एफ-वन रेस
फॉर्मूला वन को आधिकारिक तौर पर फॉर्मूला वन वल्र्ड चैम्पियनशिप के नाम से जाना जाता है। फेडरेशन इंटरनेशनल डी ला'ऑटोमोबाइल के द्वारा स्वीकृत यह ऑटो रेसिंग का उच्चतम वर्ग है, जिसमें सिर्फ एक सीट होती है। एफ-१ के सीजन में रेस की कई श्रृंखला होती हैं, जिसे ग्रैंड्स प्रिक्स के रूप में जाना जाता है। रेस खास तौर पर बने सर्किट, पूर्व सार्वजनिक सड़कों और शहर की बंद सड़कों में आयोजित होती है। दो वार्षिक वल्र्ड चंैपियनशिप्स का निर्धारण करने के लिए प्रत्येक दौड़ के परिणामों को जोड़ा जाता है।
इसमें से एक चैम्पियनशिप ड्राइवरों के लिए और एक निर्माताओं के लिए होती है, जिसके साथ में ड्राइवर, निर्माता दल, ट्रैक अधिकारी, आयोजक और वे परिक्रमा स्थल भी शामिल होते हैं, जो वैध सुपर लाइसेंसों के आयोजकों के रूप में होने के लिए आवश्यक हैं। फॉर्मूला वन रेस में कारें 360 किमी प्रति घंटा की अधिकतम रफ्तार से चलती हैं। कारों का प्रदर्शन काफी हद तक इलेक्ट्रॉनिक्स, वायुगतिकी, निलंबन और पहियों पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है।
सामंजस्य है जरूरी
फार्मूला वन कार रेस मानव और मशीन की ताकत का बेजोड़ नमूना है। इस कार को बनाने में मानव संसाधनों का प्रयोग कर मशीन की मदद से एक ऐसी कार तैयार करता है, जिसके दीवाने दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं। फार्मूला वन कार ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग का बेहतरीन उदाहरण है। इस कार में लगे इंजन में २.४ लीटर का पॉवरप्लांट होता है, जो कि ७५० बीएचपी की शक्ति से कार को अधिकतम स्पीड दे सकता है। सामान्य कारों का इंजन एक लीटर में मात्र १०० बीएचपी की शक्ति ही इंजन को दे पाता है। इस कार का इंजन इतनी शक्ति देता है कि कार का पहिया १८,००० आरपीएम (राउंड प्रति मिनट) की गति से घूमता है। एक सामान्य कार में लगे इंजन में महज ६,००० आरपीएम की शक्ति होती है। एफ-१ कार का पिस्टन एक सेकंड में ३०० बार मूवमेंट करता है, जबकि सामान्य कारों का पिस्टन अधिकतम १०० बार ही मूवमेंट करता है।
यूरोप है केंद्र
फॉर्मूला वन रेस का केंद्र यूरोप है। आधे से अधिक फॉर्मूला वन रेस यहां आयोजित होती हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में खेल के क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है और ग्रैंड्स प्रिक्स का आयोजन दुनियाभर में होने लगा है। फॉर्मूला वन एक विशाल टेलीविजन कार्यक्रम है, जिसके कुल वैश्विक दर्शकों की संख्या 6,000 लाख प्रति रेस की है। यह दुनिया के सबसे महंगे आयोजनों में से एक है, लेकिन इसे अभी तक खेल का दर्जा नहीं दिया गया है। इस खेल के हाई प्रोफाइल होने और इसकी लोकप्रियता अधिक होने की वजह से एफ-वन के लिए आयोजक बहुत अधिक निवेश करते हैं।
रेस डायरेक्टर चार्ली
2010 में फॉर्मूला वन के रेस डायरेक्टर चार्ली व्हाइटिंग हैं। वह प्रत्येक ग्रैंड प्रिक्स के लिए रसद का प्रबंध करते हैं। रेस से पहले पार्क फेर्मे में कारों का निरीक्षण करते हैं। नियमों को लागू करते हैं और प्रत्येक रेस को शुरू करने वाली बत्तियों को नियंत्रित करते हैं। रेस अधिकारियों के प्रमुख होने के नाते वे टीमों और ड्राइवरों के बीच विवाद सुलझााने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। किसी भी पक्ष द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर दंड, जैसे दंडस्वरूप कार चलाना, रेस से पहले आरम्भ ग्रिड पर पदावनति, रेस अयोग्यता और जुर्माना लगाया जा सकता है।
१९२० से शुरुआत
फॉर्मूला वन श्रृंखला की शुरुआत 1920 और 1930 के दशक के यूरोपियन ग्रैंड प्रिक्स मोटर रेसिंग से हुई है। 'फॉर्मूला' नियमों का एक सेट है, जिसे सभी प्रतिभागियों और कारों को जरूर पूरा करना चाहिए। फॉर्मूला-वन 1946 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वीकृत एक नया 'फॉर्मूला' था, जिसके साथ उस वर्ष आयोजित होने वाले पहले गैर-चैम्पियनशिप रेसों का आयोजन किया गया था। पहली वल्र्ड चैम्पियनशिप रेस 1950 में यूके के सिल्वरस्टोन में हुई, उसके बाद 1958 में निर्माताओं के लिए चैम्पियनशिप की गई। गैर-चैम्पियनशिप फॉर्मूला वन का आयोजन कई सालों तक हुआ, लेकिन खर्च लगातार बढऩे के कारण इसकी अंतिम प्रतियोगिता 1983 में हुई।
२५ अंक यानी जीत
1950 के बाद से चैम्पियनशिप अंक प्रदान करने के लिए कई प्रणालियों का उपयोग किया जाता रहा है। 2010 के नियमों के अनुसार, शीर्ष दस कारों को अंकों से सम्मानित किया जाता है, विजेता को 25 अंक प्राप्त होते हैं। प्रत्येक रेस में हासिल किए गए अंकों की कुल संख्या को जोड़ा जाता है और सत्र के अंत में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले ड्राइवर और कंस्ट्रक्टर ही वल्र्ड चैम्पियन होते हैं। ड्राइवर सत्र के दौरान टीम बदल सकता है और पिछली टीम में मिले अंकों को अपने पास रख सकता है।
ऐसा होता है सर्किट सर्किट (रेस टैक के हिस्से को सर्किट कहते हैं) में सीधी सड़क होती है। इसकी शुरुआत में ग्रिड होता है। पिट लेन में रेस के दौरान ड्राइवर ईंधन भरने व टायरों को बदलवाने के लिए रुकते हैं। यहां टीम रेस से पहले कारों पर काम करती हैं। यह आरम्भ ग्रिड से आगे होती है। सर्किट के शेष हिस्से का ले-आउट अलग होता है। ज्यादातर सर्किट घड़ी की सुई की दिशा वाले होते हैं। घड़ी की उल्टी दिशा में जाने वाले सर्किटों से ड्राइवर को गर्दन की समस्या हो सकती है क्योंकि कारों द्वारा दिशा बदलने पर बहुत बल पैदा होता है, इससे ड्राइवर का सिर को विपरीत दिशा में खिंचने लगता है। आजकल इस्तेमाल हो रहे सर्किटों को विशेष रूप से प्रतियोगिता के लिए बनाया गया है। मोनैको, मेलबोर्न, वैलेंशिया और सिंगापुर के मौजूदा सड़क सर्किट अच्छे हैं।
कुछ खास बातें
* 1947 में पहली फॉर्मूला वन रेस का आयोजन किया गया था, जबकि 1950 तक वल्र्ड चैम्पियनशिप शुरू नहीं हो सकी थी।
* 1950 और 1960 के दशक में कई फॉर्मूला वन रेस हुईं, जिनकी गिनती वल्र्ड चैम्पियनशिप के रूप में नहीं की गई।
* 1950 में कुल २२ फॉर्मूला वन रेस हुईं, जिसमें से सिर्फ छह की गिनती वल्र्ड चैम्पियनशिप में हुई।
*1970 और 1980 के दशक में गैर-चैंपियनशिप प्रतियोगिताओं की संख्या में काफी कमी आई। बढ़ते खर्च की वजह से अंतिम गैर-चैम्पियनशिप फॉर्मूला वन रेस का आयोजन 1983 में किया गया।
* 1950 से 1960 तक इंडियानापोलिस 500 की गिनती वल्र्ड चंैपियनशिप के रूप में की गई थी। वल्र्ड चैंपियनशिप के नियमित ड्राइवरों में से केवल एक ड्राइवर, अल्बर्टो अस्कारी ने 1952 में इस अवधि के दौरान इंडियानापोलिस में प्रतिस्पर्धा की।
* 1952 से 1953 तक वल्र्ड चैंपियनशिप के रूप में गिनी जाने वाली सभी रेसों (इंडियानापोलिस 500 को छोड़कर) का संचालन फॉर्मूला टू के विनियमों के अनुसार हुआ था।
सेफ्टी कार से पीछे ही चलेंगी एफ-1
दुर्घटना की स्थिति में जिन प्रतियोगियों या ट्रैकसाइड रेस मार्शलों की सुरक्षा के लिए खतरा हो, रेस अधिकारी सेफ्टी कार तैनात करने का चुनाव कर सकते हैं। प्रभावस्वरूप यह रेस को निलंबित कर देते हंै और साथ में उन ड्राइवरों को भी जो रेस क्रम में अपनी गति पर ट्रैक के चारों तरफ सेफ्टी कार के पीछे-पीछे चलते हैं, जहां उससे आगे निकलने की अनुमति नहीं होती है। सेफ्टी कार तब तक चक्कर लगाती रहती है, जब तक खतरा समाप्त नहीं हो जाता है। उसके बाद रेस में इसके आने पर यह एक 'रोलिंग स्टार्ट' के साथ फिर से रेस शुरू करता है। सेफ्टी कार के तहत पिट स्टॉप की अनुमति है। वर्तमान में मर्सिडीज बेन्ज फॉर्मूला वन के लिए सेफ्टी कार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए मर्सिडीज एएमजी मॉडल की आपूर्ति करता है। वर्ष 2000 के बाद से मुख्य सेफ्टी कार ड्राइवर जर्मनी के पूर्व-रेसिंग ड्राइवर बर्न्ड मेलैंडर ही हैं।
इसलिए खास है एफ-वन
* एफ-वन कार की रफ्तार ३६० किमी प्रति घंटा होती है।
* एक एफ-१ कार में ८०,००० कलपुर्जों को ९९.९ फीसदी तक सही तरीके से फिट किया जाता है, लेकिन रेस के समय कार के स्टार्ट होते ही ८० पुर्जे बेकार हो जाते हैं। वहीं सामान्य कार में करीब ३,००० कलपुर्जे होते हैं।
* ५५० किलो की एफ-१ कार ० से १६० केपीएच की रफ्तार हासिल करने में मात्र चार सेकंड लेती है।
* कार में लगा इंजन रेस के दौरान महज दो घंटों में ही अपना जीवन काल पूरा कर लेता है। वहीं, एक सामान्य कार का इंजन करीब २० साल तक चलता है।
* एक अनुमान के मुताबिक एक एफ-१ रेस में कार के ड्राइवर का वजन लगभग चार किलोग्राम तक कम हो जाता है। ऐसा ब्रेक लगने और देर तक जबरदस्त गुरुत्वाकर्षण बल व तापमान के कारण होता है।
* मोनाको ग्रैंड प्रिक्स जैसे स्ट्रीट कोर्स रेस में रफ्तार इतनी तेज होती है कि रोड में लगे मेनहोल के ढक्कन खिंचाव के कारण निकल जाते हैं। इस कारण रेस के समय ढक्कनों में नीचे की ओर से वेल्डिंग कर दी जाती है।
* एफ-१ कार के टायर ९० से १२० किमी ही चलते हैं, जबकि सामान्य टायर ६० हजार से एक लाख किमी तक चलते हैं।
मौत की रेस
एफ-वन कार रेस में खतरे कम नहीं हैं। रफ्तार के कारण नियंत्रण खोने और एक्सीडेंट्स की घटनाएं आम हैं। कई खिलाडिय़ों का करियर इस रेस ने खत्म कर दिया। जानते हैं कितनी जानें ले चुकी है यह रेस।
वर्ष १९५० : १५ मौतें
वर्ष १९६० : १२ मौतें
वर्ष १९७० : १० मौतें
वर्ष १९८० : ०४ मौतें
वर्ष १९९४ : ०२ मौतें

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