एफ-वन रेस
फॉर्मूला वन को आधिकारिक तौर पर फॉर्मूला वन वल्र्ड चैम्पियनशिप के नाम से जाना जाता है। फेडरेशन इंटरनेशनल डी ला'ऑटोमोबाइल के द्वारा स्वीकृत यह ऑटो रेसिंग का उच्चतम वर्ग है, जिसमें सिर्फ एक सीट होती है। एफ-१ के सीजन में रेस की कई श्रृंखला होती हैं, जिसे ग्रैंड्स प्रिक्स के रूप में जाना जाता है। रेस खास तौर पर बने सर्किट, पूर्व सार्वजनिक सड़कों और शहर की बंद सड़कों में आयोजित होती है। दो वार्षिक वल्र्ड चंैपियनशिप्स का निर्धारण करने के लिए प्रत्येक दौड़ के परिणामों को जोड़ा जाता है।
इसमें से एक चैम्पियनशिप ड्राइवरों के लिए और एक निर्माताओं के लिए होती है, जिसके साथ में ड्राइवर, निर्माता दल, ट्रैक अधिकारी, आयोजक और वे परिक्रमा स्थल भी शामिल होते हैं, जो वैध सुपर लाइसेंसों के आयोजकों के रूप में होने के लिए आवश्यक हैं। फॉर्मूला वन रेस में कारें 360 किमी प्रति घंटा की अधिकतम रफ्तार से चलती हैं। कारों का प्रदर्शन काफी हद तक इलेक्ट्रॉनिक्स, वायुगतिकी, निलंबन और पहियों पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है।
सामंजस्य है जरूरी
फार्मूला वन कार रेस मानव और मशीन की ताकत का बेजोड़ नमूना है। इस कार को बनाने में मानव संसाधनों का प्रयोग कर मशीन की मदद से एक ऐसी कार तैयार करता है, जिसके दीवाने दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं। फार्मूला वन कार ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग का बेहतरीन उदाहरण है। इस कार में लगे इंजन में २.४ लीटर का पॉवरप्लांट होता है, जो कि ७५० बीएचपी की शक्ति से कार को अधिकतम स्पीड दे सकता है। सामान्य कारों का इंजन एक लीटर में मात्र १०० बीएचपी की शक्ति ही इंजन को दे पाता है। इस कार का इंजन इतनी शक्ति देता है कि कार का पहिया १८,००० आरपीएम (राउंड प्रति मिनट) की गति से घूमता है। एक सामान्य कार में लगे इंजन में महज ६,००० आरपीएम की शक्ति होती है। एफ-१ कार का पिस्टन एक सेकंड में ३०० बार मूवमेंट करता है, जबकि सामान्य कारों का पिस्टन अधिकतम १०० बार ही मूवमेंट करता है।
यूरोप है केंद्र
फॉर्मूला वन रेस का केंद्र यूरोप है। आधे से अधिक फॉर्मूला वन रेस यहां आयोजित होती हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में खेल के क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है और ग्रैंड्स प्रिक्स का आयोजन दुनियाभर में होने लगा है। फॉर्मूला वन एक विशाल टेलीविजन कार्यक्रम है, जिसके कुल वैश्विक दर्शकों की संख्या 6,000 लाख प्रति रेस की है। यह दुनिया के सबसे महंगे आयोजनों में से एक है, लेकिन इसे अभी तक खेल का दर्जा नहीं दिया गया है। इस खेल के हाई प्रोफाइल होने और इसकी लोकप्रियता अधिक होने की वजह से एफ-वन के लिए आयोजक बहुत अधिक निवेश करते हैं।
रेस डायरेक्टर चार्ली
2010 में फॉर्मूला वन के रेस डायरेक्टर चार्ली व्हाइटिंग हैं। वह प्रत्येक ग्रैंड प्रिक्स के लिए रसद का प्रबंध करते हैं। रेस से पहले पार्क फेर्मे में कारों का निरीक्षण करते हैं। नियमों को लागू करते हैं और प्रत्येक रेस को शुरू करने वाली बत्तियों को नियंत्रित करते हैं। रेस अधिकारियों के प्रमुख होने के नाते वे टीमों और ड्राइवरों के बीच विवाद सुलझााने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। किसी भी पक्ष द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर दंड, जैसे दंडस्वरूप कार चलाना, रेस से पहले आरम्भ ग्रिड पर पदावनति, रेस अयोग्यता और जुर्माना लगाया जा सकता है।
१९२० से शुरुआत
फॉर्मूला वन श्रृंखला की शुरुआत 1920 और 1930 के दशक के यूरोपियन ग्रैंड प्रिक्स मोटर रेसिंग से हुई है। 'फॉर्मूला' नियमों का एक सेट है, जिसे सभी प्रतिभागियों और कारों को जरूर पूरा करना चाहिए। फॉर्मूला-वन 1946 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वीकृत एक नया 'फॉर्मूला' था, जिसके साथ उस वर्ष आयोजित होने वाले पहले गैर-चैम्पियनशिप रेसों का आयोजन किया गया था। पहली वल्र्ड चैम्पियनशिप रेस 1950 में यूके के सिल्वरस्टोन में हुई, उसके बाद 1958 में निर्माताओं के लिए चैम्पियनशिप की गई। गैर-चैम्पियनशिप फॉर्मूला वन का आयोजन कई सालों तक हुआ, लेकिन खर्च लगातार बढऩे के कारण इसकी अंतिम प्रतियोगिता 1983 में हुई।
२५ अंक यानी जीत
1950 के बाद से चैम्पियनशिप अंक प्रदान करने के लिए कई प्रणालियों का उपयोग किया जाता रहा है। 2010 के नियमों के अनुसार, शीर्ष दस कारों को अंकों से सम्मानित किया जाता है, विजेता को 25 अंक प्राप्त होते हैं। प्रत्येक रेस में हासिल किए गए अंकों की कुल संख्या को जोड़ा जाता है और सत्र के अंत में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले ड्राइवर और कंस्ट्रक्टर ही वल्र्ड चैम्पियन होते हैं। ड्राइवर सत्र के दौरान टीम बदल सकता है और पिछली टीम में मिले अंकों को अपने पास रख सकता है।
ऐसा होता है सर्किट सर्किट (रेस टैक के हिस्से को सर्किट कहते हैं) में सीधी सड़क होती है। इसकी शुरुआत में ग्रिड होता है। पिट लेन में रेस के दौरान ड्राइवर ईंधन भरने व टायरों को बदलवाने के लिए रुकते हैं। यहां टीम रेस से पहले कारों पर काम करती हैं। यह आरम्भ ग्रिड से आगे होती है। सर्किट के शेष हिस्से का ले-आउट अलग होता है। ज्यादातर सर्किट घड़ी की सुई की दिशा वाले होते हैं। घड़ी की उल्टी दिशा में जाने वाले सर्किटों से ड्राइवर को गर्दन की समस्या हो सकती है क्योंकि कारों द्वारा दिशा बदलने पर बहुत बल पैदा होता है, इससे ड्राइवर का सिर को विपरीत दिशा में खिंचने लगता है। आजकल इस्तेमाल हो रहे सर्किटों को विशेष रूप से प्रतियोगिता के लिए बनाया गया है। मोनैको, मेलबोर्न, वैलेंशिया और सिंगापुर के मौजूदा सड़क सर्किट अच्छे हैं।
कुछ खास बातें
* 1947 में पहली फॉर्मूला वन रेस का आयोजन किया गया था, जबकि 1950 तक वल्र्ड चैम्पियनशिप शुरू नहीं हो सकी थी।
* 1950 और 1960 के दशक में कई फॉर्मूला वन रेस हुईं, जिनकी गिनती वल्र्ड चैम्पियनशिप के रूप में नहीं की गई।
* 1950 में कुल २२ फॉर्मूला वन रेस हुईं, जिसमें से सिर्फ छह की गिनती वल्र्ड चैम्पियनशिप में हुई।
*1970 और 1980 के दशक में गैर-चैंपियनशिप प्रतियोगिताओं की संख्या में काफी कमी आई। बढ़ते खर्च की वजह से अंतिम गैर-चैम्पियनशिप फॉर्मूला वन रेस का आयोजन 1983 में किया गया।
* 1950 से 1960 तक इंडियानापोलिस 500 की गिनती वल्र्ड चंैपियनशिप के रूप में की गई थी। वल्र्ड चैंपियनशिप के नियमित ड्राइवरों में से केवल एक ड्राइवर, अल्बर्टो अस्कारी ने 1952 में इस अवधि के दौरान इंडियानापोलिस में प्रतिस्पर्धा की।
* 1952 से 1953 तक वल्र्ड चैंपियनशिप के रूप में गिनी जाने वाली सभी रेसों (इंडियानापोलिस 500 को छोड़कर) का संचालन फॉर्मूला टू के विनियमों के अनुसार हुआ था।
सेफ्टी कार से पीछे ही चलेंगी एफ-1
दुर्घटना की स्थिति में जिन प्रतियोगियों या ट्रैकसाइड रेस मार्शलों की सुरक्षा के लिए खतरा हो, रेस अधिकारी सेफ्टी कार तैनात करने का चुनाव कर सकते हैं। प्रभावस्वरूप यह रेस को निलंबित कर देते हंै और साथ में उन ड्राइवरों को भी जो रेस क्रम में अपनी गति पर ट्रैक के चारों तरफ सेफ्टी कार के पीछे-पीछे चलते हैं, जहां उससे आगे निकलने की अनुमति नहीं होती है। सेफ्टी कार तब तक चक्कर लगाती रहती है, जब तक खतरा समाप्त नहीं हो जाता है। उसके बाद रेस में इसके आने पर यह एक 'रोलिंग स्टार्ट' के साथ फिर से रेस शुरू करता है। सेफ्टी कार के तहत पिट स्टॉप की अनुमति है। वर्तमान में मर्सिडीज बेन्ज फॉर्मूला वन के लिए सेफ्टी कार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए मर्सिडीज एएमजी मॉडल की आपूर्ति करता है। वर्ष 2000 के बाद से मुख्य सेफ्टी कार ड्राइवर जर्मनी के पूर्व-रेसिंग ड्राइवर बर्न्ड मेलैंडर ही हैं।
इसलिए खास है एफ-वन
* एफ-वन कार की रफ्तार ३६० किमी प्रति घंटा होती है।
* एक एफ-१ कार में ८०,००० कलपुर्जों को ९९.९ फीसदी तक सही तरीके से फिट किया जाता है, लेकिन रेस के समय कार के स्टार्ट होते ही ८० पुर्जे बेकार हो जाते हैं। वहीं सामान्य कार में करीब ३,००० कलपुर्जे होते हैं।
* ५५० किलो की एफ-१ कार ० से १६० केपीएच की रफ्तार हासिल करने में मात्र चार सेकंड लेती है।
* कार में लगा इंजन रेस के दौरान महज दो घंटों में ही अपना जीवन काल पूरा कर लेता है। वहीं, एक सामान्य कार का इंजन करीब २० साल तक चलता है।
* एक अनुमान के मुताबिक एक एफ-१ रेस में कार के ड्राइवर का वजन लगभग चार किलोग्राम तक कम हो जाता है। ऐसा ब्रेक लगने और देर तक जबरदस्त गुरुत्वाकर्षण बल व तापमान के कारण होता है।
* मोनाको ग्रैंड प्रिक्स जैसे स्ट्रीट कोर्स रेस में रफ्तार इतनी तेज होती है कि रोड में लगे मेनहोल के ढक्कन खिंचाव के कारण निकल जाते हैं। इस कारण रेस के समय ढक्कनों में नीचे की ओर से वेल्डिंग कर दी जाती है।
* एफ-१ कार के टायर ९० से १२० किमी ही चलते हैं, जबकि सामान्य टायर ६० हजार से एक लाख किमी तक चलते हैं।
मौत की रेस
एफ-वन कार रेस में खतरे कम नहीं हैं। रफ्तार के कारण नियंत्रण खोने और एक्सीडेंट्स की घटनाएं आम हैं। कई खिलाडिय़ों का करियर इस रेस ने खत्म कर दिया। जानते हैं कितनी जानें ले चुकी है यह रेस।
वर्ष १९५० : १५ मौतें
वर्ष १९६० : १२ मौतें
वर्ष १९७० : १० मौतें
वर्ष १९८० : ०४ मौतें
वर्ष १९९४ : ०२ मौतें
Friday, September 10, 2010
Sunday, September 5, 2010
पतंगबाजी पर पाबंदी

कनाडा के एक पार्क में पतंग उड़ाने पर पाबंदी लगा दी गई है। यहां पतंग उड़ाने के दौरान लोगों के घायल हो जाने की कुछ घटनाओं के बाद पतंगबाजी को प्रतिबंधित करने का फैसला किया गया। टोरंटो के पार्क प्राधिकरण के प्रमुख ब्रेंडा पैटर्सन का कहना है कि समस्या पतंग उड़ाने के लिए इस्तेमाल होने वाले धागे को लेकर है। पतंग उड़ाने वाला धागा नायलॉन का होता है, जिस पर शीशा चढ़ा होता है। इन धागों का उद्देश्य एक दूसरे को काटना होता है।
पतंगों पर ये पाबंदी कुछ ऐसी घटनाओं के बाद लगाई गई है, जिसमें एक बार किसी का कान पतंग के धागे से कट गया था। उधर, आपत्ति के बाद अब यह कहा जा रहा है कि कोई ऐसा स्थान तय कर दिया जाए, जहां पतंगबाजी की जा सके। मनोरंजन के बढ़ते साधनों और समय की कमी के कारण बहुत से लोगों ने पतंगबाजी से किनारा कर लिया है, ऐसे में पतंगबाजी पर प्रतिबंध लगाने से बचे-खुचे लोग भी इसे छोड़ देंगे और पतंग इतिहास बन जाएगी।
चीन में सबसे पहले
पतंग के आविष्कार के बारे में कहा जाता है कि इसे ईसा पूर्व तीसरी सदी में चीन में बनाया गया था यानी पतंग आज से करीब 2,300 वर्ष पहले आसमान में पहली बार उड़ी थी। सबसे पहली पतंग बनाने का श्रेय चीनी दार्शनिक 'मो दी' को जाता है। पतंग बनाने के लिए जरूरी सामान जैसे रेशम का कपड़ा, पतंग उड़ाने के लिये मजबूत रेशम का धागा और पतंग के आकार को सहारा देने वाला हल्का और मजबूत बांस सभी चीन में मौजूद था। चीन के बाद जापान, कोरिया, थाईलैंड, बर्मा, भारत, अरब, उत्तर अफ्रीका से होते हुए यूरोप का आसमान भी पतंगों से पट गया।
संस्कृतियों में पतंग
हवा में अठखेलियां करता धागा और पतंग अपने 2,३00 वर्ष से अधिक पुराने इतिहास में अनेक मान्यताओं, अंधविश्वासों और अनूठे प्रयोगों का गवाह रहा है। अपनी अलग-अलग संरचना और पंखों पर वर्चस्व की आशाओं का बोझा लेकर उड़ती पतंग ने अपने अलग-अलग रूपों में दुनिया को रोमांचक खेल का माध्यम दिया। इसके साथ ही यह एक शौक के रूप में दुनिया की कई सभ्यताओं और संस्कृतियों में भी रच-बस गई।
यूरोप में पतंगबाजी
यूरोप में पतंग उड़ाने का चलन नाविक मार्को पोलो ने शुरू किया। मार्को अपनी पहले की यात्राओं के दौरान मिले पतंग के कौशल को यूरोप में लाया। इसके बाद यूरोप और अमेरिका के निवासियों ने वैज्ञानिक और सैन्य उद्देश्यों के लिए पतंग का प्रयोग किया। ब्रिटेन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर नीडहम ने अपनी 'ए हिस्ट्री आफ चाइनाज साइंस एंड टेक्नोलॉजी' किताब में पतंग को चीन की ओर से यूरोप को दी गई प्रमुख वैज्ञानिक खोज बताया। कहा जा सकता है कि पतंग को देखकर ही इंसानों में उडऩे की ललक जगी और इसके लिए शोध का दौर शुरू हुआ, और विमान बने।
पतन की ओर पतंगबाजी
एक समय में मनोरंजन के प्रमुख साधनों में से एक पतंगबाजी का शौक अब धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। लोगों के पास समय की कमी है तो वहीं कांक्रीट के जंगलों ने पतंगबाजी के लिए खुली जगहों को नहीं छोड़ा है। ऐसे में पतंगबाजी की कला अब इतिहास में सिमटने को तैयार है। अब तो केवल कुछ विशेष दिनों और पतंगोत्सवों में ही पतंगे आसमान में कलाबाजियां करती दिखती हैं।
जुड़े हैं अंधविश्वास भी
आसमान में उडऩे की मनुष्य की आकांक्षाओं को बल पतंग से ही मिला। डोर के सहारे आसमान में अटखेलियां करती पतंग के साथ ही में कई अंधविश्वास, मान्यताएं और परंपराएं भी गुपचुप शामिल हो गईं। प्राचीन दंतकथाओं के अनुसार, चीन और जापान में पतंगों का उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिये भी किया जाता था। चीन में किंग राजवंश के शासन के दौरान उड़ती पतंग को यूं ही छोड़ देना दुर्भाग्य और बीमारी को न्यौता देने के समान माना जाता था। कोरिया में पतंग पर बच्चे का नाम और उसके जन्म की तिथि लिखकर उड़ाया जाता था, ताकि उस वर्ष उस बच्चे से जुड़ा दुर्भाग्य पतंग के साथ ही उड़ जाए। थाईलैंड में पतंग धार्मिक आस्थाओं के प्रदर्शन का माध्यम भी रह चुकी है। थाईलैंड में हर राजा की अपनी विशेष पतंग होती थी, जिसे जाड़े के मौसम में भिखारी और पुरोहित देश में शांति और खुशहाली की आशा में उड़ाते थे। थाइलैंड के लोग भी अपनी प्रार्थनाओं को भगवान तक पहुंचाने के लिए बारिश के मौसम में पतंग उड़ाते थे।
भारत में पतंगबाजी
पतंग उड़ाने का शौक चीन, कोरिया और थाईलैंड समेत दुनिया के कई अन्य देशों से होकर भारत पहुंचा। देखते ही देखते यह शौक भारत में एक शगल बनकर यहां की संस्कृति और सभ्यता में रच-बस गया। जब भारत में पतंग आई उस वक्त मनोरंजन के अन्य साधन नहीं हुआ करते थे। ऐसे में मनोरंजन की कमी को पूरा करते हुए पतंगबाजी ने लोगों के बीच खासी जगह बना ली। पतंगबाजी का शौक बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी के सिर चढ़कर बोलने लगा। धीरे-धीरे पतंगबाजी भारत में इतनी लोकप्रिय हुई कि कई कवियों ने पतंग पर कविताएं लिख डालीं। दुनिया के कई देशों में 27 नवंबर को फ्लाई ए काइट डे के रूप में मनाते हैं। राजस्थान में पर्यटन विभाग की ओर से प्रतिवर्ष तीन दिवसीय पतंगबाजी प्रतियोगिता होती है। राज्य में हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन परंपरागत रूप से पतंगबाजी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इसमें राज्य के पूर्व दरबारी पतंगबाजों के साथ ही विदेशी पतंगबाज भी भाग लेते हैं। इसके अलावा दिल्ली और लखनऊ में पतंगबाजी के प्रति खासा आकर्षण है। दीपावली के अगले दिन जमघट के दौरान तो आसमान में पतंगों की कलाबाजियां देखते ही बनती हैं। दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भी पतंग उड़ाने का चलन है। इसके अलावा गुजरात सरकार हर वर्ष १४ जनवरी को तीन दिवसीय पतंगों का अंतरराष्ट्रीय त्योहार मनाती है, जिसमें देश-दुनिया के जाने-माने पतंगबाज अपनी अद्भुत डिजाइन वाली पतगों को आसमान में उड़ाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। इसके अलावा बिहार, झाारखंड, पश्चिम बंगाल, पंजाब और उत्तर प्रदेश में पंतगबाजी होती है। इन राज्यों में लखनऊ, अहमदाबाद, वरोदड़ा, जयपुर, धनबाद, वाराणसी, हैदराबाद में जबरदस्त पतंगबाजी होती है।
इतिहास की तारीख में पतंगों की भूमिका
200 बीसी -- ह्यूनत्सांग ने चीन के हान राजवंश के पतन के लिऊ पांग की सेना को रास्ता दिखाने के लिए रात में पतंग उड़ाई थी।
100 बीसी से 500 एडी-- सिग्नल भेजने और दुश्मन के कैंप की दूरी की जानकारी लेने के लिए आर्मी जनरल पतंगों का प्रयोग करते थे।
930 एडी -- जापानी साहित्य में शिरोशी शब्द का प्रयोग मिलता है, इसमें शि का अर्थ कागज से और रोशी का अर्थ चीनी पक्षी से है।
960 - 1126 एडी -- चीन में पतंगबाजी लोगों के बीच मनोरंजन का प्रमुख साधन बन गई। यहां लोग नवें महीने के नवें दिन बुराई से छुटकारे को पतंग उड़ाते थे।
1542 एडी -- पहली बार भारतीय साहित्य में पतंग शब्द का उल्लेख किया गया। मधुमालती में इसके लिए मंजन का प्रयोग किया गया, जहां कवि ने एक प्रेमी के प्यार को पतंग के जरिए प्रदर्शित किया।
1752 एडी -- बेंजामिन फ्रैंकमिन ने पतंग उड़ाकर यह साबित किया कि आसमान में चमकने वाली बिजली वैसी ही होती है, जैसी बिजली उत्पादित करने से मिलती है। इसके लिए उन्होंने सिल्क के चारों ओर लकड़ी की स्टिक लगाई और उसे एक धातु के तार से जोड़ दिया। जब बिजली वाले बादल पतंग के ऊपर से गुजरे तो बिजली पतले तार के जरिए नीचे आ गई।
1870 एडी -- ऑस्ट्रेलियाई खोजकर्ता लॉरेंस हॉर्गेव ने एक बॉक्स काइट बनाई, जिसकी स्थिरता ने दूसरे बिजली से चलने वाले हवाई जहाजों को बनाने की प्रेरणा दी।
1896 एडी -- एलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने तीन तीलियां जोड़कर 'टेट्रा' आकार की डिजाइन बनाई। उन्होंने २५६ सेल की फ्रोस्ट किंग पतंग को उड़ाया। बाद में उन्होंने इसे बेहतर करते हुए १,३०० सेल और ३,३९३ सेलों का बनाया। अब तक सैमुअल कोडी इंसान को लेकर उडऩे वाले ग्लाइडर्स पर प्रयोग कर रहे थे।
1902 एडी -- कोडी के समकालीन राइट ब्रदर्स ने हवा में उडऩे वाले विमान को बनाने में सफलता हासिल कर ली। तब से ही विमानन के युग की शुरुआत हुई।
एक खुराक में मिलेगी मलेरिया से मुक्ति
आने वाले कुछ समय में मलेरिया से पीडि़त मरीजों को जल्द राहत मिलेगी। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दवा का निर्माण किया है, जिसकी मात्र एक खुराक से ही मरीज को मलेरिया से मुक्ति मिल जाएगी। इस बारे में अमेरिका के यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है कि उन्होंने एक खुराक में ही मलेरिया के मरीज को ठीक करने वाली दवा का निर्माण किया है। ऐसे में चिकित्सा जगत से जुड़े विशेषज्ञ भी इस दवा को लेकर खासे उत्साहित नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि मलेरिया को कारण जानते हुए भी हम उससे जूझा रहे हैं। ऐसे में अगर यह दवा बन जाती है तो हजारों जिदंगियों को बचाया जा सकता है। मलेरिया रात में काटने वाले मच्छरों से फैलता है। ये मच्छर रात में मनुष्य को काटकर अपने अंदर मौजूद परजीवी को मनुष्य के शरीर में छोड़ देते हैं, जिससे मनुष्य संक्रमित हो जाता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने इस दवा का निर्माण किया है, जो मलेरिया फैलाने वाले दो मुख्य परजीवी पर प्रभावकारी होगी।
इसका नाम एनआईटीडी६०९ है। वैज्ञानिकों ने इस दवा का प्रयोग चूहों पर किया है जिसमें यह नतीजा निकला कि इसकी एक खुराक ही मलेरिया के संक्रमण को ठीक करने के लिए काफी है। उन्हें उम्मीद है कि यह दवा मनुष्य पर भी इसी प्रकार से कारगर साबित होगी। मलेरिया एक ऐसी बीमारी है, जिसकी दवा मंहगी होने के साथ ही इसका उपचार लंबे समय तक करना पड़ता है। वर्तमान में मलेरिया की जो दवाएं उपलब्ध हंै, उसे दिनभर में एक से चार बार लेना पड़ता है और यह इलाज लगभग एक हफ्ते से अधिक ही चलता है। एनआईटीडी६०९ दरअसल एक कृत्रिम मलेरिया रोधी अणु है, जिसको दवा के रूप में बनाना आसान है। साथ ही इसका निर्माण बड़े पैमाने पर भी किया जा सकता है। टीम की एक सदस्य एलिजाबेथ विनजेलर के अनुसार वर्तमान में मलेरिया रोधी दवाओं की तुलना में एनआईटीडी६०९ की संरचना और रासायनिक गुण अलग हैं। हमें शुरुआत से ही उम्मीद है कि यह जरूर कारगर साबित होगी। यह कारगर साबित होती है तो जहां मलेरिया के अधिक मामले होते हैं, वहां के लिए यह एक वरदान साबित होगा।
क्या है मलेरिया
मलेरिया एक प्रकार के मच्छरों द्वारा फैलने वाला संक्रामक रोग है, जो प्रोटोजोआ परजीवी द्वारा फैलता है। यह संक्रमण मुख्य रूप से अमेरिका (२२ देशों), एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों के उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में फैला हुआ है। मलेरिया को आमतौर पर गरीबी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह खुद अपने आप में गरीबी का कारण है। साथ ही आर्थिक विकास का प्रमुख अवरोधक भी है। मलेरिया प्लाज्मोडियमगण के प्रोटोजोआ परजीवी के माध्यम से फैलता है। केवल चार प्रकार के प्लाज्मोडियम परजीवी मनुष्य को प्रभावित करते हैं। इसमें सबसे खतरनाक प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम और प्लाज्मोडियम विवैक्स माने जाते हैं, साथ ही प्लाज्मोडियम ओवेल तथा प्लाज्मोडियम मलेरिए भी मानव को प्रभावित करते हैं। इन सारे समूह को 'मलेरिया परजीवी' कहते हैं।
खतरनाक है यह
मादा एनाफिलीज मच्छर मलेरिया के परजीवियों को फैलाते हैं। इसके काटने पर मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर अपनी संख्या बढ़ाते हैं। इससे रक्तहीनता (एनीमिया) के लक्षण उभरते हैं, जैसे- चक्कर आना, सांस फूलना आदि। इसके अलावा अविशिष्ट लक्षण जैसे कि बुखार, सर्दी, उबकाई और जुकाम भी होता है। गंभीर मामलों में मरीज बेहोश हो जाता है और उसकी मृत्यु भी हो सकती है।
हजारों साल से प्रभावी
मलेरिया संभवत: सबसे पुरानी बीमारियों में से एक है। यह मानव को 50 हजार वर्षों से प्रभावित कर रही है। इस बीमारी का सबसे पुराना वर्णन चीन में 2700 ईसा पूर्व का मिलता है। मलेरिया शब्द की उत्पत्ति मध्यकालीन इटालियन भाषा के शब्द माला एरिया से हुई है, जिनका अर्थ है 'बुरी हवा'। इसे दलदली बुखार (मार्श फीवर) भी कहा जाता था, क्योंकि यह दलदली क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैलता था।
हुए हैं अध्ययन
मलेरिया पर पहले अध्ययन 1880 में फ्रांसीसी सैन्य चिकित्सक चाल्र्स लुई अल्फोंस लैवेरन ने किया था। उन्होंने अल्जीरिया में काम करते हुए पहली बार लाल रक्त कोशिका के अंदर परजीवी को देखा था। उन्हें इस खोज और अन्य खोज के लिए 1907 का चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार दिया गया। क्यूबाई चिकित्सक कार्लोस फिनले ने पीत ज्वर का इलाज करते हुए पहली बार दावा किया कि मच्छर इस रोग को एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक फैलाते हैं। इसकी पुष्टि ब्रिटेन के सर रोनाल्ड रॉस ने सिकंदराबाद में काम करते हुए 1898 में की। उन्होंने मच्छरों की विशेष जातियों से पक्षियों को कटवाकर उन मच्छरों की लार ग्रंथियों से परजीवी अलग करके दिखाया, जिन्हे उन्होंने संक्रमित पक्षियों में पाला था। इसके लिए उन्हें 1902 में चिकित्सा का नोबेल मिला।
ऐसे होगा नियंत्रण
मलेरिया का प्रसार मानव जनसंख्या घनत्व, मच्छरों की संख्या, मच्छरों से मनुष्यों तक प्रसार और मनुष्यों से मच्छरों तक प्रसार पर निर्भर करता है। इनमें से किसी एक को भी कम करके मलेरिया को मिटाया जा सकता है। इसीलिए मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में रोग का प्रसार रोकने के लिए दवाओं के साथ ही मच्छरों को खत्म करने या उनके काटने से बचने के उपाय किए जाते हैं। मच्छरों के प्रजनन स्थलों को नष्ट करके मलेरिया पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। मच्छर पानी में प्रजनन करते हैं, ऐसे में खुले पानी की जगहों को ढक कर रखें, उसे सुखा दें या पानी बहा दें, पानी की सतह पर तेल डाल दें, जिससे मच्छरों के लार्वा सांस न ले पाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में छिड़काव के लिए लगभग 12 दवाओं को मान्यता दी है। इनमें डीडीटी के अलावा परमैथ्रिन और डेल्टामैथ्रिन जैसी दवाएं शामिल हैं, खासकर उन क्षेत्रों मे जहां मच्छर डीडीटी के प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके हैं।
दवाओं का प्रयास
मलेरिया के लिए टीके विकसित करने के लिए पहली बार प्रयास 1967 में चूहे पर किया गया। इसकी सफलता की दर 60 प्रतिशत थी। एसपीएफ66 पहला टीका था, जिसका क्षेत्र परीक्षण हुआ। यह शुरू में सफल रहा, लेकिन बाद में सफलता की दर ३० प्रतिशत से नीचे आ गई। आज आरटीएस, एसएएस02ए टीका परीक्षणों में सबसे आगे के स्तर पर है। पी. फैल्सीपेरम के जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नई दवाओं और टीकों को विकसित करने तथा उनका परीक्षण करने में आसानी होगी।
इसलिए है महामारी
विश्वभर में हर साल साढ़े तीन से पांच करोड़ लोग मलेरिया की चपेट में आते हैं। इनमें करीब ३० लाख लोगों की हर साल मौत होती है। इसका सबसे अधिक प्रकोप अफ्रीका के सबसहारा क्षेत्र में है। मलेरिया से होने वाली ९० फीसदी मौतें इसी क्षेत्र में होती हैं। पिछले कई दशकों से वैज्ञानिकों के सामने इसके लिए सस्ती और आसानी से हर जगह मिल सकने वाली दवा का निर्माण एक चुनौती बना हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक हर ३० सेकंड में एक अफ्रीकी बच्चे की मौत मलेरिया के कारण होती है।
बना जेनेटिक मच्छर
कुछ दिनों पूर्व एरीजुआना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता प्रोफेसर मिशेल रिहेल ने दावा किया था कि उन्होंने एक ऐसे मच्छर को विकसित किया है, जो इंसानों में मलेरिया फैलने से रोकेगा। इस मच्छर में जेनेटिक बदलाव किए गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इस मच्छर को पूरी तरह से सही रूप में लाने में एक दशक का समय लगेगा। मच्छर में परजीवी प्लाज्मोडियम से प्रतिरक्षा करने की क्षमता होगी, जिसकी वजह से वह संक्रमित नहीं होगा और इंसानों को भी संक्रमित कर मलेरिया नहीं फैलाएगा। वैज्ञानिकों ने कहा कि यह कोई जादू की गोली नहीं है, लेकिन यह नया टूल है। उन्होंने बताया कि हालांकि इससे पहले परजीवी के खिलाफ मच्छर में जेनेटिक बदलाव कर उसके प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के प्रयास में सफलता नहीं मिली थी।
वरदान साबित होगा
इंदौर के एमवाय अस्पताल के डीन डॉ. सलिल भार्गव ने बताया कि अभी मलेरिया जड़ से खत्म होने में ३ से २१ दिन का समय और ५० से ४०० रुपए तक की दवा का खर्च आता है। ऐसे में अमेरिकी वैज्ञानिकों का एक खुराक में मलेरिया खत्म करने का दावा दुनियाभर के लिए खुशी की बात है।
इसका नाम एनआईटीडी६०९ है। वैज्ञानिकों ने इस दवा का प्रयोग चूहों पर किया है जिसमें यह नतीजा निकला कि इसकी एक खुराक ही मलेरिया के संक्रमण को ठीक करने के लिए काफी है। उन्हें उम्मीद है कि यह दवा मनुष्य पर भी इसी प्रकार से कारगर साबित होगी। मलेरिया एक ऐसी बीमारी है, जिसकी दवा मंहगी होने के साथ ही इसका उपचार लंबे समय तक करना पड़ता है। वर्तमान में मलेरिया की जो दवाएं उपलब्ध हंै, उसे दिनभर में एक से चार बार लेना पड़ता है और यह इलाज लगभग एक हफ्ते से अधिक ही चलता है। एनआईटीडी६०९ दरअसल एक कृत्रिम मलेरिया रोधी अणु है, जिसको दवा के रूप में बनाना आसान है। साथ ही इसका निर्माण बड़े पैमाने पर भी किया जा सकता है। टीम की एक सदस्य एलिजाबेथ विनजेलर के अनुसार वर्तमान में मलेरिया रोधी दवाओं की तुलना में एनआईटीडी६०९ की संरचना और रासायनिक गुण अलग हैं। हमें शुरुआत से ही उम्मीद है कि यह जरूर कारगर साबित होगी। यह कारगर साबित होती है तो जहां मलेरिया के अधिक मामले होते हैं, वहां के लिए यह एक वरदान साबित होगा।
क्या है मलेरिया
मलेरिया एक प्रकार के मच्छरों द्वारा फैलने वाला संक्रामक रोग है, जो प्रोटोजोआ परजीवी द्वारा फैलता है। यह संक्रमण मुख्य रूप से अमेरिका (२२ देशों), एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों के उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में फैला हुआ है। मलेरिया को आमतौर पर गरीबी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह खुद अपने आप में गरीबी का कारण है। साथ ही आर्थिक विकास का प्रमुख अवरोधक भी है। मलेरिया प्लाज्मोडियमगण के प्रोटोजोआ परजीवी के माध्यम से फैलता है। केवल चार प्रकार के प्लाज्मोडियम परजीवी मनुष्य को प्रभावित करते हैं। इसमें सबसे खतरनाक प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम और प्लाज्मोडियम विवैक्स माने जाते हैं, साथ ही प्लाज्मोडियम ओवेल तथा प्लाज्मोडियम मलेरिए भी मानव को प्रभावित करते हैं। इन सारे समूह को 'मलेरिया परजीवी' कहते हैं।
खतरनाक है यह
मादा एनाफिलीज मच्छर मलेरिया के परजीवियों को फैलाते हैं। इसके काटने पर मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर अपनी संख्या बढ़ाते हैं। इससे रक्तहीनता (एनीमिया) के लक्षण उभरते हैं, जैसे- चक्कर आना, सांस फूलना आदि। इसके अलावा अविशिष्ट लक्षण जैसे कि बुखार, सर्दी, उबकाई और जुकाम भी होता है। गंभीर मामलों में मरीज बेहोश हो जाता है और उसकी मृत्यु भी हो सकती है।
हजारों साल से प्रभावी
मलेरिया संभवत: सबसे पुरानी बीमारियों में से एक है। यह मानव को 50 हजार वर्षों से प्रभावित कर रही है। इस बीमारी का सबसे पुराना वर्णन चीन में 2700 ईसा पूर्व का मिलता है। मलेरिया शब्द की उत्पत्ति मध्यकालीन इटालियन भाषा के शब्द माला एरिया से हुई है, जिनका अर्थ है 'बुरी हवा'। इसे दलदली बुखार (मार्श फीवर) भी कहा जाता था, क्योंकि यह दलदली क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैलता था।
हुए हैं अध्ययन
मलेरिया पर पहले अध्ययन 1880 में फ्रांसीसी सैन्य चिकित्सक चाल्र्स लुई अल्फोंस लैवेरन ने किया था। उन्होंने अल्जीरिया में काम करते हुए पहली बार लाल रक्त कोशिका के अंदर परजीवी को देखा था। उन्हें इस खोज और अन्य खोज के लिए 1907 का चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार दिया गया। क्यूबाई चिकित्सक कार्लोस फिनले ने पीत ज्वर का इलाज करते हुए पहली बार दावा किया कि मच्छर इस रोग को एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक फैलाते हैं। इसकी पुष्टि ब्रिटेन के सर रोनाल्ड रॉस ने सिकंदराबाद में काम करते हुए 1898 में की। उन्होंने मच्छरों की विशेष जातियों से पक्षियों को कटवाकर उन मच्छरों की लार ग्रंथियों से परजीवी अलग करके दिखाया, जिन्हे उन्होंने संक्रमित पक्षियों में पाला था। इसके लिए उन्हें 1902 में चिकित्सा का नोबेल मिला।
ऐसे होगा नियंत्रण
मलेरिया का प्रसार मानव जनसंख्या घनत्व, मच्छरों की संख्या, मच्छरों से मनुष्यों तक प्रसार और मनुष्यों से मच्छरों तक प्रसार पर निर्भर करता है। इनमें से किसी एक को भी कम करके मलेरिया को मिटाया जा सकता है। इसीलिए मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में रोग का प्रसार रोकने के लिए दवाओं के साथ ही मच्छरों को खत्म करने या उनके काटने से बचने के उपाय किए जाते हैं। मच्छरों के प्रजनन स्थलों को नष्ट करके मलेरिया पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। मच्छर पानी में प्रजनन करते हैं, ऐसे में खुले पानी की जगहों को ढक कर रखें, उसे सुखा दें या पानी बहा दें, पानी की सतह पर तेल डाल दें, जिससे मच्छरों के लार्वा सांस न ले पाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में छिड़काव के लिए लगभग 12 दवाओं को मान्यता दी है। इनमें डीडीटी के अलावा परमैथ्रिन और डेल्टामैथ्रिन जैसी दवाएं शामिल हैं, खासकर उन क्षेत्रों मे जहां मच्छर डीडीटी के प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके हैं।
दवाओं का प्रयास
मलेरिया के लिए टीके विकसित करने के लिए पहली बार प्रयास 1967 में चूहे पर किया गया। इसकी सफलता की दर 60 प्रतिशत थी। एसपीएफ66 पहला टीका था, जिसका क्षेत्र परीक्षण हुआ। यह शुरू में सफल रहा, लेकिन बाद में सफलता की दर ३० प्रतिशत से नीचे आ गई। आज आरटीएस, एसएएस02ए टीका परीक्षणों में सबसे आगे के स्तर पर है। पी. फैल्सीपेरम के जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नई दवाओं और टीकों को विकसित करने तथा उनका परीक्षण करने में आसानी होगी।
इसलिए है महामारी
विश्वभर में हर साल साढ़े तीन से पांच करोड़ लोग मलेरिया की चपेट में आते हैं। इनमें करीब ३० लाख लोगों की हर साल मौत होती है। इसका सबसे अधिक प्रकोप अफ्रीका के सबसहारा क्षेत्र में है। मलेरिया से होने वाली ९० फीसदी मौतें इसी क्षेत्र में होती हैं। पिछले कई दशकों से वैज्ञानिकों के सामने इसके लिए सस्ती और आसानी से हर जगह मिल सकने वाली दवा का निर्माण एक चुनौती बना हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक हर ३० सेकंड में एक अफ्रीकी बच्चे की मौत मलेरिया के कारण होती है।
बना जेनेटिक मच्छर
कुछ दिनों पूर्व एरीजुआना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता प्रोफेसर मिशेल रिहेल ने दावा किया था कि उन्होंने एक ऐसे मच्छर को विकसित किया है, जो इंसानों में मलेरिया फैलने से रोकेगा। इस मच्छर में जेनेटिक बदलाव किए गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इस मच्छर को पूरी तरह से सही रूप में लाने में एक दशक का समय लगेगा। मच्छर में परजीवी प्लाज्मोडियम से प्रतिरक्षा करने की क्षमता होगी, जिसकी वजह से वह संक्रमित नहीं होगा और इंसानों को भी संक्रमित कर मलेरिया नहीं फैलाएगा। वैज्ञानिकों ने कहा कि यह कोई जादू की गोली नहीं है, लेकिन यह नया टूल है। उन्होंने बताया कि हालांकि इससे पहले परजीवी के खिलाफ मच्छर में जेनेटिक बदलाव कर उसके प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के प्रयास में सफलता नहीं मिली थी।
वरदान साबित होगा
इंदौर के एमवाय अस्पताल के डीन डॉ. सलिल भार्गव ने बताया कि अभी मलेरिया जड़ से खत्म होने में ३ से २१ दिन का समय और ५० से ४०० रुपए तक की दवा का खर्च आता है। ऐसे में अमेरिकी वैज्ञानिकों का एक खुराक में मलेरिया खत्म करने का दावा दुनियाभर के लिए खुशी की बात है।
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