शशांक शेखर बाजपेई।
दीपावली पर मां लक्ष्मी का पूजन अकेले नहीं किया जाना चाहिए। उनके साथ भगवान विष्णु का भी पूजन करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मीजी के साथ शालिग्राम रखकर उनका पूजन करके उन्हें धन स्थान पर स्थापित करने से घर में कभी कोई परेशानी न
हीं होती है।
शालिग्राम पूजन इसलिए
कहा जाता है कि एक समय पराक्रमी असुर जलंधर का विवाह वृंदा से हुआ, जो भगवान विष्णु की भक्त थी। उसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था। उसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। अपनी शक्ित के अभिमान में जलंधर देवताओं, अप्सराओं को परेशान करने लगा।
दु:खी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे। तब भगवान विष्णु जलांधर का रूप धारण कर छल से वृंदा का पतिव्रत धर्म नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वह युद्ध में मारा गया।
वृंदा ने दिया था शाप
जब वृंदा को इस छल का पता चला, तो उसने विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं के अनुरोध करने पर वृंदा ने शाप वापस ले लिया। मगर, भगवान विष्णु भी वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे। इसलिए उन्होंने पत्थर में अपना एक रूप प्रकट किया, जिसे शालिग्राम कहा गया।
अगले जन्म में तुलसी बनीं वृंदा
भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि अगले जन्म में तुम तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे सिर पर होगा। तुम्हारे बिना मैं भोजन ग्रहण नहीं करूंगा।
यही कारण है कि भगवान विष्णु के भोग में प्रसाद में तुलसी को जरूर रखा जाता है। इस घटनाक्रम के पटाक्षेप होने के बाद जलंधर के साथ वृंदा सती हो गई। उनकी राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया।
तो नहीं होती कोई परेशानी
मान्यता है कि भगवान विष्णु और तुलसी का जिस जगह पर होते हैं, वहां कोई दुख और परेशानी नहीं आती। नारायण स्वरूप यही शालिग्राम शिलाएं इन पर बनने वाले चक्र के आधार पर विष्णु के अलग-अलग रूप व अवतारों के नाम वाली होती हैं।
नेपाल में मिलते हैं शालिग्राम
शालिग्राम नेपाल के मुक्तिनाथ के पास काली गण्डकी नदी के तट पर पाए जाते हैं। शालिग्राम काले रंग के पत्थर रूप में ही मिलते हैं, लेकिन सफेद और नीले शालिग्राम को भी पूजा जाता है। शालिग्राम पर चक्र भी होते हैं, जिन्हें सुदर्शन चक्र कहा जाता है।
ऐसे करनी चाहिए पूजा
दिवाली के दिन घर में शालिग्राम की स्थापना करें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करते हुए पंचामृत से स्नान करवाएं उसके बाद भगवान का पंचोपचार पूजन करें। इसमें गंध, पुष्प, धूप, दीप और तुलसी के साथ नैवेद्य को शामिल करें। शालिग्राम की पूजा में तुलसी का महत्व अहम है क्योंकि बिना तुलसी के शालिग्राम की पूजा करने पर दोष लगता है।
उज्जैन की पंडित रश्िम शर्मा से बातचीत के आधार पर
दीपावली पर मां लक्ष्मी का पूजन अकेले नहीं किया जाना चाहिए। उनके साथ भगवान विष्णु का भी पूजन करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मीजी के साथ शालिग्राम रखकर उनका पूजन करके उन्हें धन स्थान पर स्थापित करने से घर में कभी कोई परेशानी नहीं होती है।
शालिग्राम पूजन इसलिए
कहा जाता है कि एक समय पराक्रमी असुर जलंधर का विवाह वृंदा से हुआ, जो भगवान विष्णु की भक्त थी। उसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था। उसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। अपनी शक्ित के अभिमान में जलंधर देवताओं, अप्सराओं को परेशान करने लगा।
दु:खी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे। तब भगवान विष्णु जलांधर का रूप धारण कर छल से वृंदा का पतिव्रत धर्म नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वह युद्ध में मारा गया।
वृंदा ने दिया था शाप
जब वृंदा को इस छल का पता चला, तो उसने विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं के अनुरोध करने पर वृंदा ने शाप वापस ले लिया। मगर, भगवान विष्णु भी वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे। इसलिए उन्होंने पत्थर में अपना एक रूप प्रकट किया, जिसे शालिग्राम कहा गया।
अगले जन्म में तुलसी बनीं वृंदा
भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि अगले जन्म में तुम तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे सिर पर होगा। तुम्हारे बिना मैं भोजन ग्रहण नहीं करूंगा।
यही कारण है कि भगवान विष्णु के भोग में प्रसाद में तुलसी को जरूर रखा जाता है। इस घटनाक्रम के पटाक्षेप होने के बाद जलंधर के साथ वृंदा सती हो गई। उनकी राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया।
तो नहीं होती कोई परेशानी
मान्यता है कि भगवान विष्णु और तुलसी का जिस जगह पर होते हैं, वहां कोई दुख और परेशानी नहीं आती। नारायण स्वरूप यही शालिग्राम शिलाएं इन पर बनने वाले चक्र के आधार पर विष्णु के अलग-अलग रूप व अवतारों के नाम वाली होती हैं।
नेपाल में मिलते हैं शालिग्राम
शालिग्राम नेपाल के मुक्तिनाथ के पास काली गण्डकी नदी के तट पर पाए जाते हैं। शालिग्राम काले रंग के पत्थर रूप में ही मिलते हैं, लेकिन सफेद और नीले शालिग्राम को भी पूजा जाता है। शालिग्राम पर चक्र भी होते हैं, जिन्हें सुदर्शन चक्र कहा जाता है।
ऐसे करनी चाहिए पूजा
दिवाली के दिन घर में शालिग्राम की स्थापना करें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करते हुए पंचामृत से स्नान करवाएं उसके बाद भगवान का पंचोपचार पूजन करें। इसमें गंध, पुष्प, धूप, दीप और तुलसी के साथ नैवेद्य को शामिल करें। शालिग्राम की पूजा में तुलसी का महत्व अहम है क्योंकि बिना तुलसी के शालिग्राम की पूजा करने पर दोष लगता है।
उज्जैन की पंडित रश्िम शर्मा से बातचीत के आधार पर
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