आने वाले कुछ समय में मलेरिया से पीडि़त मरीजों को जल्द राहत मिलेगी। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दवा का निर्माण किया है, जिसकी मात्र एक खुराक से ही मरीज को मलेरिया से मुक्ति मिल जाएगी। इस बारे में अमेरिका के यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है कि उन्होंने एक खुराक में ही मलेरिया के मरीज को ठीक करने वाली दवा का निर्माण किया है। ऐसे में चिकित्सा जगत से जुड़े विशेषज्ञ भी इस दवा को लेकर खासे उत्साहित नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि मलेरिया को कारण जानते हुए भी हम उससे जूझा रहे हैं। ऐसे में अगर यह दवा बन जाती है तो हजारों जिदंगियों को बचाया जा सकता है। मलेरिया रात में काटने वाले मच्छरों से फैलता है। ये मच्छर रात में मनुष्य को काटकर अपने अंदर मौजूद परजीवी को मनुष्य के शरीर में छोड़ देते हैं, जिससे मनुष्य संक्रमित हो जाता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने इस दवा का निर्माण किया है, जो मलेरिया फैलाने वाले दो मुख्य परजीवी पर प्रभावकारी होगी।
इसका नाम एनआईटीडी६०९ है। वैज्ञानिकों ने इस दवा का प्रयोग चूहों पर किया है जिसमें यह नतीजा निकला कि इसकी एक खुराक ही मलेरिया के संक्रमण को ठीक करने के लिए काफी है। उन्हें उम्मीद है कि यह दवा मनुष्य पर भी इसी प्रकार से कारगर साबित होगी। मलेरिया एक ऐसी बीमारी है, जिसकी दवा मंहगी होने के साथ ही इसका उपचार लंबे समय तक करना पड़ता है। वर्तमान में मलेरिया की जो दवाएं उपलब्ध हंै, उसे दिनभर में एक से चार बार लेना पड़ता है और यह इलाज लगभग एक हफ्ते से अधिक ही चलता है। एनआईटीडी६०९ दरअसल एक कृत्रिम मलेरिया रोधी अणु है, जिसको दवा के रूप में बनाना आसान है। साथ ही इसका निर्माण बड़े पैमाने पर भी किया जा सकता है। टीम की एक सदस्य एलिजाबेथ विनजेलर के अनुसार वर्तमान में मलेरिया रोधी दवाओं की तुलना में एनआईटीडी६०९ की संरचना और रासायनिक गुण अलग हैं। हमें शुरुआत से ही उम्मीद है कि यह जरूर कारगर साबित होगी। यह कारगर साबित होती है तो जहां मलेरिया के अधिक मामले होते हैं, वहां के लिए यह एक वरदान साबित होगा।
क्या है मलेरिया
मलेरिया एक प्रकार के मच्छरों द्वारा फैलने वाला संक्रामक रोग है, जो प्रोटोजोआ परजीवी द्वारा फैलता है। यह संक्रमण मुख्य रूप से अमेरिका (२२ देशों), एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों के उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में फैला हुआ है। मलेरिया को आमतौर पर गरीबी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह खुद अपने आप में गरीबी का कारण है। साथ ही आर्थिक विकास का प्रमुख अवरोधक भी है। मलेरिया प्लाज्मोडियमगण के प्रोटोजोआ परजीवी के माध्यम से फैलता है। केवल चार प्रकार के प्लाज्मोडियम परजीवी मनुष्य को प्रभावित करते हैं। इसमें सबसे खतरनाक प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम और प्लाज्मोडियम विवैक्स माने जाते हैं, साथ ही प्लाज्मोडियम ओवेल तथा प्लाज्मोडियम मलेरिए भी मानव को प्रभावित करते हैं। इन सारे समूह को 'मलेरिया परजीवी' कहते हैं।
खतरनाक है यह
मादा एनाफिलीज मच्छर मलेरिया के परजीवियों को फैलाते हैं। इसके काटने पर मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर अपनी संख्या बढ़ाते हैं। इससे रक्तहीनता (एनीमिया) के लक्षण उभरते हैं, जैसे- चक्कर आना, सांस फूलना आदि। इसके अलावा अविशिष्ट लक्षण जैसे कि बुखार, सर्दी, उबकाई और जुकाम भी होता है। गंभीर मामलों में मरीज बेहोश हो जाता है और उसकी मृत्यु भी हो सकती है।
हजारों साल से प्रभावी
मलेरिया संभवत: सबसे पुरानी बीमारियों में से एक है। यह मानव को 50 हजार वर्षों से प्रभावित कर रही है। इस बीमारी का सबसे पुराना वर्णन चीन में 2700 ईसा पूर्व का मिलता है। मलेरिया शब्द की उत्पत्ति मध्यकालीन इटालियन भाषा के शब्द माला एरिया से हुई है, जिनका अर्थ है 'बुरी हवा'। इसे दलदली बुखार (मार्श फीवर) भी कहा जाता था, क्योंकि यह दलदली क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैलता था।
हुए हैं अध्ययन
मलेरिया पर पहले अध्ययन 1880 में फ्रांसीसी सैन्य चिकित्सक चाल्र्स लुई अल्फोंस लैवेरन ने किया था। उन्होंने अल्जीरिया में काम करते हुए पहली बार लाल रक्त कोशिका के अंदर परजीवी को देखा था। उन्हें इस खोज और अन्य खोज के लिए 1907 का चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार दिया गया। क्यूबाई चिकित्सक कार्लोस फिनले ने पीत ज्वर का इलाज करते हुए पहली बार दावा किया कि मच्छर इस रोग को एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक फैलाते हैं। इसकी पुष्टि ब्रिटेन के सर रोनाल्ड रॉस ने सिकंदराबाद में काम करते हुए 1898 में की। उन्होंने मच्छरों की विशेष जातियों से पक्षियों को कटवाकर उन मच्छरों की लार ग्रंथियों से परजीवी अलग करके दिखाया, जिन्हे उन्होंने संक्रमित पक्षियों में पाला था। इसके लिए उन्हें 1902 में चिकित्सा का नोबेल मिला।
ऐसे होगा नियंत्रण
मलेरिया का प्रसार मानव जनसंख्या घनत्व, मच्छरों की संख्या, मच्छरों से मनुष्यों तक प्रसार और मनुष्यों से मच्छरों तक प्रसार पर निर्भर करता है। इनमें से किसी एक को भी कम करके मलेरिया को मिटाया जा सकता है। इसीलिए मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में रोग का प्रसार रोकने के लिए दवाओं के साथ ही मच्छरों को खत्म करने या उनके काटने से बचने के उपाय किए जाते हैं। मच्छरों के प्रजनन स्थलों को नष्ट करके मलेरिया पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। मच्छर पानी में प्रजनन करते हैं, ऐसे में खुले पानी की जगहों को ढक कर रखें, उसे सुखा दें या पानी बहा दें, पानी की सतह पर तेल डाल दें, जिससे मच्छरों के लार्वा सांस न ले पाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में छिड़काव के लिए लगभग 12 दवाओं को मान्यता दी है। इनमें डीडीटी के अलावा परमैथ्रिन और डेल्टामैथ्रिन जैसी दवाएं शामिल हैं, खासकर उन क्षेत्रों मे जहां मच्छर डीडीटी के प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके हैं।
दवाओं का प्रयास
मलेरिया के लिए टीके विकसित करने के लिए पहली बार प्रयास 1967 में चूहे पर किया गया। इसकी सफलता की दर 60 प्रतिशत थी। एसपीएफ66 पहला टीका था, जिसका क्षेत्र परीक्षण हुआ। यह शुरू में सफल रहा, लेकिन बाद में सफलता की दर ३० प्रतिशत से नीचे आ गई। आज आरटीएस, एसएएस02ए टीका परीक्षणों में सबसे आगे के स्तर पर है। पी. फैल्सीपेरम के जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नई दवाओं और टीकों को विकसित करने तथा उनका परीक्षण करने में आसानी होगी।
इसलिए है महामारी
विश्वभर में हर साल साढ़े तीन से पांच करोड़ लोग मलेरिया की चपेट में आते हैं। इनमें करीब ३० लाख लोगों की हर साल मौत होती है। इसका सबसे अधिक प्रकोप अफ्रीका के सबसहारा क्षेत्र में है। मलेरिया से होने वाली ९० फीसदी मौतें इसी क्षेत्र में होती हैं। पिछले कई दशकों से वैज्ञानिकों के सामने इसके लिए सस्ती और आसानी से हर जगह मिल सकने वाली दवा का निर्माण एक चुनौती बना हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक हर ३० सेकंड में एक अफ्रीकी बच्चे की मौत मलेरिया के कारण होती है।
बना जेनेटिक मच्छर
कुछ दिनों पूर्व एरीजुआना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता प्रोफेसर मिशेल रिहेल ने दावा किया था कि उन्होंने एक ऐसे मच्छर को विकसित किया है, जो इंसानों में मलेरिया फैलने से रोकेगा। इस मच्छर में जेनेटिक बदलाव किए गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इस मच्छर को पूरी तरह से सही रूप में लाने में एक दशक का समय लगेगा। मच्छर में परजीवी प्लाज्मोडियम से प्रतिरक्षा करने की क्षमता होगी, जिसकी वजह से वह संक्रमित नहीं होगा और इंसानों को भी संक्रमित कर मलेरिया नहीं फैलाएगा। वैज्ञानिकों ने कहा कि यह कोई जादू की गोली नहीं है, लेकिन यह नया टूल है। उन्होंने बताया कि हालांकि इससे पहले परजीवी के खिलाफ मच्छर में जेनेटिक बदलाव कर उसके प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के प्रयास में सफलता नहीं मिली थी।
वरदान साबित होगा
इंदौर के एमवाय अस्पताल के डीन डॉ. सलिल भार्गव ने बताया कि अभी मलेरिया जड़ से खत्म होने में ३ से २१ दिन का समय और ५० से ४०० रुपए तक की दवा का खर्च आता है। ऐसे में अमेरिकी वैज्ञानिकों का एक खुराक में मलेरिया खत्म करने का दावा दुनियाभर के लिए खुशी की बात है।
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