Monday, August 30, 2010

अमेरिका की आर्थिक मंदी का, नहीं होगा भारत पर असर

अमेरिकी अर्थव्यवस्था की विकास दर इस बार उम्मीद से कहीं कम कम होने के कारण फिर विश्वभर में आर्थिक संकट का डर पैदा हो गया है। अमेरिका में जारी ताजे आंकड़े बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था की विकास दर 2.4 प्रतिशत से घट कर 1.6 प्रतिशत हो गई है। दो साल पहले आए आर्थिक संकट से अभी अमेरिका उबर ही रहा था कि इन आंकड़ों ने अमेरिकियों के सामने एक बार फिर से मंदी के बादल ला दिए हैं। अमेरिका अब दूसरे आर्थिक संकट के दरवाजे पर खड़ा दिख रहा है। अमेरिकी प्रशासन ने बैंकों और दूसरी वित्तीय संस्थाओं को अरबों डॉलर की मदद दी थी, जो कि आर्थिक संकट से उबरने में मददगार साबित भी हुई थी। इसके परिणामस्वरूप विकास की दर बढऩे लगी थी और सरकार ने कर्ज देना बंद कर दिया था। मगर, यह खुशी कुछ ही महीनों में काफूर होती नजर आ रही है, क्योंकि वास्तव में अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी तक अपने पैरों में खड़ी नहीं हुई है। हालांकि, ब्रिटेन और जर्मनी में आर्थिक विकास की दर से उत्साह देखने को मिलता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है की अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था संकट में पड़ी तो इसका प्रभाव विश्वभर में एक बार फिर देखने को मिलेगा।
देना होगा कर्ज
इस ताजा स्थिति से जूझाने के लिए अमेरिकी प्रशासन एक बार फिर निजी वित्तीय संस्थाओं को भारी कर्ज देने की योजना बना रहा है। इसके लिए इसे एक खरब डॉलर की जरूरत हो सकती है। अगर जरूरत पड़ी तो निजी संस्थाओं को और कर्ज दिए जाएंगे ताकि अमेरिका की आर्थिक स्थिति मजबूत हो। अमेरिकी केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष बेन बर्नानके ने हाल ही में यह घोषणा की कि अगर जरूरत पड़ी तो निजी संस्थाओं को और कर्ज दिए जाएंगे ताकि अमेरिका की आर्थिक स्थिति मजबूत हो। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज देने की योजना बनाने के अलावा प्रशासन और कुछ कर भी नहीं सकता।
कोई इलाज नहीं
जरूरी नहीं है कि कर्ज देने से अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाए। मगर, इसके अलावा केंद्रीय बैंक के पास और कोई चारा भी नहीं है। बर्नानके भी मानते हैं कि हो सकता है कि इससे फायदा नहीं हो, लेकिन फिर भी वे कर्ज देकर अर्थव्यवस्था को सही करने के लिए इसकी कोशिश तो कर ही सकते हैं। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक यह कदम उठाने जा रहा है और इसके साथ ही अब देखना यह है की अगले कुछ सप्ताह में कौन-सी कंपनियां और कौन से बैंक या दूसरी वित्तीय संस्थाएं आर्थिक संकट का शिकार होती हैं। इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि अमेरिकी प्रशासन उनकी मदद किस तरह से कर सकता है।
विकास का अर्थ
आर्थिक विकास का मतलब प्रति व्यक्ति जीडीपी में बढ़ोतरी होना या कुल आय के अन्य पैमानों में बढ़ोतरी होना होता है। यह अक्सर सकल घरेलू उत्पाद में परिवर्तन की दर के रूप में मापा जाता है। आर्थिक विकास केवल माल और सेवाओं की मात्रा को दर्शाता है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही हो सकते है। आर्थिक विकास अगर नकारात्मक है तो इसका मतलब है कि उस देश की अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है। नकारात्मक वृद्धि से अर्थव्यवस्था में मंदी का संकेत मिलता है।
भारत, चीन पर नहीं पड़ेगा असर
भारत में मध्यमवर्गीय परिवारों की संख्या और उनकी आय में बढ़ोतरी होने से सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है। पहले के दशकों में सभी देश अमेरिका पर निर्भर रहते थे। अमेरिका को छींक आती है तो पूरे विश्व को सर्दी हो जाती थी। मगर, अब ऐसा नहीं है। भारत और चीन जैसे देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को इतना मजबूत कर लिया है कि अब इन देशों पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। पिछली विश्वव्यापी मंदी में यह बात साबित भी हो चुकी है। अमेरिकी मंदी के चलते बाकी देश अन्य पश्चिमी देश और विशेषकर भारत व चीन पर नजरें टिकाए हैं। आज भारत चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। यदि देश में जनसंख्या नियंत्रण के साथ ही सरकारी महकमों में लालफीताशाही और भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाए तो भारत का २०२० में विकसित देश बनने का सपना पूरा हो सकता है। वर्तमान में देश में मांग काफी अधिक है और उसकी आपूर्ति के लिए उत्पादन लगातार होने से देश की अर्थव्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
आर्थिक वृद्धि के सकारात्मक प्रभाव

आय का वितरण
विश्व बैंक का तर्क है कि दुनियाभर में वैश्विक गरीबी की दर में तेजी से कमी आ रही है। जिन देशों में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार खराब है उन देशों में गरीबी में कमी की दर काफी कम होती है।
जीवन की गुणवत्ता
प्रति व्यक्ति जीडीपी में तेजी लोगों में खुशी लाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोगों के पास अपनी सुख-सुविधाओं की चीजें खरीदने के लिए धन अधिक होता है। लोग मूलभूत जरूरतों से हटकर अधिक से अधिक वस्तुओं का उपभोग करना शुरू करते हैं, जो कि उनकी जीवन की गुणवत्ता को बेहतर करता है।
कम खर्च में अधिक लाभ
संसाधनों में कमी के लिए पूर्व में किए गए कई दावे झाूठे साबित हो रहे हैं। इसका कारण यह है कि तकनीक और विज्ञान में आधुनिकता से लगातार पहले अनुपलब्ध संसाधनों को काफी कम खर्च में उपयोग में लाया जा रहा है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आर्थिक विकास की दर नई तकनीकों और क्षमताओं पर टिकी है।

विकास दर कम होने के कई कारण हैं
प्रेस्टीजियस इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च सेंटर, इंदौर के एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ। नितिन तांतेड़ के अनुसार दो सालों से पूरा विश्व आर्थिक मंदी से जूझा रहा था, यह असर अमेरिका में आई आर्थिक मंदी के कारण था। डॉ. नितिन तांतेड़ का कहना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा कई बड़े आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज देने के बाद भी अमेरिका अभी तक पूरी तरह आर्थिक मंदी से नहीं उबर पाया है। ताजा आंकड़े और चिंताजनक हैं क्योंकि आर्थिक विकास में इस तरह की गिरावट इस बात का संकेत है कि फिर से अमेरिका में आर्थिक संकट आ सकता है। नितिन का कहना है कि इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि अमेरिका में बैंक कर्ज कम दे रहे हैं और लोग खरीदारी भी कम कर रहे हैं। अभी भी अमेरिका में लोगों के पास खरीदारी करने के लिए ज्यादा धन नहीं है यानी लोगों की क्रय शक्ति कम हो गई है। इसके चलते उत्पादन में भी कमी आई है। विभिन्न कंपनियां उत्पादन कम कर रही हैं, क्योंकि उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं के लिए उपभोक्ता नहीं हैं। धन नहीं होने के कारण उत्पाद और सेवाओं की मांग में भारी कमी आई है। नितिन कहते हैं कि यह एक चक्र की तरह चलता है। जब लोग खरीदारी कम करते हैं तो कंपनी अपने उत्पादन को कम कर देती है और जब उत्पादन कम होता है तो कंपनियां अपने कर्मचारियों को कम धन देती हैं और नौकरी में भी कटौती करती हैं, जिससे बेरोजगारी बढ़ती है। बेरोजगारी बढऩे से लोगों के पास धन की भी कमी होती है, जिसका सीधा असर लोगों की क्रय शक्ति पर पड़ता है। इन्हीं बातों का असर देश की जीडीपी पर पड़ता है, जिससे अर्थव्यवस्था की विकास दर प्रभावित होती है। इसके अलावा अमेरिका की अर्थव्यवस्था के विकास में निर्माण क्षेत्र का भी बहुत बड़ा योगदान रहता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से आर्थिक मंदी के चलते नए मकान, कॉम्प्लेक्स, मेगा मार्ट आदि नहीं बन पा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप वहां की सीमेंट इंडस्ट्री, स्टील इंडस्ट्री आदि सबका व्यवसाय कम हो गया है। पूरे अमेरिका में निर्माण क्षेत्र में काम ठप पड़ा है, जिसका सीधा असर वहां की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
शशांक शेखर बाजपाई 09977818811

तबाही मचाएगा सोलर स्टॉर्म!

तबाही मचाएगा सोलर स्टॉर्म!
खगोलशास्त्रियों का अनुमान है कि एक बड़े सोलर स्टॉर्म (तूफान) से पैदा होने वाली बिजली की चमक इस महीने पृथ्वी से देखी जा सकेगी। यह तूफान १० करोड़ हाइड्रोजन बम की शक्ति से हमारे ग्रह पर २०१२ में हमला करेगा। अमेरिकी मीडिया में नासा की ओर से जारी चेतावनी में बताया गया है कि इस महीने दिखाई देने वाली बिजली की चमक बड़े पैमाने पर आने वाले सोलर स्टॉर्म के बनने की पूर्व सूचना है, जो हमारे ग्रह के पूरे पॉवर ग्रिड को बर्बाद कर देगा। इसके साथ ही संचार उपकरणों और उपग्रहों पर भी स्ट्रॉम का विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
नासा इस तूफान पर २००६ से नजर रख रहा है। हालांकि समय-समय पर ऐसी किसी भी घटना के न होने की घोषणा की जाती रही है। इधर, अमेरिका की ओर से मिली रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सोलर स्टॉर्म आने की तारीख हॉलीवुड फिल्मों में धरती के समाप्त होने का जो वर्ष बताया है उससे मिलती है, जो कि २०१२ है।
पहले भी मचा चुका है तबाही
इसी तरह का तूफान १८५९ और १९२१ में दुनियाभर में आया था, जिसने काफी तबाही मचाई थी। सोलर स्टॉर्म की वजह से टेलीग्राफ के तारों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा था। दक्षिण अफ्रीका में २००३ में आए ऐसे ही तूफान से देश के ज्यादातर हिस्सों में कई महीनों तक बिजली नहीं आई थी। २०१२ में आने वाले तूफान के इससे काफी अधिक विनाशकारी होने की संभावना है, क्योंकि आज टेक्नोलॉजी काफी आधुनिक है और समाज इस पर काफी हद तक निर्भर हो गया है। ऐसे में सोलर स्टॉर्म से भारी तबाही होने की आशंका जताई जा रही है।
खतरनाक होंगे इसके परिणाम
खगोल विज्ञान के लेक्चरर और स्तंभकार डेव रीनीकी कहते हैं, 'आम सौर खगोलशास्त्री इस बात से सहमत हैं कि आने वाला सौर तूफान पिछले १०० वर्षों में सबसे हिंसक तूफान होगा।' उन्होंने बताया कि यह सोलर स्टॉर्म आधुनिक जीपीएस प्रणाली से काम करने वाली हर चीज, जैसे संचार के साधनों, एयरलाइंस कंपनीज सभी को बुरी तरह से प्रभावित करेगा। वह सर्किट को ट्रिप कर देगा और कक्षाओं में चक्कर लगा रहे उपग्रहों को बेकार कर देगा।
रीनीकी ने कहा कि वास्तव में यह कोई नहीं बता सकता कि २०१२-१३ में सोलर मैक्स आज की डिजिटल निर्भर सोसाइटी पर क्या प्रभाव डालेगा? नासा में हीलियो फिजिक्स शाखा के निदेशक डॉ. रिचर्ड फिशर ने बताया कि सुपर स्टॉर्म बिजली की गाज के रूप में गिरेगा। अगर सावधानी नहीं बरती गई तो इससे विश्व स्वास्थ्य, आपातकालीन सेवाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। नासा ने कहा कि नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस की रिपोर्ट में सामने आया है कि अगर यह तूफान आज की तारीख में आता है तो इससे दुनिया के हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर को लगभग दो लाख करोड़ डॉलर का नुकसान होगा। जानकारों का मानना है कि इससे होने वाली क्षति की पूर्ति में चार से १० वर्ष का समय लग जाएगा। वैज्ञानिकों की चिंता का कारण सूर्य के उस चरण में जाना है, जिसे सोलर साइकिल २४ कहते हैं। इस दौरान सूर्य में धमाके के साथ निकलने वाली ऊर्जा १० करोड़ हाइड्रोजन बम के बराबर होगी। फिशर कहते हैं कि हम जानते हैं यह तूफान आ रहा है, लेकिन यह नहीं जानते हैं कि यह कितना खराब होगा।
इसे रोक नहीं सकते हैं वैज्ञानिक
इस सोलर स्टॉर्म को रोकना फिलहाल संभव नहीं लग रहा है, लेकिन वैज्ञानिक उपग्रहों और पावर ग्रिड को सेफ मोड में रख सकते हैं। हालांकि, यह तभी संभव है जब वैज्ञानिक पहले से यह पता लगा लें कि यह सोलर स्टॉर्म कब आएगा? इस स्टॉर्म की निश्चित तारीख पता नहीं चल सकी है। नेशनल ओसिएनोग्राफिक (राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान) और एटमॉस्फिरिक एडमिनिस्ट्रेशन (वायुमंडलीय प्रशासन) के साथ मिलकर नासा अंतरिक्ष के मौसम की भविष्यवाणी को और सुधारने का प्रयास कर रहा है। इधर, अमेरिका के पांच हजार ग्रिडों को बचाने की कीमत करीब ११ अरब रुपए होगी।
कैसा होगा असर?
सोलर स्टॉर्म का असर पृथ्वी के अंतरिक्ष मौसम पर बहुत गहरा पड़ता है। इससे अंतरिक्ष यान और खगोलविदों के लिए विकिरण का खतरा बन जाता है। सोलर स्टॉर्म में निकलने वाली एक्स-रे किरणों के कारण वायुमंडल की ऊपरी परत का आयनीकरण हो जाता है। इससे रेडियो संचार और लो ऑर्बिटिंग सैटेलाइट के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। स्टॉर्म के समय उच्च ऊर्जा कणों की प्रोटॉन स्टॉर्म के रूप में वर्षा होती है। उच्च ऊर्जा वाले यह प्रोटॉन मानव शरीर में प्रवेश कर जैव रासायनिक क्षति पहुंचाते हैं। खगोलविदों की अंतरिक्ष यात्रा के दौरान उन पर इस प्रकार के प्रोटॉन द्वारा हमले का खतरा अधिक रहता है। इन प्रोटॉन स्टॉर्म को पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचने में दो से ढाई घंटे लगते हैं। २० जनवरी २००५ को अब तक का सबसे उच्च घनत्व वाला प्रोटॉन स्टॉर्म आया था और इसे पृथ्वी की कक्षा में पहुंचने में १५ मिनट लगे थे।
क्या है सोलर फ्लेर या सोलर स्टॉर्म
सोलर स्टॉर्म या सोलर फ्लेर सूर्य के वातावरण में विस्फोस्टकों की एक श्रृंखला है, जिसका कारण चुंबकीय अस्थिरता होती है। इस दौरान सूर्य (६3१०)२५ जूल ऊर्जा मुक्त कर सकता है। यह ऊर्जा द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में हिरोशिमा पर फेंके गए एटम बम की ऊर्जा से एक लाख करोड़ गुना अधिक है। यह प्रक्रिया जब अन्य तारों में होती है तो उसे स्टेलर फ्लेर कहते हैं। सोलर फ्लेर सौर वातावरण की सभी परतों को प्रभावित करता है। सौर वातावरण में मौजूद छोटे कण, जिन्हें प्लाज्मा कहते हैं, उनका तापमान करोड़ों केल्विन बढ़ा देते हैं। इसके परिणाम स्वरूप इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और भारी आयनों की गति प्रकाश की गति के करीब हो जाती है। यह इलेक्ट्रोमैगनेटिक स्पेक्ट्रम में सभी वेवलेंथ के साथ विकिरण करते हैं। इस प्रकार के फ्लेर में ऊर्जा का स्रोत कोरोना (सौर वातावरण की परत) होता है। कोरोना में संग्रहित चुंबकीय ऊर्जा के निकलने से फ्लेर को ऊर्जा मिलती है। सोलर फ्लेर के दौरान निकलने वाली अल्ट्रा वॉयलेट किरणें और एक्स-रे पृथ्वी के आइनोस्फीयर को प्रभावित कर रेडियो कम्युनिकेशन को खराब कर सकती है। इसका असर राडार सिस्टम पर भी पड़ता है। सोलर फ्लेर या स्टॉर्म का पता सबसे पहले खगोलविद रिचर्ड क्रियटॉफर कैरिंगटन ने लगाया था। इसके अलावा अन्य कई तारों में स्टेलर फ्लेर को भी देखा गया है। सूर्य की गतिविधि प्रत्येक ११ साल में बदलती है, इसी को सोलर साइकिल भी कहते हैं। जब सूर्य अपने चक्र की उच्चतम स्थिति पर होता है तब सूर्य पर काले धब्बे बन जाते हैं। सूर्य में जितने अधिक काले धब्बे होंगे, सोलर फ्लेर भी उतना ही अधिक घातक होगा।
शशांक शेखर बाजपेई (09977818811) / शादाब समी (09827748827) के इनपुट के साथ.