Tuesday, April 14, 2015

जानिए क्‍या है नेट न्‍यूट्रैलिटी और आपके लिए क्‍यों है जरूरी

शशांक शेखर बाजपेई

नेट न्‍यूट्रैलिटी या नेट तटस्‍था शब्‍द आजकल काफी चलन में है। दरअसल, इसका अर्थ है मोबाइल पर बगैर भेदभाव के इंटरनेट आधारित सेवा देना। टेलीकॉम कंपनियां इसके खिलाफ हैं, लेकिन इसके हट जाने से आम आदमी को नुकसान होगा। यह शब्द पहली बार कोलंबिया विश्वविद्यालय के मीडिया विधि के प्राध्यापक टिम वू द्वारा 2003 में उपयोग किया गया था।
दरअसल, अभी जब कोई उपभोक्‍ता किसी भी ऑपरेटर से डाटा पैक लेते हैं, तो वह उससे नेट सर्फिंग, वॉट्सऐप, वाइबर, स्काइप, वॉइस या वीडियो कॉल कर सकता है। अभी इस पर एक ही दर से शुल्क लगता है, जो इस पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति ने कितना डाटा उपयोग किया है। यही नेट न्यूट्रैलिटी कहलाती है।
सीधी भाषा में ऐसे समझें
इसे सीधी भाषा में इस तरह से समझ सकते हैं कि आप बिजली के इस्‍तेमाल के लिए बिल देते हैं। मगर, कंपनियां यह नहीं कहती है कि टीवी चलाने पर बिजली की दर अलग होगी और फ्रिज या कंप्‍यूटर चलाने पर अलग। वॉशिंग मशीन के लिए बिजली का उपयोग करने पर वह उसकी दर अलग होगी और एसी इस्‍तेमाल करने पर अलग। मगर, नेट तटस्‍थता खत्‍म होने के बाद इंटरनेट डाटा की हर सुविधा के लिए अलग-अलग भुगतान करना पड़ेगा।
कंपनियों को फायदा, लोगों को नुकसान
इससे टेलीकॉम कंपनियों को फायदा होगा, लेकिन आम जनता के लिए इंटरनेट काफी महंगा हो जाएगा। कंपनियों का तर्क है कि नई तकनीक ने उनके कारोबार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। जैसे वॉट्सऐप आने के बाद से लोगों ने एसएमएस करना कम कर दिया है या खत्‍म ही कर दिया है। इससे उनके कारोबार और राजस्व को नुकसान हो रहा है। इस कमी को पूरा करने के लिए वे नेट तटस्‍थता को खत्‍म करना चाहती हैं।
पक्ष और विपक्ष में ये हैं तर्क
इंटरनेट की तटस्थता को सरकारी कानून की जरूरत होगी। एक मजबूत तर्क ये दिया जा रहा है कि सरकार को मुक्त बाजार के कामकाज में हस्‍तक्षेप नहीं करना चाहिए। प्रतिस्पर्धा के दौर में जो सबसे कम कीमत पर सबसे अच्छी सेवाएं देगा, उसे जीतना चाहिए।
हालांकि, इसके विपक्ष में कहा जा रहा है कि कंपनियां एकाधिकार बनाए रखने के लिए कम प्रतिस्‍पर्धा वाले बाजार में गठजोड़ कर सकती हैं। ऑपरेटर्स का दूसरा तर्क ये है कि उन्होंने अपना नेटवर्क खड़ा करने में करोड़ों रुपए खर्च किए हैं। वहीं ऐप सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियां मुफ्त में वॉइस कॉल और मैसेज भेजने का फीचर देकर उन्हीं के नेटवर्क्स का फायदा उठा रही हैं।
अब आगे क्‍या होगा
ट्राई ने स्काइप, वाइबर, व्हॉट्सऐप, स्नैपचैट, फेसबुक मैसेंजर जैसी सेवाओं के नियमन से जुड़े 20 सवालों पर भी जनता से फीडबैक मांगा है। जनता से पूछा गया है कि क्या इस तरह की कॉलिंग सर्विस देने वाली कंपनियों को टेलीकॉम ऑपरेटर के नेटवर्क के इस्तेमाल के लिए अतिरिक्‍त कीमत चुकानी चाहिए? यह कीमत यूजर द्वारा उपयोग किए गए डाटा शुल्क के अतिरिक्‍त होगी।
दुनिया में क्‍या है स्थिति
अमेरिका, चिली, नीदरलैंड और ब्राजील जैसे देश पहले ही नेट न्यूट्रैलिटी अपना चुके हैं। अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा खुद इसके पक्ष में खुलकर बोल चुके हैं। वहीं, ट्राई का कहना है कि नेट न्यूट्रैलिटी पर भारत में कोई कानून नहीं है, इसलिए फिलहाल कंपनियों पर वह कार्रवाई नहीं कर सकती।

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