Monday, August 30, 2010

तबाही मचाएगा सोलर स्टॉर्म!

तबाही मचाएगा सोलर स्टॉर्म!
खगोलशास्त्रियों का अनुमान है कि एक बड़े सोलर स्टॉर्म (तूफान) से पैदा होने वाली बिजली की चमक इस महीने पृथ्वी से देखी जा सकेगी। यह तूफान १० करोड़ हाइड्रोजन बम की शक्ति से हमारे ग्रह पर २०१२ में हमला करेगा। अमेरिकी मीडिया में नासा की ओर से जारी चेतावनी में बताया गया है कि इस महीने दिखाई देने वाली बिजली की चमक बड़े पैमाने पर आने वाले सोलर स्टॉर्म के बनने की पूर्व सूचना है, जो हमारे ग्रह के पूरे पॉवर ग्रिड को बर्बाद कर देगा। इसके साथ ही संचार उपकरणों और उपग्रहों पर भी स्ट्रॉम का विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
नासा इस तूफान पर २००६ से नजर रख रहा है। हालांकि समय-समय पर ऐसी किसी भी घटना के न होने की घोषणा की जाती रही है। इधर, अमेरिका की ओर से मिली रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सोलर स्टॉर्म आने की तारीख हॉलीवुड फिल्मों में धरती के समाप्त होने का जो वर्ष बताया है उससे मिलती है, जो कि २०१२ है।
पहले भी मचा चुका है तबाही
इसी तरह का तूफान १८५९ और १९२१ में दुनियाभर में आया था, जिसने काफी तबाही मचाई थी। सोलर स्टॉर्म की वजह से टेलीग्राफ के तारों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा था। दक्षिण अफ्रीका में २००३ में आए ऐसे ही तूफान से देश के ज्यादातर हिस्सों में कई महीनों तक बिजली नहीं आई थी। २०१२ में आने वाले तूफान के इससे काफी अधिक विनाशकारी होने की संभावना है, क्योंकि आज टेक्नोलॉजी काफी आधुनिक है और समाज इस पर काफी हद तक निर्भर हो गया है। ऐसे में सोलर स्टॉर्म से भारी तबाही होने की आशंका जताई जा रही है।
खतरनाक होंगे इसके परिणाम
खगोल विज्ञान के लेक्चरर और स्तंभकार डेव रीनीकी कहते हैं, 'आम सौर खगोलशास्त्री इस बात से सहमत हैं कि आने वाला सौर तूफान पिछले १०० वर्षों में सबसे हिंसक तूफान होगा।' उन्होंने बताया कि यह सोलर स्टॉर्म आधुनिक जीपीएस प्रणाली से काम करने वाली हर चीज, जैसे संचार के साधनों, एयरलाइंस कंपनीज सभी को बुरी तरह से प्रभावित करेगा। वह सर्किट को ट्रिप कर देगा और कक्षाओं में चक्कर लगा रहे उपग्रहों को बेकार कर देगा।
रीनीकी ने कहा कि वास्तव में यह कोई नहीं बता सकता कि २०१२-१३ में सोलर मैक्स आज की डिजिटल निर्भर सोसाइटी पर क्या प्रभाव डालेगा? नासा में हीलियो फिजिक्स शाखा के निदेशक डॉ. रिचर्ड फिशर ने बताया कि सुपर स्टॉर्म बिजली की गाज के रूप में गिरेगा। अगर सावधानी नहीं बरती गई तो इससे विश्व स्वास्थ्य, आपातकालीन सेवाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। नासा ने कहा कि नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस की रिपोर्ट में सामने आया है कि अगर यह तूफान आज की तारीख में आता है तो इससे दुनिया के हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर को लगभग दो लाख करोड़ डॉलर का नुकसान होगा। जानकारों का मानना है कि इससे होने वाली क्षति की पूर्ति में चार से १० वर्ष का समय लग जाएगा। वैज्ञानिकों की चिंता का कारण सूर्य के उस चरण में जाना है, जिसे सोलर साइकिल २४ कहते हैं। इस दौरान सूर्य में धमाके के साथ निकलने वाली ऊर्जा १० करोड़ हाइड्रोजन बम के बराबर होगी। फिशर कहते हैं कि हम जानते हैं यह तूफान आ रहा है, लेकिन यह नहीं जानते हैं कि यह कितना खराब होगा।
इसे रोक नहीं सकते हैं वैज्ञानिक
इस सोलर स्टॉर्म को रोकना फिलहाल संभव नहीं लग रहा है, लेकिन वैज्ञानिक उपग्रहों और पावर ग्रिड को सेफ मोड में रख सकते हैं। हालांकि, यह तभी संभव है जब वैज्ञानिक पहले से यह पता लगा लें कि यह सोलर स्टॉर्म कब आएगा? इस स्टॉर्म की निश्चित तारीख पता नहीं चल सकी है। नेशनल ओसिएनोग्राफिक (राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान) और एटमॉस्फिरिक एडमिनिस्ट्रेशन (वायुमंडलीय प्रशासन) के साथ मिलकर नासा अंतरिक्ष के मौसम की भविष्यवाणी को और सुधारने का प्रयास कर रहा है। इधर, अमेरिका के पांच हजार ग्रिडों को बचाने की कीमत करीब ११ अरब रुपए होगी।
कैसा होगा असर?
सोलर स्टॉर्म का असर पृथ्वी के अंतरिक्ष मौसम पर बहुत गहरा पड़ता है। इससे अंतरिक्ष यान और खगोलविदों के लिए विकिरण का खतरा बन जाता है। सोलर स्टॉर्म में निकलने वाली एक्स-रे किरणों के कारण वायुमंडल की ऊपरी परत का आयनीकरण हो जाता है। इससे रेडियो संचार और लो ऑर्बिटिंग सैटेलाइट के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। स्टॉर्म के समय उच्च ऊर्जा कणों की प्रोटॉन स्टॉर्म के रूप में वर्षा होती है। उच्च ऊर्जा वाले यह प्रोटॉन मानव शरीर में प्रवेश कर जैव रासायनिक क्षति पहुंचाते हैं। खगोलविदों की अंतरिक्ष यात्रा के दौरान उन पर इस प्रकार के प्रोटॉन द्वारा हमले का खतरा अधिक रहता है। इन प्रोटॉन स्टॉर्म को पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचने में दो से ढाई घंटे लगते हैं। २० जनवरी २००५ को अब तक का सबसे उच्च घनत्व वाला प्रोटॉन स्टॉर्म आया था और इसे पृथ्वी की कक्षा में पहुंचने में १५ मिनट लगे थे।
क्या है सोलर फ्लेर या सोलर स्टॉर्म
सोलर स्टॉर्म या सोलर फ्लेर सूर्य के वातावरण में विस्फोस्टकों की एक श्रृंखला है, जिसका कारण चुंबकीय अस्थिरता होती है। इस दौरान सूर्य (६3१०)२५ जूल ऊर्जा मुक्त कर सकता है। यह ऊर्जा द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में हिरोशिमा पर फेंके गए एटम बम की ऊर्जा से एक लाख करोड़ गुना अधिक है। यह प्रक्रिया जब अन्य तारों में होती है तो उसे स्टेलर फ्लेर कहते हैं। सोलर फ्लेर सौर वातावरण की सभी परतों को प्रभावित करता है। सौर वातावरण में मौजूद छोटे कण, जिन्हें प्लाज्मा कहते हैं, उनका तापमान करोड़ों केल्विन बढ़ा देते हैं। इसके परिणाम स्वरूप इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और भारी आयनों की गति प्रकाश की गति के करीब हो जाती है। यह इलेक्ट्रोमैगनेटिक स्पेक्ट्रम में सभी वेवलेंथ के साथ विकिरण करते हैं। इस प्रकार के फ्लेर में ऊर्जा का स्रोत कोरोना (सौर वातावरण की परत) होता है। कोरोना में संग्रहित चुंबकीय ऊर्जा के निकलने से फ्लेर को ऊर्जा मिलती है। सोलर फ्लेर के दौरान निकलने वाली अल्ट्रा वॉयलेट किरणें और एक्स-रे पृथ्वी के आइनोस्फीयर को प्रभावित कर रेडियो कम्युनिकेशन को खराब कर सकती है। इसका असर राडार सिस्टम पर भी पड़ता है। सोलर फ्लेर या स्टॉर्म का पता सबसे पहले खगोलविद रिचर्ड क्रियटॉफर कैरिंगटन ने लगाया था। इसके अलावा अन्य कई तारों में स्टेलर फ्लेर को भी देखा गया है। सूर्य की गतिविधि प्रत्येक ११ साल में बदलती है, इसी को सोलर साइकिल भी कहते हैं। जब सूर्य अपने चक्र की उच्चतम स्थिति पर होता है तब सूर्य पर काले धब्बे बन जाते हैं। सूर्य में जितने अधिक काले धब्बे होंगे, सोलर फ्लेर भी उतना ही अधिक घातक होगा।
शशांक शेखर बाजपेई (09977818811) / शादाब समी (09827748827) के इनपुट के साथ.

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