तात्कालिक कारण से नहीं फैली असम की हिंसा
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| हिंसा में अभी तक ४४ लोगों की मौत हो चुकी है। दो लाख से अधिक लोगों के विस्थापित हुए हैं। |
इन दोनों संगठनों की जो बात बोड़ो संगठनों को नागवार गुजर रही थी वह थी बीटीसी इलाके के जिन गांवों में बोड़ो समुदाय की आबादी आधी से कम है उन गांवों को बीटीसी से बाहर करने की मांग करना। अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग को विरोध तो वे लोग पहले से ही कर ही रहे थे। इस मांग के समर्थन में ये दोनों संगठन समय-समय पर प्रदर्शन और बंद का आह्वान करते रहे हैं। गैर-बोड़ो समुदायों ने 16 जुलाई को भी गुवाहाटी में राजभवन के सामने प्रदर्शन किया। तो उधर बोड़ोलैंड की मांग का समर्थन करने वाले संगठन भी पिछले कुछ महीनों से सक्रिय दिख रहे हैं। हाल ही में इन लोगों ने रेलगाडिय़ों को रोककर यह जताने का प्रयास किया था कि उन लोगों ने बोड़ोलैंड राज्य की मांग अभी तक छोड़ी नहीं है। बोड़ो समुदाय के दो चरमपंथी गुट नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोड़ोलैंड (एनडीएफबी) वार्तापंथी और इसी संगठन का वार्ता-विरोधी गुट भी अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग रहे हैं।
असम के जनजातीय इलाकों में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि गैर-जनजातीय समुदाय खुलकर जनजातीय आबादी के खिलाफ मुखर हो जाएं। इसकी शुरुआत हुई थी एक अन्य इलाके में, जहां राभा जनजाति अपने लिए स्वायत्तता की मांग कर रही है। वहां रहने वाले कई गैर-राभा समुदायों ने उनकी इस मांग के विरोध में आंदोलन छेड़ दिया। इस तरह वहां दो समुदायों के आमने-सामने आ खड़े होने की यह पहली घटना थी और इसके कारण वहां समय-समय पर हिंसा भी फैलती रही है। बीटीसी इलाके में गैर-बोड़ो समुदायों के गुस्से के फटने का एक प्रमुख कारण शायद यह है कि वहां स्वायत्तशासन लागू होने के बाद से कानून और व्यवस्था की स्थिति पहले से बदतर हुई है।
- रिपोर्ट : शशांक शेखर
shashank shekhar

1 comment:
असम हिंसा के पीछे मुख्य कारण वहां बंगलादेशियो की बढती जनसँख्या ही है ,जिसका परिणाम समय समय पर बोडो और मुस्लिम बांग्लादेशियों के बीच होने वाले हिंसक संघर्ष के रूप में सामने आता है ...!
कांग्रेस सरकारों का इस अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर चुप्पी साध लेना ,बोडो आदिवासियों का असंतोष दिन ब दिन बढाता ही जा रहा है..
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