
कनाडा के एक पार्क में पतंग उड़ाने पर पाबंदी लगा दी गई है। यहां पतंग उड़ाने के दौरान लोगों के घायल हो जाने की कुछ घटनाओं के बाद पतंगबाजी को प्रतिबंधित करने का फैसला किया गया। टोरंटो के पार्क प्राधिकरण के प्रमुख ब्रेंडा पैटर्सन का कहना है कि समस्या पतंग उड़ाने के लिए इस्तेमाल होने वाले धागे को लेकर है। पतंग उड़ाने वाला धागा नायलॉन का होता है, जिस पर शीशा चढ़ा होता है। इन धागों का उद्देश्य एक दूसरे को काटना होता है।
पतंगों पर ये पाबंदी कुछ ऐसी घटनाओं के बाद लगाई गई है, जिसमें एक बार किसी का कान पतंग के धागे से कट गया था। उधर, आपत्ति के बाद अब यह कहा जा रहा है कि कोई ऐसा स्थान तय कर दिया जाए, जहां पतंगबाजी की जा सके। मनोरंजन के बढ़ते साधनों और समय की कमी के कारण बहुत से लोगों ने पतंगबाजी से किनारा कर लिया है, ऐसे में पतंगबाजी पर प्रतिबंध लगाने से बचे-खुचे लोग भी इसे छोड़ देंगे और पतंग इतिहास बन जाएगी।
चीन में सबसे पहले
पतंग के आविष्कार के बारे में कहा जाता है कि इसे ईसा पूर्व तीसरी सदी में चीन में बनाया गया था यानी पतंग आज से करीब 2,300 वर्ष पहले आसमान में पहली बार उड़ी थी। सबसे पहली पतंग बनाने का श्रेय चीनी दार्शनिक 'मो दी' को जाता है। पतंग बनाने के लिए जरूरी सामान जैसे रेशम का कपड़ा, पतंग उड़ाने के लिये मजबूत रेशम का धागा और पतंग के आकार को सहारा देने वाला हल्का और मजबूत बांस सभी चीन में मौजूद था। चीन के बाद जापान, कोरिया, थाईलैंड, बर्मा, भारत, अरब, उत्तर अफ्रीका से होते हुए यूरोप का आसमान भी पतंगों से पट गया।
संस्कृतियों में पतंग
हवा में अठखेलियां करता धागा और पतंग अपने 2,३00 वर्ष से अधिक पुराने इतिहास में अनेक मान्यताओं, अंधविश्वासों और अनूठे प्रयोगों का गवाह रहा है। अपनी अलग-अलग संरचना और पंखों पर वर्चस्व की आशाओं का बोझा लेकर उड़ती पतंग ने अपने अलग-अलग रूपों में दुनिया को रोमांचक खेल का माध्यम दिया। इसके साथ ही यह एक शौक के रूप में दुनिया की कई सभ्यताओं और संस्कृतियों में भी रच-बस गई।
यूरोप में पतंगबाजी
यूरोप में पतंग उड़ाने का चलन नाविक मार्को पोलो ने शुरू किया। मार्को अपनी पहले की यात्राओं के दौरान मिले पतंग के कौशल को यूरोप में लाया। इसके बाद यूरोप और अमेरिका के निवासियों ने वैज्ञानिक और सैन्य उद्देश्यों के लिए पतंग का प्रयोग किया। ब्रिटेन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर नीडहम ने अपनी 'ए हिस्ट्री आफ चाइनाज साइंस एंड टेक्नोलॉजी' किताब में पतंग को चीन की ओर से यूरोप को दी गई प्रमुख वैज्ञानिक खोज बताया। कहा जा सकता है कि पतंग को देखकर ही इंसानों में उडऩे की ललक जगी और इसके लिए शोध का दौर शुरू हुआ, और विमान बने।
पतन की ओर पतंगबाजी
एक समय में मनोरंजन के प्रमुख साधनों में से एक पतंगबाजी का शौक अब धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। लोगों के पास समय की कमी है तो वहीं कांक्रीट के जंगलों ने पतंगबाजी के लिए खुली जगहों को नहीं छोड़ा है। ऐसे में पतंगबाजी की कला अब इतिहास में सिमटने को तैयार है। अब तो केवल कुछ विशेष दिनों और पतंगोत्सवों में ही पतंगे आसमान में कलाबाजियां करती दिखती हैं।
जुड़े हैं अंधविश्वास भी
आसमान में उडऩे की मनुष्य की आकांक्षाओं को बल पतंग से ही मिला। डोर के सहारे आसमान में अटखेलियां करती पतंग के साथ ही में कई अंधविश्वास, मान्यताएं और परंपराएं भी गुपचुप शामिल हो गईं। प्राचीन दंतकथाओं के अनुसार, चीन और जापान में पतंगों का उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिये भी किया जाता था। चीन में किंग राजवंश के शासन के दौरान उड़ती पतंग को यूं ही छोड़ देना दुर्भाग्य और बीमारी को न्यौता देने के समान माना जाता था। कोरिया में पतंग पर बच्चे का नाम और उसके जन्म की तिथि लिखकर उड़ाया जाता था, ताकि उस वर्ष उस बच्चे से जुड़ा दुर्भाग्य पतंग के साथ ही उड़ जाए। थाईलैंड में पतंग धार्मिक आस्थाओं के प्रदर्शन का माध्यम भी रह चुकी है। थाईलैंड में हर राजा की अपनी विशेष पतंग होती थी, जिसे जाड़े के मौसम में भिखारी और पुरोहित देश में शांति और खुशहाली की आशा में उड़ाते थे। थाइलैंड के लोग भी अपनी प्रार्थनाओं को भगवान तक पहुंचाने के लिए बारिश के मौसम में पतंग उड़ाते थे।
भारत में पतंगबाजी
पतंग उड़ाने का शौक चीन, कोरिया और थाईलैंड समेत दुनिया के कई अन्य देशों से होकर भारत पहुंचा। देखते ही देखते यह शौक भारत में एक शगल बनकर यहां की संस्कृति और सभ्यता में रच-बस गया। जब भारत में पतंग आई उस वक्त मनोरंजन के अन्य साधन नहीं हुआ करते थे। ऐसे में मनोरंजन की कमी को पूरा करते हुए पतंगबाजी ने लोगों के बीच खासी जगह बना ली। पतंगबाजी का शौक बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी के सिर चढ़कर बोलने लगा। धीरे-धीरे पतंगबाजी भारत में इतनी लोकप्रिय हुई कि कई कवियों ने पतंग पर कविताएं लिख डालीं। दुनिया के कई देशों में 27 नवंबर को फ्लाई ए काइट डे के रूप में मनाते हैं। राजस्थान में पर्यटन विभाग की ओर से प्रतिवर्ष तीन दिवसीय पतंगबाजी प्रतियोगिता होती है। राज्य में हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन परंपरागत रूप से पतंगबाजी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इसमें राज्य के पूर्व दरबारी पतंगबाजों के साथ ही विदेशी पतंगबाज भी भाग लेते हैं। इसके अलावा दिल्ली और लखनऊ में पतंगबाजी के प्रति खासा आकर्षण है। दीपावली के अगले दिन जमघट के दौरान तो आसमान में पतंगों की कलाबाजियां देखते ही बनती हैं। दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भी पतंग उड़ाने का चलन है। इसके अलावा गुजरात सरकार हर वर्ष १४ जनवरी को तीन दिवसीय पतंगों का अंतरराष्ट्रीय त्योहार मनाती है, जिसमें देश-दुनिया के जाने-माने पतंगबाज अपनी अद्भुत डिजाइन वाली पतगों को आसमान में उड़ाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। इसके अलावा बिहार, झाारखंड, पश्चिम बंगाल, पंजाब और उत्तर प्रदेश में पंतगबाजी होती है। इन राज्यों में लखनऊ, अहमदाबाद, वरोदड़ा, जयपुर, धनबाद, वाराणसी, हैदराबाद में जबरदस्त पतंगबाजी होती है।
इतिहास की तारीख में पतंगों की भूमिका
200 बीसी -- ह्यूनत्सांग ने चीन के हान राजवंश के पतन के लिऊ पांग की सेना को रास्ता दिखाने के लिए रात में पतंग उड़ाई थी।
100 बीसी से 500 एडी-- सिग्नल भेजने और दुश्मन के कैंप की दूरी की जानकारी लेने के लिए आर्मी जनरल पतंगों का प्रयोग करते थे।
930 एडी -- जापानी साहित्य में शिरोशी शब्द का प्रयोग मिलता है, इसमें शि का अर्थ कागज से और रोशी का अर्थ चीनी पक्षी से है।
960 - 1126 एडी -- चीन में पतंगबाजी लोगों के बीच मनोरंजन का प्रमुख साधन बन गई। यहां लोग नवें महीने के नवें दिन बुराई से छुटकारे को पतंग उड़ाते थे।
1542 एडी -- पहली बार भारतीय साहित्य में पतंग शब्द का उल्लेख किया गया। मधुमालती में इसके लिए मंजन का प्रयोग किया गया, जहां कवि ने एक प्रेमी के प्यार को पतंग के जरिए प्रदर्शित किया।
1752 एडी -- बेंजामिन फ्रैंकमिन ने पतंग उड़ाकर यह साबित किया कि आसमान में चमकने वाली बिजली वैसी ही होती है, जैसी बिजली उत्पादित करने से मिलती है। इसके लिए उन्होंने सिल्क के चारों ओर लकड़ी की स्टिक लगाई और उसे एक धातु के तार से जोड़ दिया। जब बिजली वाले बादल पतंग के ऊपर से गुजरे तो बिजली पतले तार के जरिए नीचे आ गई।
1870 एडी -- ऑस्ट्रेलियाई खोजकर्ता लॉरेंस हॉर्गेव ने एक बॉक्स काइट बनाई, जिसकी स्थिरता ने दूसरे बिजली से चलने वाले हवाई जहाजों को बनाने की प्रेरणा दी।
1896 एडी -- एलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने तीन तीलियां जोड़कर 'टेट्रा' आकार की डिजाइन बनाई। उन्होंने २५६ सेल की फ्रोस्ट किंग पतंग को उड़ाया। बाद में उन्होंने इसे बेहतर करते हुए १,३०० सेल और ३,३९३ सेलों का बनाया। अब तक सैमुअल कोडी इंसान को लेकर उडऩे वाले ग्लाइडर्स पर प्रयोग कर रहे थे।
1902 एडी -- कोडी के समकालीन राइट ब्रदर्स ने हवा में उडऩे वाले विमान को बनाने में सफलता हासिल कर ली। तब से ही विमानन के युग की शुरुआत हुई।
1 comment:
अच्छी जानकारी है ......
(आजकल तो मौत भी झूट बोलती है ....)
http://oshotheone.blogspot.com
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