बीजिंग। दक्षिण चीन सागर पर अधिकार को लेकर इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल (हेग ट्रिब्यूनल) ने मंगलवार को अपने आदेश में कहा कि दक्षिण चीन सागर पर चीन का कोई ऐतिहासिक अधिकार नहीं है। हालांकि, चीन ने इस फैसले को खारिज कर दिया है।
चीन ने कहा कि हम हेग ट्रिब्यूनल के फैसले को स्वीकार नहीं करते और न ही मान्यता देते। ट्रिब्यूनल ने यह फैसला, फिलीपींस की उस याचिका पर सुनाया जिसमें दक्षिण चीन सागर के ज्यादातर हिस्से पर चीन के दावे को चुनौती दी थी। जानते हैं दक्षिणी चीन सागर या साउथ चाइना सी को लेकर क्या है पूरा मामला...
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में क्यों गया मामला
फिलीपींस ने 2013 में इंटरनेशनल कोर्ट में चीन के खिलाफ केस दायर किया था। फिलीपींस का दावा है कि बीते 69 साल से चीन का साउथ चाइना सी के 90 फीसद हिस्से पर कब्जा कर लिया है। उसने वहां न केवल कृत्रिम द्वीप बनाकर बड़ी तादाद में सेना भी तैनात की है।
क्यों अहम है यह इलाका
साउथ चाइना सी, प्रशांत महासागर का एक हिस्सा है, जो सिंगापुर और मलक्का जलडमरू से लेकर ताइवान जलडमरू तक 35 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। चीन के दक्षिण से ताइवान द्वीप तक और मलयेशिया के उत्तर पश्चिम से ब्रुनेई तक, इंडोनेशिया के उत्तर में, मलयेशिया और सिंगापुर के उत्तर-पूर्व में और वियतनाम के पूर्व में स्थित है यह समुद्री इलाका है।
आर्थिक महत्व को लेकर विवाद
करीब आधे व्यापारिक जहाज इसी इलाके से गुजरते हैं, जिसके जरिये करीब 3.4 ट्रिलियन पाउंड का व्यापार होता है। इसके अलावा साउथ चाइना सी में विशाल तेल और गैस के भंडार होने की जानकारी है। अमेरिका के मुताबिक, 213 अरब बैरल तेल यहां मौजूद है। 900 ट्रिलियन क्यूबिक फीट नेचुरल गैस का भंडार है। ऐसे में स्प्रातली द्वीप समूह के द्वीपों को लेकर चीन, वियतनाम, मलयेशिया, फिलीपींस और ब्रुनेई के बीच विवाद चल रहा है।
पारासेल द्वीपसमूह पर 1974 तक चीन और वियतनाम का कब्जा था। 1974 में दक्षिण वियतनाम और चीन के बीच झड़प के बाद वियतनाम के 14 सैनिक मारे गए और चीन ने इस पूरे द्वीपसमूह पर अपना कब्जा जमा लिया। उधर, चीनी राष्ट्रपति पहले ही साफ कर चुके हैं कि वे देश हित में इस इलाके में अपने दावे से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
भारत का है यह कहना
दक्षिण चीन सागर में चीन की तानाशाही को अमेरिका के बाद भारत ने भी चुनौती दी है। भारत ने चेतावनी देते हुए कहा है कि हम भी दक्षिण चीन सागर में अपना जहाज भेजने या उसके ऊपर उड़ान भरने को आजाद हैं। वह इलाका फ्रीडम ऑफ नेविगेशन के दायरे में आता है। अगर इस इलाके पर विवाद है, तो उसका हल इंटरनेशनल कानून के दायरे में किया जाए।

भारतीय अधिकारियों के अनुसार, हाल में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की फिलीपींस के फॉरेन मिनिस्टर अल्बर्ट एफ डे रोसारियो से मीटिंग हुई। भारत ने फिलीपींस ने वादा किया कि वह दक्षिण चीन सागर को पश्चिम फिलीपींस सागर के नाम से बुलाएगा। इसका नाम का इस्तेमाल दोनों लीडर्स ने अपने जॉइंट स्टेटमेंट में भी किया था। भारत ने दक्षिण चीन सागर के 90 फीसदी हिस्से पर चीन के दावे को खारिज किया है।
क्या है फ्रीडम ऑफ नेविगेशन
अंतरराष्ट्रीय समुद्र कानून देशों को उनकी समुद्री सीमा से 12 समुद्री मील तक के क्षेत्र में अधिकार देता है। उसके बाहर का जल क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सीमा माना जाता है। कोई भी देश इस सीमा के बाहर किसी क्षेत्र पर दावा नहीं कर सकता।
भारत की इस क्षेत्र में रुचि
वियतनाम सरकार ने भारत सरकार की तेल और गैस कंपनी ओएनजीसी के साथ एक समझौता किया था। इसके अनुसार ओएनजीसी वियतनाम के छोटे द्वीपों में तेल और गैस की खोज करेगी। चीन ने इस पर कड़ा विरोध जताया था, जबकि भारत ने कहा था कि दक्षिण चीन सागर पूरी दुनिया की संपत्ति है।
अमेरिका भी इस मामले में चीन की खुली आलोचना करता है। अमेरिका का कहना है कि कई देशों के पास ऐसे मानचित्र हैं, जिनसे पता चलता है कि पिछले कई सौ सालों से भारत, अरब और मलय के व्यापारी दक्षिण चीन सागर में अपने समुद्री जहाजों को ले जाते थे और इसी समुद्र के माध्यम से व्यापार करते थे।
तेल, प्राकृतिक गैस और समुद्री मार्ग पर चीन की नजर
1970 में वियतनाम और कई देशों ने यह पता लगाया कि यहां पर तेल और गैस के अपार भंडार हैं। इसके बाद इन देशों ने इस क्षेत्र में तेल और गैस की खोज शुरू कर दी। इसके बाद से चीन ने यहां कब्जा करने और यहां मौजूद संसाधनों के दोहन पर रोक लगाने के प्रयास तेज कर दिए।
यहां 900 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस के भंडार मौजूद हैं। यह आंकड़ा कतर में मौजूद भंडार के बराबर है। यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन ऐडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक क्षेत्र की असली संपत्ति यहां मौजूद प्राकृतिक गैस के भंडार हैं। शिपिंग लेन्स के कारण भी यह इलाका काफी महत्वपूर्ण है।
अन्य देशों की क्या है राय
दुनिया के देश चीन या अमेरिका के साथ अपने संबंधों के आधार पर इस मसले पर अपनी स्थिति साफ कर रहे हैं। मगर, छोटे देश और क्षेत्रीय ब्लॉक्स इस रणनीतिक रस्साकसी को लेकर संशय में हैं। दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों के एसोसिएशन में शामिल देश भी संशय में हैं क्योंकि उसके चार सदस्य देश भी इस हिस्से में अपनी दावेदारी जता रहे हैं।
फिलीपीन्स ने 10 देशों के ब्लॉक पर दबाव बनाया है कि वे संयुक्त रूप से चीन से कहें कि वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले का स्वागत करे। वहीं, कंबोडिया और लाओस चीन की स्थिति का समर्थन कर रहे हैं।
फिलीपीन्स और वियतनाम के अलावा मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर ने भी चीन को सावधान किया है। अमेरिका, ब्रिटेन ओर बाकी यूरोपियन यूनियन मध्यस्थता का समर्थन करते हैं। वहीं, चीन का दावा है कि उसे करीब 40 से 60 देशों का समर्थन हासिल है। इनमें कई भू-आच्छादित अफ्रीकी देश और प्रशांत महासागर के द्वीप शामिल हैं, जहां बीजिंग आर्थिक शक्ित है।
facts you wants to know about south china sea dispute
चीन ने कहा कि हम हेग ट्रिब्यूनल के फैसले को स्वीकार नहीं करते और न ही मान्यता देते। ट्रिब्यूनल ने यह फैसला, फिलीपींस की उस याचिका पर सुनाया जिसमें दक्षिण चीन सागर के ज्यादातर हिस्से पर चीन के दावे को चुनौती दी थी। जानते हैं दक्षिणी चीन सागर या साउथ चाइना सी को लेकर क्या है पूरा मामला...
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में क्यों गया मामला
फिलीपींस ने 2013 में इंटरनेशनल कोर्ट में चीन के खिलाफ केस दायर किया था। फिलीपींस का दावा है कि बीते 69 साल से चीन का साउथ चाइना सी के 90 फीसद हिस्से पर कब्जा कर लिया है। उसने वहां न केवल कृत्रिम द्वीप बनाकर बड़ी तादाद में सेना भी तैनात की है।
क्यों अहम है यह इलाका
साउथ चाइना सी, प्रशांत महासागर का एक हिस्सा है, जो सिंगापुर और मलक्का जलडमरू से लेकर ताइवान जलडमरू तक 35 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। चीन के दक्षिण से ताइवान द्वीप तक और मलयेशिया के उत्तर पश्चिम से ब्रुनेई तक, इंडोनेशिया के उत्तर में, मलयेशिया और सिंगापुर के उत्तर-पूर्व में और वियतनाम के पूर्व में स्थित है यह समुद्री इलाका है।
आर्थिक महत्व को लेकर विवाद
करीब आधे व्यापारिक जहाज इसी इलाके से गुजरते हैं, जिसके जरिये करीब 3.4 ट्रिलियन पाउंड का व्यापार होता है। इसके अलावा साउथ चाइना सी में विशाल तेल और गैस के भंडार होने की जानकारी है। अमेरिका के मुताबिक, 213 अरब बैरल तेल यहां मौजूद है। 900 ट्रिलियन क्यूबिक फीट नेचुरल गैस का भंडार है। ऐसे में स्प्रातली द्वीप समूह के द्वीपों को लेकर चीन, वियतनाम, मलयेशिया, फिलीपींस और ब्रुनेई के बीच विवाद चल रहा है।
पारासेल द्वीपसमूह पर 1974 तक चीन और वियतनाम का कब्जा था। 1974 में दक्षिण वियतनाम और चीन के बीच झड़प के बाद वियतनाम के 14 सैनिक मारे गए और चीन ने इस पूरे द्वीपसमूह पर अपना कब्जा जमा लिया। उधर, चीनी राष्ट्रपति पहले ही साफ कर चुके हैं कि वे देश हित में इस इलाके में अपने दावे से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
भारत का है यह कहना
दक्षिण चीन सागर में चीन की तानाशाही को अमेरिका के बाद भारत ने भी चुनौती दी है। भारत ने चेतावनी देते हुए कहा है कि हम भी दक्षिण चीन सागर में अपना जहाज भेजने या उसके ऊपर उड़ान भरने को आजाद हैं। वह इलाका फ्रीडम ऑफ नेविगेशन के दायरे में आता है। अगर इस इलाके पर विवाद है, तो उसका हल इंटरनेशनल कानून के दायरे में किया जाए।

भारतीय अधिकारियों के अनुसार, हाल में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की फिलीपींस के फॉरेन मिनिस्टर अल्बर्ट एफ डे रोसारियो से मीटिंग हुई। भारत ने फिलीपींस ने वादा किया कि वह दक्षिण चीन सागर को पश्चिम फिलीपींस सागर के नाम से बुलाएगा। इसका नाम का इस्तेमाल दोनों लीडर्स ने अपने जॉइंट स्टेटमेंट में भी किया था। भारत ने दक्षिण चीन सागर के 90 फीसदी हिस्से पर चीन के दावे को खारिज किया है।
क्या है फ्रीडम ऑफ नेविगेशन
अंतरराष्ट्रीय समुद्र कानून देशों को उनकी समुद्री सीमा से 12 समुद्री मील तक के क्षेत्र में अधिकार देता है। उसके बाहर का जल क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सीमा माना जाता है। कोई भी देश इस सीमा के बाहर किसी क्षेत्र पर दावा नहीं कर सकता।
भारत की इस क्षेत्र में रुचि
वियतनाम सरकार ने भारत सरकार की तेल और गैस कंपनी ओएनजीसी के साथ एक समझौता किया था। इसके अनुसार ओएनजीसी वियतनाम के छोटे द्वीपों में तेल और गैस की खोज करेगी। चीन ने इस पर कड़ा विरोध जताया था, जबकि भारत ने कहा था कि दक्षिण चीन सागर पूरी दुनिया की संपत्ति है।
अमेरिका भी इस मामले में चीन की खुली आलोचना करता है। अमेरिका का कहना है कि कई देशों के पास ऐसे मानचित्र हैं, जिनसे पता चलता है कि पिछले कई सौ सालों से भारत, अरब और मलय के व्यापारी दक्षिण चीन सागर में अपने समुद्री जहाजों को ले जाते थे और इसी समुद्र के माध्यम से व्यापार करते थे।
तेल, प्राकृतिक गैस और समुद्री मार्ग पर चीन की नजर
1970 में वियतनाम और कई देशों ने यह पता लगाया कि यहां पर तेल और गैस के अपार भंडार हैं। इसके बाद इन देशों ने इस क्षेत्र में तेल और गैस की खोज शुरू कर दी। इसके बाद से चीन ने यहां कब्जा करने और यहां मौजूद संसाधनों के दोहन पर रोक लगाने के प्रयास तेज कर दिए।
यहां 900 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस के भंडार मौजूद हैं। यह आंकड़ा कतर में मौजूद भंडार के बराबर है। यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन ऐडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक क्षेत्र की असली संपत्ति यहां मौजूद प्राकृतिक गैस के भंडार हैं। शिपिंग लेन्स के कारण भी यह इलाका काफी महत्वपूर्ण है।
अन्य देशों की क्या है राय
दुनिया के देश चीन या अमेरिका के साथ अपने संबंधों के आधार पर इस मसले पर अपनी स्थिति साफ कर रहे हैं। मगर, छोटे देश और क्षेत्रीय ब्लॉक्स इस रणनीतिक रस्साकसी को लेकर संशय में हैं। दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों के एसोसिएशन में शामिल देश भी संशय में हैं क्योंकि उसके चार सदस्य देश भी इस हिस्से में अपनी दावेदारी जता रहे हैं।
फिलीपीन्स ने 10 देशों के ब्लॉक पर दबाव बनाया है कि वे संयुक्त रूप से चीन से कहें कि वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले का स्वागत करे। वहीं, कंबोडिया और लाओस चीन की स्थिति का समर्थन कर रहे हैं।
फिलीपीन्स और वियतनाम के अलावा मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर ने भी चीन को सावधान किया है। अमेरिका, ब्रिटेन ओर बाकी यूरोपियन यूनियन मध्यस्थता का समर्थन करते हैं। वहीं, चीन का दावा है कि उसे करीब 40 से 60 देशों का समर्थन हासिल है। इनमें कई भू-आच्छादित अफ्रीकी देश और प्रशांत महासागर के द्वीप शामिल हैं, जहां बीजिंग आर्थिक शक्ित है।
facts you wants to know about south china sea dispute

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