शशांक शेखर बाजपेई।
ग्रीस संकट क्या है और वह कैसे इस स्थिति में पहुंच गया कि उसकी अर्थव्यवस्था ही दीवालिया होने की कगार पर पहुंच गई। यह जानने के लिए थोड़ा पीछे चलना होगा। वर्ष 2004-09 के दौरान सत्ता संभालने वाली दक्षिणपंथी रुझान वाली मध्यमार्गी सरकार ने जर्मनी सहित कई देशों की बैंकों से बहुत कर्ज लिया। ग्रीस सरकार अपनी कमाई से अधिक राशि कर्ज के भुगतान पर खर्च कर रही है। मगर, इस मामले पर कोई चर्चा नहीं हो रही है।माना जा रहा था कि यूरो संकट टलने के बाद से एथेंस को जो कर्ज मुहैया कराया जा रहा है, वह उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है। लेकिन इस कर्ज का बड़ा हिस्सा ग्रीस दूसरे कर्जों और उनके ब्याज को चुकाने पर ही खर्च करता रहा।
पिछले दो वर्षों से यही हो रहा है। यानी एक कर्ज को चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेना और दूसरे को चुकाने के लिए तीसरा। ग्रीस सरकार अपने लोगों पर जितना खर्च करती है, उससे कहीं ज्यादा राजस्व इकट्ठा करती है, ताकि कर्जदाताओं को शांत रखा जा सके।
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फिलहाल इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ग्रीस को संकट से उबारने के बजाय सरकार, कर्जदाता देशों के बैंकों को मुनाफा पहुंचाने पर ज्यादा फोकस है। इस पूरी प्रक्रिया में ग्रीस की सरकार बिचौलिये की भूमिका में है। वह विदेशों से पैसा कर्ज लेती है और देश में दूसरे कर्जदारों को बांटती है और देश के कर्जदारों से अधिक ब्याज वसूलकर कर्ज की अदायगी करती है।
इस पूरे प्रकरण में होने वाले नुकसान को कर्ज लेने वाले और देने वाले, दोनों पक्ष आपस में बांट लें। निजी कर्जदाताओं का ज्यादातर कर्ज चुका दिया गया है और अब ग्रीस इस स्थिति में नहीं है कि वह अधिक भुगतान कर सके। 30 जून को उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का करीब 1.8 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया।
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ग्रीस की समस्या वहां के कमजोर बैंक हैं। वे यूरोपीय केंद्रीय बैंक से कर्ज ले रहे हैं। अगर इस कर्ज को रोका गया, तो ग्रीस का पूरा बैंकिंग तंत्र बिखर जाएगा। ग्रीस के लिए जरूरी है कि केंद्रीय बैंक की साख बनी रहे। हालांकि, यह आखिरकार जर्मनी और दूसरे कर्जदाता देशों के नजरिये पर भी निर्भर है।
यूरोजोन से निकलने का असर
बैंक ऑफ ग्रीस ने यूरोजोन से निकलने को बड़े दुर्भाग्य के रूप में पेश किया है। वहां ऐसी स्थिति होने पर अधिक मंदी, बेरोजगारी में इजाफा और आमदनी में गिरावट होगी। ग्रीस में तख्तापलट का इतिहास रहा है और ऐसी स्थिति में वहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। इसके साथ ही आम ग्रीस निवासियों की बचत का अवमूल्यन हो जाएगा और अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की संभावना नगण्य हो जाएगी।
यूरोजोन को छोड़ने के बाद ग्रीस को मजबूरन रूस की सहायता लेनी पड़ सकती है। सिप्रास ने पहले ही यूक्रेन के मसले पर रूस पर प्रतिबंध का विरोध कर यूरोपीय एकता को चुनौती दी थी। ग्रीस के यूरोजोन से बाहर होने पर रूस के इस सिद्धांत को बल मिलेगा कि यूरोपीय संघ अपने अवसान की ओर है और जल्द ही बिखर जाएगा।
वैश्विक संबंधों में बदलाव
इटली के साथ ग्रीस को भी मध्यपूर्व और उत्तर अफ्रीका से आने वाले आप्रवासियों का भार सहना पड़ रहा है। ग्रीस के रक्षा मंत्री पैनोस कैमेनोस ने धमकी दी थी कि अगर ग्रीस को दिवालिया होने दिया गया तो वो पूरे यूरोप को आप्रवासियों से ‘पाट’ देगा। उधर, मॉस्को की ओर ग्रीस के झुकाव का सीधा अर्थ अमेरिका और गठबंधन देशों से दूरी होना है। ऐसे में वैश्िवक संबंधों में बदलाव हो सकते हैं।

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