Saturday, September 8, 2012

सड़ रही है चमड़ी, जारी है आंदोलन

            सड़ रही है चमड़ी, जारी है आंदोलन 
मध्य प्रदेश के खंडवा में ग्रामीणों और आदिवासियों का जल सत्याग्रह आंदोलन जारी है। पानी के अंदर रहने से लोगों की चमड़ी सफेद पडऩे लगी है। इतनी बहरी तो वो गोरी चमड़ी वाली सरकार भी नहीं थी, जिसके खिलाफ भारत एक हो गया था। खैर, बात यहां जल सत्याग्रह की हो रही है। लोग १५ दिनों से पानी के बीच बैठे हैं। पानी का स्तर उठते हुए लोगों के ठोढ़ी तक पहुंच गया है। सड़ रही देह में फोड़े निकल रहे हैं। फिर भी लोग पानी के नीचे बैठे हैं। मांग है ओंकारेश्वर बांध में पानी का स्तर न बढ़ाया जाए। अब जाकर राज्य सरकार ने अपने दो मंत्रियों कैलाश विजयवर्गीय और विजय शाह को जल सत्याग्रह कर रहे लोगों से बातचीत करने को कहा है। ध्यान दीजिए पानी में १५ दिनों से रह रहे लोगों की मुश्किल को दूर करने की बजाय मामला अभी सिर्फ बातचीत करने तक पहुंचा है।
४० हजार लोग होंगे विस्थापित 
खंडवा के घोघल गांव में करीब 51 लोग डूबे हुए राज्य सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं। सरकार ओंकारेश्वर बांध में जल स्तर 193 मीटर तक बढा़ए जाने को मंजूरी दे चुकी है। बांध का जल स्तर पहले 189 मीटर तक था। यदि जल स्तर १९३ मीटर तक बढ़ा दिया गया तो करीब ३० से अधिक गांव पूरी या आंशिंक रूप से डूब जाएंगे। इसका सीधा असर करीब चार हजार से अधिक परिवारों पर पड़ेगा, जिन्हें विस्थापित होना पड़ेगा।
२५० गांव के लोग समर्थन में 
सरकार ने संकेत दिया है कि पानी की ऊंचाई एक बार में नहीं बढ़ाई जाएगी। फिलहाल इसे डेढ़ मीटर बढ़ाए जाने से ही कई गांवों पर डूबने की कगार पर आ गए हैं। विरोध में तीन हजार लोग नदी के किनारे बैठकर धरना दे रहे हैं। आसपास के 250 गांव के लोग भी आंदोलन के समर्थन में सामने आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक पुर्नवास की पूरी व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक बांध का जलस्तर नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। इसके समर्थन में ग्रामीण कोर्ट के आदेश का हवाला दे रहे हैं। जिसमें कहा गया है कि बांध का जल स्तर १८९ मीटर से ऊपर नहीं किया जा सकता। यदि पानी का स्तर बढ़ाना है और लोगों के विस्थापन की स्थिति बनती है तो इससे छह महीने पहले स्थानीय लोगों के पुर्नवास की व्यवस्था करानी होगी। 
मेधा पाटकर कर चुकी हैं विरोध
नर्मदा नदी पर बांध बनाने के विरोध का इतिहास ८० के दशक से शुरू होता है। बिजली और सिंचाई की कमी को दूर करने के लिए नर्मदा घाटी विकास योजना की रूपरेखा बनाई गई थी। इसके तहत 1,312 किमी लंबी नर्मदा पर 30 बड़े, 135 मध्यम और 3,000 छोटे बांध बनाए जाने थे। नर्मदा पर बनने वाले बांधों में से सरदार सरोवर और इंदिरा सागर बांध सबसे बड़े बांधों में से एक हैं। इसमें से सरदार सरोवर बांध के निर्माण पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ था, जिसका नेतृत्व मेधा पाटकर ने कई बार किया। नर्मदा हाइड्रोइलेक्ट्रिक डेवलपमेंट कार्पोरेशन जब ओंकारेश्वर प्रोजेक्ट का निर्माण कर रहा था तब राज्य सरकार ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया था कि इससे उनकी आजीविका प्रभावित नहीं होगी। ५२० मेगावॉट क्षमता के इस बांध का निर्माण २००७ में पूरा हुआ। मगर, स्थानीय लोगों का कहना है कि इसकी क्षतिपूर्ति के लिए अभी तक न तो लोगों की पहचान की गई है और न ही किसी को कोई मुआवजा दिया गया है। 

shashank shekhar bajpai

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