Thursday, July 21, 2016

उदारीकरण के बाद संभावित सुपरपावर बनने की दिशा में ऐसे बढ़ा भारत

Liberalization in India 
 शशांक शेखर बाजपेई। वर्ष 1991 में भारत को उदारीकरण के लिए अपने दरवाजे खोलने पड़े थे। दरअसल, उस वक्‍त देश के पास एक हफ्ते के निर्यात के बराबर ही विदेशी मुद्रा बची थी। भारत दिवालियेपन की कगार पर पहुंच चुका था। भारत को विदेशी मुद्रा की सख्‍त जरूरत थी।

ऐसे में विश्‍व शक्‍ितयों के दबाव में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्‍िवककरण की दिशा में कदम बढ़ाए। लाइसेंसी राज को खत्‍म किया गया और सरकार ने उद्योगों से हाथ खींचकर नियामक की भूमिका में आ गई। इस साल आर्थिक सुधारों के 25 वर्ष इस साल पूरे हो गए।

मनमोहन सिंह ने बनाया उदारीकरण का खाका 

इस काम के लिए नरसिंह राव प्रख्यात अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को अपनी कैबिनेट में वित्त मंत्री बनाकर ले आए जिस पर कई लोगों को हैरानी हुई। मगर, मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था को उबारने के साथ ही उदारीकरण की राह प्रशस्त की और भारतीय बाजार को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया।

यही वजह है कि डॉक्टर मनमोहन सिंह को भारत में आर्थिक उदारीकरण का जनक माना जाता है। इसके पहले तक भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

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उदारीकरण के पहले देश की जीडीपी दर एक फीसद थी। जुलाई 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव द्वारा लागू आर्थिक सुधारों के कारण आज भारत परचेजिंग पावर पैरिटी के मामले में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है।

सुपरपावर बनने की राह पर भारत 

Shashank Shekhar Bajpai
अब सिर्फ चीन और अमेरिका ही भारत से बड़ी अर्थव्यवस्था है। हम सभी यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं और जापान से आगे निकल चुके हैं। वर्ष 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए कोई मायने नहीं रखती थी। मगर, वर्तमान में 7.6 प्रतिशत की विकास दर को छूते हुए भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है।

यही वजह है कि आज भारत को संभावित सुपरपावर के रूप में देखा जा रहा है। भारत को एकमात्र एशियाई शक्ति के रूप में देखा जा रहा है जो 21वीं सदी में चीन को टक्कर दे सकता है। यही वजह है कि अमेरिका ने न्यूक्लियर क्लब में भारत की एंट्री की व्यवस्था की और अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर रहा है।

उदारीकरण में इन बिंदुओं को अपनाया गया

उदारीकरण के बाद भारत की नीतियों में अहम बदलाव आए। इसके तहत इन योजनाओं पर काम किया गया...
  • विदेशी प्रौद्योगिकी समझौतों
  • विदेशी निवेश
  • एमआरटीपी अधिनियम, 1969 (संशोधित)
  • औद्योगिक लाइसेंसिंग ढील
  • निजीकरण की शुरुआत
  • विदेशी व्यापार के लिए अवसर
  • मुद्रास्फीति को विनियमित करने के लिए कदम कर सुधारों
  • लाइसेंसराज को खत्‍म किया गया 
1991 में लैंडलाइन फोन के करीब 50 लाख कनेक्‍शन हुआ करते थे मगर, आज देश में 104 करोड़ से अधिक लोगों के हाथ में मोबाइल फोन हैं। 1991 में करीब 20 फीसद भारतीयों के पास टीवी सेट्स थे और दूरदर्शन का बोलबाला था। आज देश में 800 से अधिक टीवी चैनल्स हैं। रेडियो में आकाशवाणी की जगह पर 24 घंटे चलने वाले 45 एफएम रेडियो स्टेशन खुल गए हैं।

सूचना क्रांति ने बदल दी दिशा 

जब कंप्‍यूटर को देश में लाया गया, तो कई लोगों की नौकरी इसलिए चली गई क्‍योंकि कई लोगों का काम एक अकेला कंप्‍यूटर कर सकता था। मगर, बाद में यही लोगों के रोजगार का नया जरिया बना।

ई-मेल, वेबसाइट, ऐप्‍स, फेसबुक, वॉट्सऐप, ट्विटर ने सोशल मीडिया को बदल दिया। करीब 24 करोड़ सक्रिय हैं।

बैंकिंग सेक्‍टर में आया बदलाव 

बैंकिंग सेक्‍टर में भी जबरदस्‍त बदलाव आया। आज हर काम के लिए बैंक जाने की जरूरत ही नहीं रही। बैंक से पैसा निकालने के लिए लाइन में लगने की जरूरत खत्‍म हो गई।

साल 1987 में मुंबई में HSBC बैंक ने पहला एटीएम लगाया, जबकि नवंबर 2015 तक करीब दो लाख एटीएम का इस्तेमाल हो रहा है। सबसे ज्‍यादा एटीएम के मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बाजी मारी है।

अब देश की अर्थव्‍यवस्‍था बचत से लोन की ओर मुड़ गई है। छोटे-छोटे रोजमर्रा के उपयोग की खरीदारी के लिए बैंकों ने लोगों को क्रेडिट कार्ड देना शुरू किया। वर्तमान में 2.07 करोड़ से अधिक लोग क्रेडिट कार्ड का प्रयोग कर रहे हैं।

Liberalization makes india possible Super Power from bankruptcy 

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