश की अर्थव्‍यवस्‍था बचत से लोन की ओर मुड़ गई है। छोटे-छोटे रोजमर्रा के उपयोग की खरीदारी के लिए बैंकों ने लोगों को क्रेडिट कार्ड देना शुरू किया। वर्तमान में 2.07 करोड़ से अधिक लोग क्रेडिट कार्ड का प्रयोग कर रहे हैं।

Liberalization makes india possible Super Power from bankruptcy 

Wednesday, July 20, 2016

हेनरी फोर्ड की इन दूरदर्शिताओं से फोर्ड बनी आज सबसे बड़ी कंपनी

शशांक शेखर बाजपेई। 

हेनरी फोर्ड का जन्म 30 जुलाई 1863 को अमेरिका के मिशीगन में हुआ था। साधारण किसान पर‍िवार में जन्‍म लेने के बावजूद उन्‍होंने बड़े सपने देखे और उन्‍हें पूरा करने की कोशिश की।

उनके इसी जुझारुपन ने साल 1903 में बनाई गई छोटी सी फोर्ड कंपनी को आज अमेरिका की दूसरी बड़ी कंपनी बना दिया। जानते हैं हेनरी फोर्ड की दूरदर्शिता के बारे में, जिसने दुनिया को बदल दिया...

हफ्ते में पांच दिन आठ घंटे का नियम बनाया 

हेनरी फोर्ड ही वह व्‍यवसायी थे, जिन्‍होंने दुनियाभर को हफ्ते में पांच दिन आठ घंटे काम का मॉडल दिया। इसके साथ ही बड़े स्तर पर उत्पादन की असेम्बली लाइन तकनीक को अपनाने का श्रेय भी हेनरी फोर्ड को ही जाता है।

shashank shekhar bajpai 
ब्रिटेन में रॉबर्ट ऑवेन ने एक अभियान शुरु किया, जिसका नारा था 'आठ घंटे मेहनत, आठ घंटे मनोरंजन, आठ घंटे आराम'। 19वीं सदी की शुरुआत में फोर्ड ने इस बात पर गौर किया और इसे अपनी कंपनी में लागू कर दिया।

हेनरी फोर्ड ने 5 जनवरी 1914 को घोषणा की थी कि कर्मचारियों का रोजाना भत्‍ता पांच डॉलर होगा। उस समय कर्मचारियों को ढाई डॉलर से भी कम मिलते थे। इस फैसले से कम तनख्वाह पाने वाले कर्मचारियों के जीवन में सकारात्मक असर पड़ा।

फोर्ड के इस फैसले की चर्चा पूरी दुनिया में हुई। अमेरिकी शहर डेटरॉयट में काम करने के इच्छुक लोगों की भीड़ बढ़ने लगी। इससे दूसरी कंपनियों पर भी दबाव बना कि वे भी कर्मचारियों के वेतन बढ़ाएं।

हेनरी फोर्ड के इस फैसले ने औद्योगिक व्यवस्था की सूरत हमेशा के लिए बदल दी। हेनरी का मानना था कि श्रमिकों की तनख्वाह भी इतनी होनी चाहिए कि वे भी कार खरीद सकें। वेतन बढ़ने से अमेरिका में मध्यमवर्ग तैयार हुआ।

कर्मचारियों से होती है ईष्‍या 

अपने अंतिम समय में उन्‍होंने कहा था कि जब मैं अपने कारखाने में काम करने वाले मजदूरों को मोटी-मोटी रोटी खाते तथा नाचते गाते और रात में चैन की नींद लेते हुए देखता हूं, तो मुझे उनसे ईष्‍​र्या होती है।

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मैं दुनिया का सबसे अमीर आदमी हूं लेकिन मुझे लाख कोशिशों के बाद भी नींद नहीं आती। उन्‍होंने कहा था कि जब मेरी मृत्यु हो और मुझे दूसरा जन्म मिले, तो मैं चाहूंगा कि मैं मजदूरों के साथ काम करूं, ताकि मैं भी  रात में चैन की नींद ले सकूं।

फोर्ड के दिए गए प्रेरणादायक वाक्‍यांश 

I believe God is managing affairs and that He doesn’t need any advice from me. With God in charge, I believe everything will work out for the best in the end. So what is there to worry about.
मुझे विश्वास है कि भगवान् सब चीजें मैनेज कर रहे हैं और उन्हें मुझसे किसी सलाह की जरुरत नहीं है। भगवान् के होते हुए, मुझे यकीन है कि अंत में सब अच्छा होगा। तो फिर चिंता करने की क्या बात है।

Anyone who stops learning is old, whether at twenty or eighty. Anyone who keeps learning stays young. The greatest thing in life is to keep your mind young.
जो कोई भी सीखना छोड़ देता है वो बूढ़ा है, चाहे वो बीस का हो या अस्सी का। जो कोई भी सीखता रहता है वो जवान है। दुनिया की सबसे महान चीज है अपने दीमाग को युवा बनाये रखना।

When everything seems to be going against you, remember that the airplane takes off against the wind, not with it.
जब सब कुछ आपके खिलाफ जा रहा हो तो याद रखिये हवाई जहाज हवा के विरुद्ध उड़ान भरता है उसके साथ नहीं।

You can’t build a reputation on what you are going to do.
आप इस पर अपनी प्रतिष्ठा नहीं बना सकते कि आप क्या करने जा रहे हैं।

Failure is simply the opportunity to begin again, this time more intelligently.
विफलता बस फिर से शुरू करने का अवसर है, इस बार और अधिक समझदारी से।

Henery ford changed the world by is farsighted approached, some of his famous quotes  

Saturday, July 16, 2016

'बिकनी' वाला उत्‍तेजक वीडियो देखकर 'पढ़ाई' के लिए प्रेरित होंगे युवा

जो वीडियो जारी किया गया है, उससे निकाली गईं स्टिल तस्‍वीरें। 
मॉस्को। दक्षिण-मध्य रूस की यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई के लिए युवाओं को आ‍कर्षित करने के लिए जो वीडियो बनाया गया है, उसे देखकर आप चौंक जाएंगे।

शिक्षा के लिए छात्रों को आकर्षित करने का यह तरीका कितना कारगर होगा, यह तो वक्त ही बताएगा। मगर, इसे लेकर चर्चा जरूर शुरू हो गई है।

डेली मेल में प्रकाशित खबर के अनुसार, यूनिवर्सिटी की सुविधाओं, स्टाफ और शैक्षणिक कोर्स पर फोकस नहीं किया गया है।

इसके बजाय बिकनी और तंग कपड़े पहने छात्रों को यहां उत्तेजक रूप से किताब पढ़ते हुए, पॉप सॉग्स की तरह खुली कार के पीछे बैठकर मस्ती करते दिखाया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इसे शिक्षा अधिकारियों ने ही जारी किया है।

रूस की यूनिवर्सिटी की ओर से जारी किए गए वी‍डियो देखने के लिए क्लिक करें


बताया जा रहा है कि इस क्लिप को इसलिए र‍िलीज किया गया है, ताकि स्कूल छोड़ने वाले युवा वीडियो देखकर ट्युमेन की यूनिवर्सिटी में दाखिले के लिए प्रेरित हों।

यह भी पढ़ें : साउथ चाइना सी का विवाद, एक नजर में...


इस फुटेज में छात्राओं को बिकनी पहनकर धूप में सनबाथ लेते हुए और चुस्‍त कपड़ों में हॉर्स राइडिंग करते हुए दिखाया गया है। इसमें ट्युमेन में पढ़ाई करने के फायदों को दिखाते हुए रिलीज किया गया है।

यह भी पढ़ें : बृहस्‍पति की पत्‍नी का नाम है जूनो, इसलिए नासा ने रखा यह नाम

Shashank Shekhar Bajpai 
वीडियो की शुरुआत होती है बिकनी पहने एक युवती के साथ, जो किताब पढ़ते हुए स्ट्रॉ से कॉकटेल पी रही है। उसके शरीर के अन्य हिस्सों पर कैमरा घूमने से पहले ही युवती के क्लीवेज पर जाकर रुक जाता है।

इसके बाद कैमरा अन्‍य छात्राओं की ओर घूमता है, जिसमें कई लड़कियां खुली कार में पॉप म्‍यूजिक वीडियो स्‍टाइल में झूमती हुई दिखती हैं। हवा से उनकी भूरी जुल्‍फें लहराती हुई दिख रही हैं। लड़के भी पूरी मस्ती करते दिख रहे हैं।

इसके बाद फुटेज उसी पहली लड़की पर जाकर खत्‍म होती है, जो यूनिवर्सिटी की नई बिल्डिंग के लॉन पर आराम कर रही है।

Provocative video shows bikini clad women on sun loungers in a bizarre bid to entice young men to study in tyumen

जानिये कौन है US में निर्वासित जीवन जी रहा तुर्की के तख्‍तापलट का जिम्‍मेदार गुलेन

fethullah gulen the cleric being blamed for turkey coup attempt
अंकारा। तुर्की में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के तख्तापलट की बड़ी साजिश छह घंटे चले तमाशे के बाद नाकाम हो गई है।

इस साजिश के पीछे तुर्की के राष्ट्रपति रेसिप तेयेप एर्दोगान ने मुस्‍लिम मौलवी फतेउल्‍लाह गुलेन को‍ जिम्‍मेदार ठहराया है। फिलहाल यह पेन्‍सलवेनिया में निर्वासित जीवन जी रहा है।

तुर्की सरकार के एक वकील रॉबर्ट एम्‍सटर्डम ने बताया कि हमें इस बात के संकेत मिल रहे हैं हैं कि इस तख्‍तापलट की कोशिश में सीधे तौर पर गुलेन शामिल था। रॉबर्ट ने बताया कि उन्‍होंने और उनकी फर्म ने गुलेन और उसके मूवमेंट के खतरे के बारे में लगातार अमेरिकी सरकार को चेताया है।


तुर्की सरकार के खुफिया सूत्रों के अनुसार, इस बात के संकेत हैं कि चुनी हुई नागरिक सरकार के खिलाफ गुलेन सैन्‍य नेतृत्‍व के कुछ सदस्‍यों के साथ सीधे संपर्क में था। हालांकि, गुलेन के विचारों को बढ़ावा देने वाले न्यूयॉर्क के संगठन अलाइंस फॉर शेयर्ड वैल्‍यूज के अध्‍यक्ष ने इन आरोपों से इंकार किया है।

कौन है फतेउल्‍लाह गुलेन 

वह एक प्रशिक्षित इमाम है। करीब 50 साल पहले वह इस्‍लाम के रहस्‍यमयी रूप दर्शन के साथ लोकतंत्र, विज्ञान, शिक्षा को बढ़ावा देने के कारण चर्चा में आया था।

उसके समर्थकों ने 100 से अधिक देशों में 1000 स्‍कूलों को शुरू किया। इनमें से 150 से अधिक स्‍कूल्‍स अमेरिका और तुर्की में करदाताओं के पैसों से चल रहे हैं। इसके अलावा वह यूनिवर्सिटी, हॉस्पिटल, च‍ैरिटी, एक बैंक और बड़े पैमाने पर मीडिया अंपायर चला रहा है, जिसमें अखबार, रेडियो और टीवी चैनल शामिल हैं।

अमेरिका में बैठकर रच रहा है साजिश 

Shashank shekhar bajpai 
तुर्की के राष्‍ट्रपति रेसिप तेयेप एर्दोगान लंबे समय से गुलेन पर आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि वह न्‍सलवेनिया के पोकोनो माउंटेन में 26 एकड़ के कपांउड में बैकठकर आधिकारिक रूप से चुनी गई तुर्की की धर्मनिरपेक्ष सरकार को उखाड़ फेंकने की योजना बना रहा है।

वह कभी-कभार ही सार्वजनिक रूप से देखा जाता है और उसकी अनुपस्थिति में कम से कम तीन पर उस पर ट्रायल चल चुका है। अमेरिका ने गुलेन को वापस तुर्की भेजने के मामले में थोड़ा रुझान दिखाया है। हालांकि, न्याय विभाग ने गुलेन के मामले पर टिप्पणी करने से मना कर दिया है।

अम‍ेरिका में गुलेन की कानूनी स्थिति 

पिछले महीने तुर्की सरकार का प्रतिनिधित्‍व करने वाले वकीलों ने कहा कि वह गुलेन के गैरकानूनी कामों को उजाकर करना जारी रखेंगे। इसके एक दिन पहले ही पेन्‍सलवेनिया के स्‍क्रैंटन में फेडरल जज ने मौलवी के खिलाफ लगाए गए मुकदमे को खारिज कर दिया था।

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वकील रॉबर्ट एम्सटर्डम ने इस फैसले के परिणाम के बावजूद कहा था कि गुलेन और पोकोनॉस में बैठे उसके सह षड्यंत्रकारियों के लिए यह बहुत ही स्पष्ट संदेश है कि उनके पास दंड से बचने के गिने चुने दिन बाकी हैं। उन्‍होंने कहा था कि गुलेन के गैरकानूनी आचरण को सामने लाया जाएगा।

स्‍कूलों के बारे में क्‍या क‍िया गया 

वित्‍तीय अन‍ियमितताओं और वीजा जालसाजी के आरोपों के बीच गुलेन के द्वारा चलाए जा रहे कुछ स्‍कूलों की जांच एफबीआई के अधिकारियों ने की। इनमें से सबसे चौंकाने वाला दावा यह है कि स्‍कूल तुर्की से टीचरों को बुला रहा है, ताकि वे प्रभावित छात्रों की पहचान कर सकें और उन्‍हें गुलेन के मूवमेंट से जोड़ने के लिए राजी कर सकें।

Fethullah Gulen being blamed for Turkey coup attempt

Friday, July 15, 2016

खूबसूरती के लिए मशहूर नीस को आतंकियों ने बनाया निशाना, ये हैं खासियत

पेरिस। फ्रांस में एक बार फिर आतंकी हमला हुआ है। नीस शहर में नेशनल डे का जश्न मना रही भीड़ में तेज रफ्तार ट्रक जा घुसा, जिससे 80 लोगों की मौत हो गई, जबकि करीब 120 लोग गंभीर घायल हैं।

फ्रांस का शहर नीस आबादी के लिहाज से पांचवे स्‍थान पर है। पहले से चौथे स्‍थान पर क्रमश: पेरिस, मार्सिले, ल्‍यॉन और टुलूज हैं। एक अनुमान के मुताबिक यहां करीब दो हजार भारतीय रहते हैं। जानते हैं फ्रांस के इस खूबसूरत शहर के बारे में कुछ बातें।

राजधानी 

फ्रांस में आल्प्स मैरीटाइम्‍स डिपार्टमेंट की राजधानी के रूप में नीस को जाना जाता है। यह शहर 278 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैला हुआ है।

दूसरा बड़ा शहर 

मैडिटेरियन कोस्‍ट और प्रॉविंस-आल्‍प्‍स-कोटे-डी'अजर रीजन में नीस को दूसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता है। आबादी के लिहाज से यह पांचवा बड़ा शहर है। यह भूमध्‍य सागर के किनारे फ्रांस के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है।

फ्रांस को 1860 में मिला वापस 

इतिहास के आधार पर फ्रांस के इस शहर पर कई देशों का प्रभुत्‍व रहा है। कई वर्षों तक इस पर सेवॉय का प्रभुत्‍व रहा। इसके बाद 1792 से 1815 तक यह फ्रांस का हिस्‍सा रहा। इसके बाद इस कस्‍बे को पीडमोंट-सार्डिनिया को दे दिया गया। इसके 45 सालों बाद 1860 में यह वापस फ्रांस को मिल गया।

नीस का नाम 

shashank shekhar bajpai 
इस शहर का नाम है नीस ला बेला, जिसका अर्थ होता है नीस द ब्‍यूटीफुल। दरअसल, समुद्र के किनारे बसा यह शहर अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। भूमध्‍य सागर के किनारे बसे होने के कारण यहां गर्मी का लुत्‍फ उठाया जा सकता है। साल 1912 में मेनिसा रोंडेली ने नीस के लिए अनाधिकृत एंथम (राष्‍ट्रगान) लिखा था।

40 लाख पर्यटक आते हैं हर साल 

इस खूबसूरत शहर में घूमने के लिए हर साल करीब 40 लाख लोग यहां आते हैं। ऐसे में इस पूरे शहर में आपको हजारों की तादात में होटल मिल जाएंगे। यहां की स्‍वच्‍छ हवा और खूबसूरत नजारे दुनियाभर के बड़े पेंटर्स को यहां खींच लाते हैं।

यहां के प्रमुख आकर्षण 

नीस का प्रमुख आकर्षण यहां का बड़ा ग्रीन ब्‍ल्‍यू सी, शॉपिंग और डायनिंग हैं। इनका लुत्‍फ उठाने के लिए दुनियाभर से लोग यहां कुछ समय बिताने के लिए आते हैं।

खूबसूरत बाजार 

एंटीक और खूबसूरत बाजा को देखने के शैकीन लोग यहां के Cours Saleya Flower Market जरूर जाते हैं। यहां बहुत सारे कैफे, फ्लावर शॉप और सोवेनियर शॉप्‍स हैं।

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Tuesday, July 12, 2016

साउथ चाइना सी का विवाद, एक नजर में...

बीजिंग। दक्षिण चीन सागर पर अध‍िकार को लेकर इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल (हेग ट्रिब्यूनल) ने मंगलवार को अपने आदेश में कहा कि दक्षिण चीन सागर पर चीन का कोई ऐतिहासिक अध‍िकार नहीं है। हालांकि, चीन ने इस फैसले को खारिज कर दिया है।

चीन ने कहा कि हम हेग ट्रिब्यूनल के फैसले को स्वीकार नहीं करते और न ही मान्यता देते। ट्रिब्यूनल ने यह फैसला, फिलीपींस की उस याचिका पर सुनाया जिसमें दक्षिण चीन सागर के ज्यादातर हिस्से पर चीन के दावे को चुनौती दी थी। जानते हैं दक्षिणी चीन सागर या साउथ चाइना सी को लेकर क्‍या है पूरा मामला...

अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय में क्‍यों गया मामला 

फिलीपींस ने 2013 में इंटरनेशनल कोर्ट में चीन के खिलाफ केस दायर किया था। फिलीपींस का दावा है कि बीते 69 साल से चीन का साउथ चाइना सी के 90 फीसद हिस्से पर कब्जा कर लिया है। उसने वहां न केवल कृत्रिम द्वीप बनाकर बड़ी तादाद में सेना भी तैनात की है।


क्‍यों अहम है यह इलाका 

साउथ चाइना सी, प्रशांत महासागर का एक हिस्सा है, जो सिंगापुर और मलक्का जलडमरू से लेकर ताइवान जलडमरू तक 35 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। चीन के दक्षिण से ताइवान द्वीप तक और मलयेशिया के उत्तर पश्चिम से ब्रुनेई तक, इंडोनेशिया के उत्तर में, मलयेशिया और सिंगापुर के उत्तर-पूर्व में और वियतनाम के पूर्व में स्थित है यह समुद्री इलाका है।

आर्थिक महत्व को लेकर विवाद 

करीब आधे व्यापारिक जहाज इसी इलाके से गुजरते हैं, जिसके जरिये करीब 3.4 ट्रिलियन पाउंड का व्‍यापार होता है। इसके अलावा साउथ चाइना सी में विशाल तेल और गैस के भंडार होने की जानकारी है। अमेरिका के मुताबिक, 213 अरब बैरल तेल यहां मौजूद है। 900 ट्रिलियन क्यूबिक फीट नेचुरल गैस का भंडार है। ऐसे में स्प्रातली द्वीप समूह के द्वीपों को लेकर चीन, वियतनाम, मलयेशिया, फिलीपींस और ब्रुनेई के बीच विवाद चल रहा है।

पारासेल द्वीपसमूह पर 1974 तक चीन और वियतनाम का कब्जा था। 1974 में दक्षिण वियतनाम और चीन के बीच झड़प के बाद वियतनाम के 14 सैनिक मारे गए और चीन ने इस पूरे द्वीपसमूह पर अपना कब्जा जमा लिया। उधर, चीनी राष्‍ट्रपति पहले ही साफ कर चुके हैं कि वे देश हित में इस इलाके में अपने दावे से पीछे हटने वाले नहीं हैं।

भारत का है यह कहना 

दक्षिण चीन सागर में चीन की तानाशाही को अमेरिका के बाद भारत ने भी चुनौती दी है। भारत ने चेतावनी देते हुए कहा है कि हम भी दक्षिण चीन सागर में अपना जहाज भेजने या उसके ऊपर उड़ान भरने को आजाद हैं। वह इलाका फ्रीडम ऑफ नेविगेशन के दायरे में आता है। अगर इस इलाके पर विवाद है, तो उसका हल इंटरनेशनल कानून के दायरे में किया जाए।

भारतीय अधिकारियों के अनुसार, हाल में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की फिलीपींस के फॉरेन मिनिस्टर अल्बर्ट एफ डे रोसारियो से मीटिंग हुई। भारत ने फिलीपींस ने वादा किया कि वह दक्षिण चीन सागर को पश्चिम फिलीपींस सागर के नाम से बुलाएगा। इसका नाम का इस्तेमाल दोनों लीडर्स ने अपने जॉइंट स्टेटमेंट में भी किया था। भारत ने दक्षिण चीन सागर के 90 फीसदी हिस्से पर चीन के दावे को खारिज किया है।

क्या है फ्रीडम ऑफ नेविगेशन

अंतरराष्ट्रीय समुद्र कानून देशों को उनकी समुद्री सीमा से 12 समुद्री मील तक के क्षेत्र में अधिकार देता है। उसके बाहर का जल क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सीमा माना जाता है। कोई भी देश इस सीमा के बाहर किसी क्षेत्र पर दावा नहीं कर सकता।

भारत की इस क्षेत्र में रुचि 

वियतनाम सरकार ने भारत सरकार की तेल और गैस कंपनी ओएनजीसी के साथ एक समझौता किया था। इसके अनुसार ओएनजीसी वियतनाम के छोटे द्वीपों में तेल और गैस की खोज करेगी। चीन ने इस पर कड़ा विरोध जताया था, जबकि भारत ने कहा था कि दक्षिण चीन सागर पूरी दुनिया की संपत्ति है।

अमेरिका भी इस मामले में चीन की खुली आलोचना करता है। अमेरिका का कहना है कि कई देशों के पास ऐसे मानचित्र हैं, जिनसे पता चलता है कि पिछले कई सौ सालों से भारत, अरब और मलय के व्यापारी दक्षिण चीन सागर में अपने समुद्री जहाजों को ले जाते थे और इसी समुद्र के माध्यम से व्यापार करते थे।

तेल, प्राकृतिक गैस और समुद्री मार्ग पर चीन की नजर 

1970 में वियतनाम और कई देशों ने यह पता लगाया कि यहां पर तेल और गैस के अपार भंडार हैं। इसके बाद इन देशों ने इस क्षेत्र में तेल और गैस की खोज शुरू कर दी। इसके बाद से चीन ने यहां कब्‍जा करने और यहां मौजूद संसाधनों के दोहन पर रोक लगाने के प्रयास तेज कर दिए।

यहां 900 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस के भंडार मौजूद हैं। यह आंकड़ा कतर में मौजूद भंडार के बराबर है। यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन ऐडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक क्षेत्र की असली संपत्ति यहां मौजूद प्राकृतिक गैस के भंडार हैं। शिपिंग लेन्स के कारण भी यह इलाका काफी महत्वपूर्ण है।

अन्‍य देशों की क्‍या है राय 

दुनिया के देश चीन या अमेरिका के साथ अपने संबंधों के आधार पर इस मसले पर अपनी स्थिति साफ कर रहे हैं। मगर, छोटे देश और क्षेत्रीय ब्‍लॉक्‍स इस रणनीतिक रस्‍साकसी को लेकर संशय में हैं। दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों के एसोसिएशन में शामिल देश भी संशय में हैं क्‍योंकि उसके चार सदस्‍य देश भी इस हिस्‍से में अपनी दावेदारी जता रहे हैं।

फिलीपीन्‍स ने 10 देशों के ब्‍लॉक पर दबाव बनाया है कि वे संयुक्‍त रूप से चीन से कहें कि वह अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय के फैसले का स्‍वागत करे। वहीं, कंबोडिया और लाओस चीन की स्थिति का समर्थन कर रहे हैं।

फिलीपीन्‍स और वियतनाम के अलावा मलेश‍िया, इंडोनेशिया और सिंगापुर ने भी चीन को सावधान किया है। अमेरिका, ब्रिटेन ओर बाकी यूरोपियन यूनियन मध्‍यस्‍थता का समर्थन करते हैं। वहीं, चीन का दावा है कि उसे करीब 40 से 60 देशों का समर्थन हासिल है। इनमें कई भू-आच्‍छादित अफ्रीकी देश और प्रशांत महासागर के द्वीप शामिल हैं, जहां बीजिंग आर्थिक शक्‍ित है।

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नई ब्रिटिश PM बन रहीं थेरेसा मे के बारे में ये बातें नहीं जानते होंगे आप

लंदन। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है वो बुधवार को पद से इस्तीफ़ा देंगे और उसी दिन थेरेसा मे देश की नई प्रधानमंत्री बनेंगी। मार्गेट थ्रेचर के बाद अब 59 वर्षीय थेरेसा मे ब्रिटेन की दूसरी महिला प्रधानमंत्री बनेंगी। वो 2010 से देश की गृह मंत्री हैं।

देश काे एकजुट रखेंगी जियोग्राफी ग्रेजुएट 

ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी से थेरेसा जियोग्राफी ग्रेजुएट हैं, जो सांसद बनने से पहले 1980 के दशक में बैंक ऑफ इं‍ग्‍लैंड के लिए काम कर चुकी हैं। उनका मानना है कि ऐसा नेतृत्व चाहिए जो देश और उनकी पार्टी को एकजुट रख सके। लेबर पार्टी राष्ट्रवादियों के साथ स्वयं स्कॉटलैंड और वेल्स में कई टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित हो रही है। ऐसे में उनकी पार्टी के लिए इससे बड़ा देशभक्ति का फर्ज और कोई नहीं होगा कि वह देश को एकजुट करें और उसके हितों के मद्देनजर शासन को संभालें।

जर्मन चांसलर से तुलना 

थेरेसा की तुलना अक्‍सर जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल से की जाती है। दोनों की तुलना उनके फैलादी फैसलों के लिए की जाती है। मर्केल की तरह ही थेरेसा का पालन भी प्रोस्‍टेंट पादरी के परिवर में हुआ है, जिनके मूल में सार्वजनिक सेवा रही है।

बृहस्‍पति की पत्‍नी का नाम है जूनो, इसलिए नासा ने रखा यह नाम

अब तक की सबसे लंबी गृह सचिव में से एक  

डेविड कैमरन ने प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद थेरेसा को मई 2010 में गृह सचिव नियुक्‍त किया था। वह पिछले छह साल से अधिक समय से यह भूमिका निभा रही हैं। उनके काम को कैबिनेट में सबसे कठिन काम माना जाता है।

वह सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली गृह सचिव रह चुकी हैं। इसके पहले लेबर एमपी जेम्‍स इडी ने 1945 से 1951 तक इतने समय तक इस पद पर काम किया था।

पूर्व पाक पीएम बेनजीर ने मिलवाया था पति से 

थेरेसा को उनके पति फिलिप मे से टोरी स्‍टूडेंट डिस्‍को में उन दोनों की म्‍यू‍चुअल फ्रेंड रही बेनजीर भुट्टो ने मिलवाया था। दो बार पाकिस्‍तान की प्रधानमंत्री रही बेनजीर की हत्‍या 2007 में कर दी गई थी। बेनजीर के जरिये मुलाकात के बाद जब थेरेसा और फिलिप ने 1980 में शादी की, उस वक्‍त थेरेसा 23 साल की और फिलिप 22 साल के थे। दोनों के कोई संतान नहीं है।

कैमरन भी मानने को हुए मजबूर, 'अच्‍छे दिन आने वाले हैं'


जनमत संग्रह के दौरान लो प्रोफाइल रहीं 

ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन में बने रहने के लिए थेरेसा ने डेविड कैमरन का समर्थन किया। मगर, वह इस अभियान के दौरान बहुत शांत रहीं। सांसदों का मानना है कि टोरी लीडरशिप कॉन्‍टेस्‍ट में बड़े समर्थन के लिए उन्‍होंने बहुत संभलकर कदम उठाए। हालांकि, जनमत संग्रह के बाद उन्‍होंने कहा‍ कि ब्रेक्‍िजट का अर्थ है ब्रेक्‍िजट और हम इसे सफल बनाने जा रहे हैं।

समलैंगिक विवाह की समर्थक, लेकिन... 

वह समलैंगिक विवाह की समर्थक हैं, लेकिन उन्‍होंने गे कपल को बच्‍चा गोद लेने के अधिकार के खिलाफ साल 2002 में वोट किया था। इसके अलावा उन्‍होंने गे लोगों के सहमति से संबंध बनाने की उम्र को कम करने के खिलाफ भी 1998 में मतदान किया था। उन्‍होंने 2013 में समलैंगिक विवाह के समर्थन में मतदान करते हुए कहा था कि, शादियां सभी की होनी चाहिए।

Things You Need To Know About Theresa May

Monday, July 4, 2016

बृहस्‍पति की पत्‍नी का नाम है जूनो, इसलिए नासा ने रखा यह नाम

पांच साल के सफर के बाद जूनो बृहस्पति पर पहुंचेगा, खोलेगा कई रहस्‍य

वॉशिंगटन। सौर मंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्‍पति के रहस्‍यों से पर्दा उठाने के लिए नासा ने पांच साल पहले, जो आगाज किया था आज वह अंजाम पर पहुंचने जा रहा है।

नासा ने 5 अगस्त, 2011 को जूनो अंतरिक्ष यान को लॉन्‍च किया था, जो 1.7 अरब मील की यात्रा के बाद 4 जुलाई को बृहस्पति ग्रह की कक्षा में प्रवेश कर रहा है। 1.1 अरब डॉलर के इस अभियान का मकसद बृहस्पति के विकिरण बेल्ट में प्रवेश करते हुए इस ग्रह का अध्ययन एवं विश्लेषण करना है।

बृहस्‍पति की पत्‍नी का नाम है जूनो 

ग्रीक और रोमन मायथोलॉजी में ज्‍यूपिटर यानी बृहस्‍पति की पत्‍नी का नाम जूनो है। मान्‍यता है कि वह बादलों के जरिये अपने शरारती पति पर नजर रखती थीं। जूनो भी यही काम करेगा। वह भी बादलों के पीछे से बृहस्पति पर नजर रखेगा। माइक्रोवेस रेडियोमीटर का प्रयोग करते हुए जूनो ग्रह के गहरी वायुमंडलीय बनावट, तापमान आदि का पता करेगा।

सबसे पुराने माने जाने वाले ग्रह बृहस्पति का द्रव्यमान पृथ्वी की तुलना में 300 गुना अधिक है। इस अभियान से शुरुआती सौर तंत्र के विषय में जानकारी मिल सकती है। अभियान के दौरान बृहस्‍पति के वातावरण में जल की उपस्थिति का पता लगाने की कोशिश भी की जाएगी।

करीब साढ़े तीन टन वजनी जूनो अंतरिक्ष यान टेनिस कोर्ट के आकार का है। जूनो के सामने सबसे बड़ी चुनौती बृहस्पति ग्रह के भयानक बादलों को घेरे हुए इसके विकिरण बेल्ट में सही दशा-दिशा में बने रहने की है।

इन बातों का पता लगाएगा जूनो 

  • बृहस्‍पति के बाद अन्‍य ग्रहों का निर्माण कैसे हुआ। सूर्य से अलग होकर ग्रह बनने का प्रतिनिधित्‍व बृहस्‍पति करता है। 
  • पिछले 300 सालों से बृहस्‍पति पर रेड-ऑरेंज निशान उसकी खूबसूरती बढ़ रहे हैं। मगर, वैज्ञानिक नहीं जानते हैं‍ कि वे कैसे बने। 
  • बृहस्‍पति का मौसम कैसा है, वहां पानी और ऑक्‍सीजन की उपस्थिति है या नहीं। 
  • ग्रह के शक्‍ितशाली चुंबकीयक्षेत्र में जूने कैसे बना रहता है। 

बृहस्पति ग्रह के बारे में

इस ग्रह का औसतन तापमान -145 डिग्री सेल्सियस रहता है। इसको सूर्य की परिक्रमा करने में 12 साल का समय लगता है। इसके चार बड़े और 60 छोटे आकार के चंद्रमा हैं। यह पृथ्वी की तुलना में 11 गुना अधिक बड़ा है। इसका चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी की तुलना में 20 हजार गुना अधिक शक्तिशाली है।

Thursday, January 7, 2016

उत्‍तर कोरिया के परीक्षण के बाद क्‍यों है दुनियाभर में चिंता

शशांक शेखर बाजपेई। 
हाइड्रोन बम का परीक्षण कर लेने के उत्तर कोरिया दावे के बाद दुनियाभर में राजनीतिक परिदृश्‍य बदल गया है। शक्‍ित संतुलन के  लिए उत्‍तर कोरिया के इस कदम ने भारत के अलावा, दक्षिण कोरिया, जापान, अमेरिका, चीन सहित कई देशों को चिंता में डाल  दिया है। यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र ने भी इसकी निंदा की। उत्तर कोरिया ने इससे पहले वर्ष 2013 में परमाणु परीक्षण किया था।

भारत की चिंता 

उत्‍तर कोरिया के इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए भारत ने इसे गहन चिंता का विषय बताते हुए पूर्वोत्तर एशिया तथा अपने पड़ोस के बीच परमाणु प्रसार संबंधों को लेक
र भी चिंता जताई। जाहिर तौर पर पड़ोस से आशय पाकिस्तान से है। भारत ने डेमोक्रेटिक पीपल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया (डीपीआरके) से इस तरह की कार्रवाइयों से बचने का आग्रह किया, जिनसे क्षेत्र में शांति और स्थिरता पर प्रतिकूल असर पड़ता हो।

दरअसल, खबर है कि उत्तर कोरिया ने परमाणु हथियारों के लिहाज से उच्च संवर्धित यूरेनियम के लिए जरूरी गैस सेंट्रीफ्यूजिस और अधिकतर मशीनरी के लिए कई डिजाइनें पाकिस्तान से प्राप्त की हैं, जिसके बदले में उत्तर कोरिया ने उसे बैलिस्टिक मिसाइलों के कलपुर्जे दिए हैं। निश्‍िचत रूप से यह भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

दक्षिण कोरिया की चिंता

दक्षिण कोरिया इस बीच अमेरिका के साथ चर्चा कर रहा है कि वह अपने यूएस स्‍ट्रेटजिक असेस्‍ट्स को कोरियाई प्रायद्वीप में तैनात करे। इस बीच उसने अलग-थलग पड़े देश पर प्रतिबंध और कड़े करने की मांग भी की। इसके अलावा अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने दक्षिण कोरिया की राष्‍ट्रपति पार्क गुनहे के साथ अन्‍य विकल्‍पों पर भी चर्चा की।

चीन की नाराजगी 

उत्‍तर कोरिया की ओर से गोपनीय तरीके से किए गए इस धमाके के बाद चीन उससे खासा नाराज हो गया है। कारण, उत्‍तर कोरिया ने अपने अहम सहयोगी को विस्‍फोट के बारे में पहले से जानकारी नहीं दी थी। ऐसे में इन दो देशों के बीच संबंधों में काफी तनाव नजर आ रहा है। हालांकि, अतीत में दोनों देशों के बीच मधुर संबंध रहे हैं। चीन की प्रमुख चिंता सीमा पर अस्थिरता की है।

जापान भी हुआ सतर्क 

उत्‍तर कोरिया के इस परीक्षण के बाद जापान भी सतर्क हो गया है। उसे इस परीक्षण के बाद अपने देश की सुरक्षा खतरे में दिख रही है। व्‍हाइट हाउस ने कहा कि जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने राष्‍ट्रपति बराक ओबामा के साथ फोन पर हुई चर्चा में सहमति जताई कि इस मामले में कड़ी वैश्‍िवक प्रतिक्रिया की जरूरत है।

अमेरिका का चिंता 

उत्‍तर कोरिया को चीन का करीबी माना जाता है। वहीं, दक्षिण कोरिया को अमेरिका का समर्थक माना जाता है। अमेरिका नहीं चाहता है कि अब कोई भी देश परमाणु हथियारों का परीक्षण करे। इससे क्षेत्र में शक्‍ित संतुलन बिगड़ेगा। इसके अलावा यदि उत्‍तर कोरिया के इस कदम का विरोध नहीं किया गया, तो डर है कि ईरान भी अपने परमाणु परीक्षण को जल्‍दबाजी दिखाते हुए अमेरिकी कूट नीति और दुनिया के देशों के दबाव को धता बता देगा।